विपत्ति के समय विचलित न होकर यदि हम श्रद्धा और प्रार्थना के साथ भगवान की शरण लेते हैं, तो बिगड़ी हुई स्थिति भी सँवर जाती है। जबकि ईर्ष्या और द्वेष से प्रेरित होकर किया गया कृत्य अंततः विनाशकारी ही सिद्ध होता है। इस प्रकार एक कथा आज जानते हैं -
महाभारत के वनपर्व में वर्णित कथा अत्यंत गहन शिक्षा देने वाली है। जब पांडव वनवास के लिए जा रहे थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य मुनि से निवेदन किया – ‘‘विप्रवर! मेरे साथ अनेक वेदों में पारंगत ब्राह्मण वन की ओर आ रहे हैं। उनका पालन-पोषण करना मेरे लिए कठिन है। कृपया मार्गदर्शन दें।’’ धौम्य मुनि ने उत्तर दिया – ‘‘राजन! तपस्या और भक्ति का आश्रय लेकर ही आप इस दायित्व का निर्वाह कर सकते हैं।’’
युधिष्ठिर ने मुनि की आज्ञा से भगवान सूर्य का स्तोत्र कर अनुष्ठान किया। प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया और कहा – ‘‘यह पात्र तब तक अक्षय रहेगा जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर ले।’’ इस प्रकार पांडव वनवास में भी ब्राह्मणों और अतिथियों को संतोषपूर्वक भोजन कराते रहे।
परंतु जब दुर्योधन ने देखा कि पांडव तो विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और दान से युक्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तो उसने छल-कपट से उन्हें संकट में डालने का उपाय सोचा। उसने दुर्वासा मुनि से प्रार्थना की कि वे पांडवों के यहाँ तब पधारें जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हों। उद्देश्य यही था कि मुनि और उनके दस हजार शिष्य भोजन न मिलने पर पांडवों को शाप दें।
भाग्यवश, एक दिन दुर्वासा मुनि सचमुच पांडवों के पास पहुँचे। युधिष्ठिर ने विधिवत स्वागत किया और निवेदन किया कि वे स्नान करके भोजन करें। इधर द्रौपदी अत्यंत चिंतित हुई, क्योंकि वह स्वयं भोजन कर चुकी थी और अक्षय पात्र अब रिक्त था।
निराशा की उस घड़ी में द्रौपदी को स्मरण हुआ कि जब सब मार्ग बंद हो जाएं तो केवल भगवान ही आश्रय हैं। उसने सच्चे हृदय से श्रीकृष्ण का आवाहन किया। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। (गीता 9.22) —
‘‘जो अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।’’
प्रार्थना का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण तत्काल वहाँ प्रकट हुए और द्रौपदी से भोजन माँगा। संकोचपूर्वक द्रौपदी ने बताया कि पात्र रिक्त है। परंतु भगवान ने हठ करके पात्र मँगवाया और उसमें लगे हुए थोड़े से साग को खा लिया। तत्क्षण सम्पूर्ण विश्व के आत्मा, यज्ञभोक्ता श्रीहरि तृप्त हो गए। परिणामस्वरूप स्नान कर रहे दुर्वासा मुनि और उनके शिष्यों को ऐसा अनुभव हुआ मानो वे पूर्ण तृप्त हो चुके हों। वे डकारों से भर उठे और बिना भोजन किए ही पांडवों के पास से चले गए।
यह प्रसंग हमें गहन शिक्षा देता है। उपनिषदों में कहा गया है –
आत्मैवेदं सर्वम्
— सम्पूर्ण जगत आत्मा ही है। जब भगवान स्वयं तृप्त हुए तो उनके अंशरूप सभी जीव भी तृप्त हो गए। यही वेदान्त का सत्य है।
गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं –
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः
(गीता 3.13)
अर्थात जो यज्ञशेष का आहार करते हैं वे पापों से मुक्त हो जाते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने उसी भाव से थोड़े से साग को स्वीकार कर विश्व को तृप्त कर दिया।
द्रौपदी की सच्ची प्रार्थना यह भी सिद्ध करती है कि भक्त का भाव ही ईश्वर को बाँधता है। कठोपनिषद् में कहा गया है –
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
— आत्मा प्रवचन, बुद्धि या श्रवण मात्र से नहीं मिलता, बल्कि जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं वही उसे पाता है। द्रौपदी के भावपूर्ण आह्वान ने ही श्रीकृष्ण को वहाँ खींच लिया।
यह घटना यह भी सिखाती है कि दुष्ट व्यक्ति दूसरों के अनिष्ट में आनंदित होते हैं, परंतु सज्जन दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्न होते हैं। उपनिषदों और गीता दोनों में यही शिक्षा है कि ईर्ष्या और द्वेष विवेक का नाश कर देते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा –
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (गीता 3.37)
— ‘‘यह काम और क्रोध ही मनुष्य के वैरी हैं।’’ दुर्योधन इन्हीं के वश होकर पांडवों के अनिष्ट की योजना बनाता रहा, पर अंततः उसका कपट स्वयं पर ही भारी पड़ा।
इसके विपरीत, धर्ममार्ग पर चलने वाले युधिष्ठिर और द्रौपदी जैसे भक्तजन विपत्ति में भी धैर्य नहीं खोते। वे जानते हैं कि अंतिम आश्रय केवल भगवान हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् कहता है –
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
— ‘‘वही परमात्मा सम्पूर्ण जगत का आधार है।’’
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