Thursday, 15 January 2026

जयपुर - गलता तीर्थ का इतिहास : शांडिली, महर्षि गालव और गरुड़ जी प्रसंग


 नींद बनेगी भक्ति - सोने से पहले की दिव्य साधना

शांडिली, जिसे शांली भी कहा गया, एक साधारण परिवार की कन्या थी। विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह अपने गुरु के पास आई और विनम्र भाव से पूछा—“गुरु जी, अब आगे क्या करूँ?” गुरु ने उससे पूछा कि क्या वह गुरु की आज्ञा का पालन करेगी। शांडिली ने दृढ़ स्वर में कहा कि वह पूर्ण रूप से आज्ञा का पालन करेगी। तभी गुरु ने उसका नाम पूछा। उसने कहा—“मेरा नाम शांली है।” गुरु ने पुनः पूछा—“क्या सचमुच मानेगी?” और उसने निश्चयपूर्वक उत्तर दिया—“हाँ गुरु जी, अवश्य मानूँगी।” तब गुरु ने उसे अनुष्ठान, मंत्र-साधना और आत्मशक्ति को जगाने का मार्ग बताया।

गुरु ने समझाया कि घर का वातावरण प्रायः राजसी और तामसी होता है, वहाँ शोर-गुल और सांसारिक हलचल रहती है, जिससे भक्ति में गहराई नहीं आ पाती। इसलिए उन्होंने उसे जयपुर के समीप, लगभग बाईस किलोमीटर दूर एक पहाड़ी की गुफा में साधना करने का निर्देश दिया। शांडिली ने गुरु-आज्ञा को ही जीवन का आधार मानकर उसी गुफा में जाकर अनुष्ठान आरंभ किया।

वहाँ वह नियमित रूप से गुरु-मंत्र का जप, प्राणायाम, और नियमपूर्वक साधना करने लगी। वह सांसारिक आकर्षणों से दूर रही। न किसी लौकिक संबंध में उलझी, न किसी भोग की ओर झुकी। इसी कारण उसकी भक्ति शीघ्र फल देने लगी। कुछ ही दिनों में उसके भीतर की आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत होने लगीं। कभी वह भाव-विभोर हो जाती, कभी हँसी आ जाती, कभी दिव्य प्रकाश दिखाई देता, तो कभी देवी-देवताओं के दर्शन होते।

उस समय कन्याएँ अपने बाल लंबे रखती थीं। शांडिली के केश भी रेशम-से लंबे थे। वह उन्हें घुमाकर जटा की भाँति बाँध लेती, जैसे भगवान शिव अपनी जटाएँ धारण करते हैं। संध्या के समय वह पहाड़ी पर स्थित तुलसी या पुष्पों को जल अर्पित करती। उसका जीवन पूरी तरह संयम, पवित्रता और साधना में लीन हो गया था।

एक दिन महर्षि गालव और गरुड़ जी जयपुर की शोभा देखते हुए उस पहाड़ी की ओर आए। दूर से उन्हें लगा कि कोई तेजस्वी ब्रह्मचारी युवक तपस्या कर रहा है, शिव-तुल्य वेश धारण किए हुए। जिज्ञासा से वे नीचे उतरे। समीप जाकर देखा तो आश्चर्य हुआ—वह कोई युवक नहीं, बल्कि एक दिव्य तेज से युक्त कन्या थी। शांडिली ने उनका यथोचित स्वागत किया, जल-फल-फूल अर्पित किए। वह जितनी बाह्य रूप से सुंदर थी, उतनी ही बुद्धि और विवेक से परिपक्व थी।

गालव ऋषि उसके संयम, शांति और तेज को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने मन ही मन सोचा कि ऐसी कन्या धरती पर सामान्य जीवन के लिए नहीं बनी है। वे उसे भगवान नारायण के पास ले जाकर उपलक्ष्मी बनाने का विचार करने लगे। गरुड़ जी ने भी यही प्रस्ताव रखा। उन्होंने शांडिली से कहा कि वे उसे भगवान नारायण की सहचरी बनाना चाहते हैं।

शांडिली ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया—“महाराज, मैं यह साधना विवाह या ऐश्वर्य के लिए नहीं कर रही। भगवान नारायण जैसे नारायण हैं, शिव जैसे शिव हैं, ब्रह्मा जैसे ब्रह्मा हैं, और उसी चेतना से हम जीवात्माएँ प्रकट हुई हैं। अज्ञान में हम स्वयं को तुच्छ समझते हैं, पर ज्ञान में जान लेते हैं कि वही परमात्मा हम ही हैं। मैं उस आत्मा का साक्षात्कार चाहती हूँ जिसमें शांति, आनंद और सामर्थ्य है। गुरु ने दीक्षा में जो बताया है—जप, विश्रांति योग, अभिकंप योग—मैं उसी का अनुभव चाहती हूँ।”

यह देखकर गालव और गरुड़ समझ गए कि यह कन्या साधारण नहीं है। उन्होंने उस रात वहीं ठहरने का निर्णय लिया। भीतर-भीतर उन्होंने विचार किया कि शांडिली अभी मान नहीं रही है, अतः उसे बलपूर्वक भगवान नारायण के दर्शन कराने ले जाया जाए। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि में उसका अपहरण करेंगे।

रात्रि के मध्य, जब शांडिली श्वास के साथ ओम-स्मरण करते हुए विश्राम में थी, तब गालव ऋषि गुफा में प्रविष्ट हुए। उसी क्षण उसके अंतरात्मा में स्पंदन हुआ। उसने नेत्र खोलकर ध्यान किया और जान लिया कि ऋषि उसका अपहरण करने आए हैं। उसने निर्भीक होकर कहा कि स्त्रियाँ और कन्याएँ अपनी शक्ति को भूलकर स्वयं को अबला मान लेती हैं, पर आज वह अपनी आत्मशक्ति का परिचय देना चाहती है।

उसने घोषणा की—“ओम श्री परमात्मने नमः। जो मेरी अंतरात्मा है वही वायु, जल, अग्नि, वरुण, कुबेर सभी देवताओं की भी अंतरात्मा है। उसी साक्षी में मैं कहती हूँ कि मैंने कभी किसी पुरुष के प्रति अशुद्ध भाव नहीं रखा और गुरु-आज्ञा से किया गया मेरा अनुष्ठान सत्य है।”

इतना कहते ही भयंकर वायु-प्रकोप आरंभ हो गया। उसी क्षण वायु देवता ने अपना परिचय दिया। चारों ओर ऐसा चक्रवात उठा कि जल छंटने लगा, पेड़-पौधे हिलने लगे और पूरी गुफा-गिरि में भूमंडल काँप उठा। ऐसा प्रतीत होने लगा मानो धरती स्वयं आकाश में उठकर उड़ जाएगी। यह साधारण हवा नहीं थी, बल्कि वायु देवता की सजीव और चेतन सत्ता थी।

गरुड़ जी घबरा उठे। उन्होंने अपने पंख फैलाकर स्थिर रहने का प्रयास किया, किंतु उनके पंख शिथिल होने लगे, मानो गल रहे हों। गालव ऋषि भी भयभीत हो उठे। उन्होंने मंत्रों का स्मरण कर स्वयं को बचाने का प्रयास किया, पर वही वायु-चक्र बार-बार उन्हें घुमा देता। वायु देवता में यह सामर्थ्य प्रत्यक्ष प्रकट हो गया कि वह जिसे चाहे उड़ा ले जाए और जहाँ चाहे पटक दे। तब दोनों को स्पष्ट हो गया कि यह किसी साधारण कन्या की नहीं, बल्कि गुरु-आज्ञा से जाग्रत आत्मशक्ति का प्रभाव है।

अंततः गालव ऋषि और गरुड़ जी दोनों ने हाथ जोड़कर कहा—“शांडिली, अपना प्रकोप शांत करो। अब हमें ज्ञात हो गया है कि तुम साधारण कन्या नहीं हो। तुम्हारी साधना सत्य है और गुरु-आज्ञा से युक्त है। हमें क्षमा करो।” उन्होंने वायु देवता से भी करुण प्रार्थना की। तब शांडिली ने पुनः ओमकार का स्मरण किया और उसी क्षण वायु देवता शांत हो गए, प्रकृति स्थिर हो गई।

प्रसन्न होकर गालव ऋषि और गरुड़ जी ने शांडिली को वरदान दिया कि उसकी ओमकार साधना, श्वास-साधना और आत्मा-परमात्मा के ऐक्य का यह दृढ़ ज्ञान संसार की बहू-बेटियों और स्त्रियों को अबलापन के भाव से मुक्त करेगा। उन्होंने घोषणा की कि इस पर्वत का नाम गलता तीर्थ होगा—जहाँ गालव और गरुड़ के पंख गल गए और एक तेजस्विनी कन्या की तपस्या अमर हो गई। आज भी यह तीर्थ जयपुर के समीप स्थित है और साक्ष्य देता है कि कन्याओं, स्त्रियों और बच्चों में परमात्मा का कितना महान सामर्थ्य निहित है—कि वायु देवता तक उनकी साधना के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।





Tuesday, 13 January 2026

पितामह भीष्म और उत्तरायण

 

अष्ट वसु, नंदिनी और भीष्म: कर्म, श्राप और मोक्ष की अमर कथा



देवलोक में अष्ट वसु—आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—धर्म, तेज और सेवा के प्रतीक माने जाते थे। इन वसुओं में प्रभास सबसे अधिक तेजस्वी थे। एक समय ये सभी महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में अतिथि बनकर पहुँचे। वशिष्ठ मुनि का आश्रम तप, शांति और दिव्य समृद्धि का केंद्र था। उसी आश्रम में निवास करती थीं दिव्य कामधेनु नंदिनी, जो केवल एक गाय नहीं, बल्कि धर्म, अन्न और यज्ञ की साक्षात् शक्ति थीं।

नंदिनी के अनुपम सौंदर्य और अद्भुत सामर्थ्य को देखकर प्रभास वसु की पत्नी का मन मोहित हो उठा। उनके हृदय में यह कामना जागी कि यदि यह दिव्य गाय उनकी सखी के पास चली जाए, तो उसका जीवन धन्य हो जाए। उन्होंने यह इच्छा प्रभास के सामने रखी। प्रभास ने शांत और विवेकपूर्ण स्वर में उत्तर दिया कि यह ऋषि की संपत्ति है, और चोरी का फल अवश्य भोगना पड़ता है; देव होकर अधर्म करना उन्हें शोभा नहीं देता।

किन्तु बार-बार का आग्रह, सखी के प्रति करुणा और पत्नी के भावनात्मक दबाव के कारण प्रभास का विवेक धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। अंततः अन्य वसुओं की मौन सहमति के साथ उन्होंने महर्षि वशिष्ठ की नंदिनी का अपहरण कर लिया।

महर्षि वशिष्ठ ध्यानस्थ थे। तपोबल से उन्होंने तुरंत जान लिया कि यह कृत्य अष्ट वसुओं द्वारा किया गया है। उनका वचन क्रोध से नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए निकला—जो देव धर्म का उल्लंघन करेंगे, वे देवपद से गिरकर मनुष्य योनि में जन्म लेंगे। यह सुनकर देवता भयभीत हो उठे और ब्रह्मा की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा ने स्पष्ट कहा कि ऋषि का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता।

देवताओं की करुण प्रार्थना पर यह विधान हुआ कि सात वसु मनुष्य योनि में जन्म लेकर शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होंगे, जिससे उन्हें तुरंत मुक्ति मिल जाएगी। किंतु आठवाँ वसु प्रभास, जिसने प्रत्यक्ष रूप से अधर्म किया था, उसे दीर्घ जीवन भोगना पड़ेगा।

इसी श्राप और वर के विधान से राजा शंतनु और देवी गंगा के यहाँ अष्ट वसुओं का जन्म हुआ। जन्म लेते ही गंगा ने अपने सात पुत्रों को जल में प्रवाहित कर दिया, जिससे वे बंधन से मुक्त हो गए। आठवाँ पुत्र जीवित रहा। वही प्रभास वसु आगे चलकर देवव्रत कहलाया और कालांतर में वही संसार में भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भीष्म धर्म की सजीव प्रतिमा थे। पिता की प्रसन्नता और वचन की रक्षा के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत धारण किया। उनकी इस अनुपम प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ।

महाभारत के महासंग्राम में भीष्म शरशय्या पर लेटे रहे। वे चाहें तो उसी क्षण अपने प्राण त्याग सकते थे, किंतु उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की। शास्त्र कहते हैं कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाला योगी सूर्य मार्ग से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। भीष्म जानते थे कि काल, दिशा और चेतना—तीनों का समन्वय ही उत्तम गति का कारण बनता है।

जब उत्तरायण का पुण्य काल आया, भीष्म ने अपने नेत्र मूँद लिए। शरशय्या पर लेटे-लेटे उन्होंने परब्रह्म परमात्मा की स्तुति की—उस परब्रह्म की, जो कर्म, श्राप और वर से परे है, और फिर भी सबका साक्षी है। उस समय स्वयं श्रीकृष्ण उनके समीप उपस्थित थे। भीष्म की चेतना धीरे-धीरे शब्द, रूप और देह की सीमाओं को पार करती हुई ब्रह्म में लीन हो गई। इस प्रकार प्रभास वसु का अधूरा कर्म पूर्ण हुआ और एक श्राप अंततः मोक्ष में परिवर्तित हो गया।

शिक्षा

यह कथा हमें गहराई से यह सिखाती है कि कर्म का विधान देवताओं पर भी समान रूप से लागू होता है। विवेक से किया गया छोटा-सा निर्णय जीवन की दिशा बदल सकता है, और भावनात्मक आग्रह में लिया गया एक गलत कदम दीर्घ भोग का कारण बन जाता है।

अष्ट वसुओं का पतन यह स्मरण कराता है कि धर्म केवल ज्ञान से नहीं, आचरण से जीवित रहता है। वहीं भीष्म का जीवन यह दर्शाता है कि यदि मनुष्य जीवन भर सत्य, संयम और प्रतिज्ञा का पालन करे, तो सबसे कठोर कर्मफल भी अंततः मोक्ष का मार्ग बन सकता है।

उत्तरायण की प्रतीक्षा करता हुआ भीष्म हमें यह शिक्षा देता है कि काल, दिशा और चेतना का सामंजस्य आध्यात्मिक उन्नति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंततः यह कथा यही कहती है कि श्राप और वर दोनों से परे केवल परब्रह्म की शरण ही परम शांति और मुक्ति का साधन है।

हरि ॐ।

Friday, 26 December 2025

अकबर और बीरबल की कथा — पाव भर चूना

 


कथा - मुगल सम्राट अकबर के दरबार में बीरबल अपनी विलक्षण बुद्धि और गहरी समझ के लिए प्रसिद्ध थे। अकबर स्वयं तर्कशील और व्यवहारकुशल शासक थे, फिर भी बीरबल की सूझ‑बूझ उन्हें विशेष रूप से प्रभावित करती थी। कहा जाता है कि बीरबल निरंतर सरस्वती मंत्र का स्मरण करते थे, जिससे उनकी बुद्धि में स्थिरता, स्पष्टता और समय से पहले परिस्थितियों को समझ लेने की क्षमता विकसित हो गई थी।

एक प्रातःकाल अकबर का एक खोजा बीरबल के पास आया। उसने विनम्रता से कहा, “बीरबल जी, मुझे पाव भर चूना चाहिए।” बीरबल  आगरा में पान की गुमटी चलाता था, पढ़ा‑लिखा था और उसी आय से अपने माता‑पिता तथा परिवार का पालन‑पोषण करता था। 

यह बात सुनकर बीरबल साधारण रूप से उत्तर देने के बजाय कुछ क्षण मौन हो गए। उन्होंने मन‑ही‑मन सरस्वती मंत्र का स्मरण किया और ध्यान में स्थिति को परखा। उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि इस माँग के पीछे कोई गंभीर कारण छिपा है।

बीरबल ने खोजे से कहा, “तुमने कल बादशाह अकबर को पान लगाते समय लापरवाही की है। चूना अधिक लग गया, जिससे बादशाह के मुख में छाले पड़ गए हैं। आज वे अत्यंत क्रोधित हैं। वे तुम्हें दरबार में बुलवाकर पाव भर चूना मंगवाएँगे और सिपाहियों के सामने तुम्हें उसे खाने के लिए बाध्य करेंगे। यदि तुम मना करोगे, तो तलवार और भालों की नोक पर खिलाया जाएगा।”

यह सुनते ही खोजा भय से काँप उठा। उसने व्याकुल होकर कहा, “तो अब मैं क्या करूँ? क्या भाग जाना ही एकमात्र उपाय है, या मृत्यु को स्वीकार कर लूँ?”

बीरबल ने शांत और आश्वस्त स्वर में कहा, “घबराओ मत। कल मैं पाव भर से अधिक घी लाया था। तुम पहले पाव भर घी अच्छी तरह पी लो और उसके बाद ही दरबार में जाना। जब ऊपर से चूना खाओगे, तो घी उसकी तीव्रता को कम कर देगा। इस प्रकार तुम सुरक्षित रहोगे।”

खोजे ने बीरबल की बात पर पूरा विश्वास किया। उसने वैसा ही किया और साहस जुटाकर चूना लेकर अकबर के दरबार में पहुँचा।

दरबार में पहुँचते ही अकबर का क्रोध प्रकट हो गया। उन्होंने कठोर शब्दों में कहा, “लापरवाह व्यक्ति दुश्मन से भी अधिक घातक होता है। बुद्धिमान शत्रु से बचा जा सकता है, पर मूर्ख और असावधान सेवक पूरे राज्य के लिए संकट बन जाता है। मेरे मुख में छाले पड़ गए हैं। तू कर्तव्य‑भ्रष्ट है।”

अकबर ने सिपाहियों को आदेश दिया, “यदि यह चूना खाने से मना करे, तो तलवार और भालों की नोक पर इसे खिलाया जाए।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी की दृष्टि खोजे पर टिक गई। खोजा बिना किसी हिचकिचाहट के चूना खाने लगा। लोग आश्चर्य से यह दृश्य देखते रहे, यह सोचकर कि उसका अंत निकट है।

दो दिन बीत गए। सभी को विश्वास था कि खोजा जीवित नहीं बचेगा। किंतु दो दिन बाद वही खोजा पूर्णतः स्वस्थ, ताजा और निर्भीक होकर पुनः अकबर के सामने उपस्थित हुआ। अकबर उसे देखकर अचंभित रह गए।

उन्होंने पूछा, “पाव भर चूना खाने के बाद भी तू जीवित कैसे है?”

तब खोजे ने पूरी घटना विस्तार से सुना दी और बताया कि यह सब बीरबल की बुद्धि और मार्गदर्शन का परिणाम था। बीरबल ने पहले ही बादशाह के मन की बात समझ ली थी और उसी अनुसार उसे उपाय बताया था।

अकबर ने तुरंत बीरबल को सम्मानपूर्वक दरबार में बुलवाया और कहा, “बीरबल, तुमने मेरे मन की बात जान ली।”

बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। यह गुरु‑प्रदत्त मंत्र और गुरु की आज्ञा का फल है। मैं तो केवल उसी के अनुसार अपने मन का अनुसंधान करता हूँ।”

 शिक्षा

यह कथा सिखाती है कि सच्ची बुद्धि केवल चतुराई या रटंत विद्या से नहीं आती, बल्कि शांत मन, विवेक और अहंकार‑रहित ज्ञान से उत्पन्न होती है। अहंकार व्यक्ति को अंधा कर देता है, जबकि विनम्रता और गुरु‑कृपा मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थिति में भी मार्ग दिखा देती है।

विद्या वही श्रेष्ठ है जो विवेक जगाए, धन वही सार्थक है जो धर्म के मार्ग पर लगे और शक्ति वही उपयोगी है जो करुणा से संचालित हो। बीरबल का जीवन इस सत्य का उदाहरण है कि जब ज्ञान अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर‑स्मृति से जुड़ जाता है, तब वही ज्ञान मनुष्य को महान बनाता है।





Friday, 12 December 2025

ईश्वर सब देख रहा है -




"एक दिन एक राजा ने अपने तीन मंत्रियों को दरबार में बुलाया।
राजा ने प्रत्येक को एक-एक थैला दिया और आदेश दिया—
‘बगीचे में जाओ… और जितने अच्छे-से-अच्छे फल मिलें, उन्हें इकट्ठा करके लाओ।’

तीनों मंत्री अलग-अलग दिशाओं में बगीचों की ओर निकल पड़े।

पहले मंत्री ने सोचा—
“राजा को मैं केवल बेहतरीन, ताज़ा और स्वादिष्ट फल ही दूँगा।”
उसने पूरी मेहनत से खोज-खोजकर अच्छे फल चुने और अपना थैला भर लिया।

दूसरे मंत्री ने सोचा—
“राजा हर फल तो जाँचेगा नहीं… बस थैला भरा होना चाहिए।”
इसलिए उसने ताज़ा, कच्चे और यहाँ तक कि सड़े-गले फल भी जल्दी-जल्दी भर दिए।

तीसरे मंत्री ने सोचा—
“राजा थैला खोलेगा भी नहीं… बस भरा होना चाहिए।”
और उसने आलस में घास-फूस और सूखे पत्ते भरकर थैला भर दिया।

अगले दिन राजा ने तीनों को बुलाया,
लेकिन उसने थैले खोले ही नहीं…
सिर्फ एक आदेश दिया—

“तीनों को उनके थैलों सहित तीन महीने के लिए दूर की जेल में कैद किया जाए।”

अब उनके पास खाने को केवल वही था…
जो वे अपने-अपने थैलों में भरकर लाए थे।

पहला मंत्री—
जिसने अच्छे फल जमा किए थे—
आराम से वही फल खाता रहा और तीन महीने आसानी से गुजर गए।

दूसरा मंत्री—
जिसने अच्छे और खराब दोनों तरह के फल भरे थे—
कुछ दिन तो अच्छे फल मिले,
फिर सड़े-गले फल खाने पड़े।
वह बीमार हुआ और बहुत कष्ट झेला।

तीसरा मंत्री—
जिसके थैले में सिर्फ घास और पत्ते थे—
कुछ ही दिनों में भूख से मर गया।

अब ज़रा सोचिए…
आप अपने जीवन रूपी बाग़ में क्या जमा कर रहे हैं?

अच्छे कर्म… या बुरे कर्म?

क्योंकि याद रखिए—
अंतिम समय में काम वही आएगा…
जो आपने जीवनभर अपने ‘थैले’ में भरा है।
और यह दुनिया का राजा—
ईश्वर—सब देख रहा है…


Monday, 24 November 2025

गुरु तेग बहादुर जी : धर्म, मानवता और असिम साहस के अमर प्रहरी


(शहीदी दिवस विशेष लेख)

भारतीय इतिहास में ऐसे वीर, त्यागी एवं करुणामय संत बहुत कम हुए हैं, जिनके चरित्र में युद्ध-क्षेत्र का साहस, साधना का तेज, और मानवता के लिए मर मिटने का संकल्प एक साथ झलकता हो। सिखों के नवें गुरु — श्री गुरु तेग बहादुर जी — ऐसे ही अद्वितीय महापुरुष थे। आज उनके शहीदी दिवस पर हम उनके सम्पूर्ण जीवन, संघर्ष, आदर्शों और बलिदान को स्मरण करते हैं, जो न केवल सिख पंथ बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा-स्रोत है।


जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में गुरु हरगोबिंद जी के घर हुआ। बचपन का नाम त्याग मल था। वे अपने पिता की आध्यात्मिक महिमा और योद्धा-सुलभ दृढ़ता—दोनों से प्रभावित हुए। बचपन से ही वे शांत स्वभाव, गहन विचारशीलता और धार्मिक प्रवृत्ति के धनी थे।

जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब उन्होंने मुग़ल सेना के विरुद्ध कार्तारपुर युद्ध में अदम्य साहस दिखाया। उनके पराक्रम को देखकर गुरु हरगोबिंद जी ने स्नेहपूर्वक उन्हें "तेग बहादुर" नाम प्रदान किया, अर्थात्— तेग (तलवार) का वीर बहादुर।


तप, साधना और आंतरिक परिपक्वता

यौवन के साथ ही गुरु तेग बहादुर जी संसार की क्षणभंगुरता को गहराई से समझने लगे थे। युद्ध-भूमि में रहते हुए भी उनका मन विवेक, करुणा और आध्यात्मिकता से जुड़ा रहा। विवाह के बाद वे बाबा बकाला (अब पंजाब में बाबा बकाला नगर) में रहने लगे। यहीं उन्होंने वर्षों तक ध्यान, भजन, सेवा और गहन तपश्चर्या में जीवन व्यतीत किया।

अपने आध्यात्मिक चिंतन के कारण उन्होंने सिख धर्म का आध्यात्मिक पक्ष और अधिक गहरा बनाया। उनके द्वारा रचित 115 पवित्र शबद आज श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। ये सब जीवन की अनिश्चितता, ईश्वर-भक्ति, वैराग्य और आत्मज्ञान की अद्भुत अनुभूति कराते हैं।


सिख पंथ के नवें गुरु के रूप में

गुरु हरकृष्ण जी के देहांत के बाद अनेक दावेदार उठे, परन्तु सिख समुदाय की संयुक्त प्रार्थना और संदर्भों से स्पष्ट हुआ—सच्चे गुरु तेग बहादुर ही हैं। इस प्रकार 1664 में वे सिख पंथ के नवें गुरु बने।

गुरु बनने के बाद उन्होंने पूरे उत्तर भारत में— पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बंगाल और असम तक— व्यापक यात्राएँ कीं। जहाँ-जहाँ गए, वहाँ उन्होंने शांति, भाईचारा, निःस्वार्थ सेवा और सत्य धर्म के संदेश दिए।

उन्हें गरीबों, दुखियों और सताए हुए लोगों के लिए आशा की किरण माना जाता था। उन्होंने अनेक नगर बसवाए— जिनमें चक्र नांगल (आनंदपुर साहिब का प्रारंभिक स्वरूप) विशेष उल्लेखनीय है।


समाज सुधारक और मानवता के रक्षक

उस काल में मुग़ल शासन का दमन बढ़ता जा रहा था। जनेऊ-त्याग कर जबरन धर्म-परिवर्तन की घटनाएँ आम थीं। कश्मीर के कश्मीरी पंडितों पर हो रहा अत्याचार निरंतर बढ़ रहा था। वे गुरु तेग बहादुर जी से मिले और अपनी रक्षा की प्रार्थना की।

गुरु जी ने परिस्थिति को सुनकर एक वाक्य कहा—
“यदि किसी एक महान व्यक्ति का बलिदान लाखों की आस्था बचा सकता है, तो उस बलिदान के लिए मैं तैयार हूँ।”

वे केवल सिखों के नहीं, बल्कि सभी धर्मों की स्वतंत्रता के रक्षक बनकर खड़े हुए। उनका संदेश स्पष्ट था—
“प्रत्येक प्राणी को अपने धर्म का पालन करने का पूर्ण अधिकार है। धर्म के नाम पर अत्याचार अस्वीकार्य है।”


शहादत : धर्म स्वातंत्र्य का अद्वितीय उदाहरण

गुरु तेग बहादुर जी का बढ़ता प्रभाव तानाशाही सत्ता को स्वीकार्य नहीं था। उन्हें गिरफ़्तार कर दिल्ली की कोतवाली (चांदनी चौक) में कैद कर लिया गया।

कैद के दिनों में भी उन्होंने असीम धैर्य और प्रभु-समर्पित भावना से समय बिताया। उनके तीन प्रमुख शिष्यों— भाई दयाला, भाई मती दास और भाई सती दास— को उनके सामने भयानक यातनाएँ दी गईं, परन्तु वे अडिग रहे।

आख़िर, 24 नवंबर 1675 को चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का सार्वजनिक रूप से शिरच्छेद कर दिया गया। परन्तु उनकी मृत्यु ने अत्याचारियों को नहीं, बल्कि उच्च आदर्शों को अमर किया।

आज जहाँ यह बलिदान हुआ, वहीं “गुरुद्वारा शीश गंज साहिब” गुरु जी की अमर गाथा का प्रतीक है।


उनकी शहादत का महत्व

गुरु तेग बहादुर जी की शहादत केवल सिख इतिहास की घटना नहीं है—
यह विश्व इतिहास की सबसे महान नैतिक विजय मानी जाती है।

उन्होंने अपने धर्म के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के धर्म की स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिया।

उन्होंने दिखाया कि धर्म का मूल स्वरूप अधिकार, प्रेम और स्वतंत्रता है— न कि बलपूर्वक आरोपण।

उनका बलिदान आगे चलकर उनके सुपुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी के रूप में खालसा पंथ की स्थापना में प्रेरणा-शक्ति बना।


गुरु जी के उपदेश : अनंत प्रेरणा

गुरु तेग बहादुर जी के शबद मानवता की चेतना को झकझोरते हैं—

“मन तू जोत सरूप है, अपना मूल पहचान।”

“सुख दुःख दुवै नह लागई, जां इक मन रहै समाई।”

“जो nar दुःख में दुःख नहीं मानै, सुख सनेहु अरु भय नहीं जानै…”


ये शबद बताते हैं कि जीवन का सार आत्मज्ञान, धैर्य, समता और प्रभु-स्मरण में है।

वे कहते हैं— मनुष्य बाहरी वस्तुओं में सुख ढूँढता है, परंतु स्थायी शांति भीतर ही है।


आज का संदेश — गुरु तेग बहादुर जी क्यों अमर हैं?

आज जब दुनिया में असहिष्णुता, हिंसा और धार्मिक कट्टरता के स्वर सुनाई देते हैं, तब गुरु तेग बहादुर जी के आदर्श और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।

वे हमें सिखाते हैं—

धर्म स्वतंत्रता का अधिकार जन्मसिद्ध है।

अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्ची भक्ति है।

त्याग, साहस और सत्य जीवन को महिमा प्रदान करते हैं।

दूसरों के लिए जीना सर्वोच्च धर्म है।


उनका जीवन कहता है कि एक व्यक्ति के नैतिक साहस से भी दुनिया के इतिहास की दिशा बदल सकती है।


गुरु तेग बहादुर जी का सम्पूर्ण जीवन— बचपन के पराक्रम से लेकर अंतिम क्षण तक— मानवता की रक्षा, धर्म की स्वतंत्रता, न्याय और शांति के लिए समर्पित रहा।
उनकी शहादत ने सदियों तक यह संदेश दिया है कि सत्य का सिर भले कट जाए, झुकता नहीं।

उनके शहीदी दिवस पर हम सब प्रण करें—
हम भी अन्याय और असहिष्णुता के विरुद्ध आवाज़ बनाए रखेंगे,
और मानवता, प्रेम, सत्य एवं आध्यात्मिकता के पथ पर चलेंगे।

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह।




Saturday, 22 November 2025

पूज्य मोटा जी का प्रेरक प्रसंग

पूज्य मोटा जी का प्रेरक प्रसंग – त्राटक, निर्भयता और ओमकार जप की शक्ति


पूज्य मोटा सन् 1930 में स्वतंत्रता संग्राम में सत्याग्रहियों के साथ थे और इसी कारण एक बार साबरमती जेल पहुँचे। जेल में भीषण अत्याचार होते थे और जब कैदियों को खेड़ा जेल भेजा जाता था, तो एक छोटे दरवाज़े से सिर झुकाकर जाने के दौरान सिपाही उनकी पीठ पर बेरहमी से डंडा मारते थे।

पूज्य मोटा का नंबर पचासवाँ था। आगे के उनचास कैदियों पर डंडे बरसते देखकर वे सोचने लगे — “अब क्या करूँ?” तभी भीतर से आवाज़ आयी — “त्राटक कर!” यह उनके गुरुदेव धूनीवाले दादा श्री केशवानंदजी की प्रेरणा थी।

जब उनकी बारी आई, मोटा जी ने निर्भय होकर ओमकार जपा, गुरुदेव का स्मरण किया और डंडा मारने वाले सिपाही की आँखों में त्राटक किया। सिपाही ने डंडा उठाया पर मार न सका। बड़े अधिकारी ने भी कोशिश की, पर वे भी असफल रहे।

अंग्रेज अधिकारी हैरान होकर बोले— “इसके पास क्या शक्ति है?” जेलर ने बुलाया और पूछा— “तू कौन है? क्या जादू करता है?” मोटा जी ने कहा— “भाई! हम तो केवल भगवान का नाम लेते हैं। ईश्वर सबमें है, आपके अंदर भी है।”

मोटा जी की शांत, निर्भय और दिव्य दृष्टि से जेलर प्रभावित हो गया और रजिस्टर में लिख दिया— “इन्हें A-Class की सुविधा दी जाए — घी, गुड़, दूध, मच्छरदानी और सभी अधिकार।”

लेकिन motāji ने वह सुविधा अपने साथियों में बाँट दी और स्वयं “C-Class” भोजन ही करते रहे। वे कहते— “ऊपर-ऊपर तीन क्लास दिखाई देती हैं, पर भीतर तो सबमें वही एक सत्ता है।”

Wednesday, 27 August 2025

गणेश चतुर्थी और चन्द्र-दर्शन का गूढ़ रहस्य

 



🌸 प्रस्तावना

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का दिन था। सम्पूर्ण सृष्टि में उत्सव का वातावरण था। गणपति बप्पा अपने मौजिले और आनंदमय स्वभाव में विचर रहे थे। उनका रूप अद्वितीय और दिव्य था—हाथी का मुख, विशाल उदर, चार भुजाएँ, मस्तक पर शोभायमान चंद्रकलाएँ और अंग-अंग से झलकती दिव्यता।

उसी समय चन्द्रमा, जो स्वयं को रूप, लावण्य और सौंदर्य का प्रतीक मानता था, उन्हें देखकर व्यंग्यपूर्वक हँस पड़ा और बोला—

“अरे! क्या विचित्र आकृति है यह? विशाल पेट, हाथी का सिर… ऐसा रूप किसे शोभा देता है?”

यह अहंकार-भरी वाणी सुनकर गणेशजी गंभीर हुए। वे जानते थे कि जब तक अभिमान को दंड न मिले, तब तक उसका नाश नहीं होता। उन्होंने चन्द्रमा को शाप दिया—

“जाओ! आज से तुम किसी को मुँह दिखाने योग्य नहीं रहोगे। तुम्हारे दर्शन मात्र से अपयश और कलंक का उदय होगा।”


🌙 चन्द्रमा का अस्तित्व संकट में

गणेशजी के शाप से चन्द्रमा अदृश्य हो गये। पृथ्वी पर अंधकार छा गया। औषधियों का पोषण रुक गया, जल की गति बाधित हुई और सम्पूर्ण जीवन-चक्र संकट में पड़ गया। देवगण व्याकुल होकर एकत्रित हुए। ब्रह्माजी ने समझाया—

“हे देवताओं! यह संकट चन्द्रमा की उच्छृंखलता और अहंकार का परिणाम है। यदि गणेशजी को प्रसन्न किया जाए तो ही समाधान संभव है।”

तब देवताओं ने सामूहिक रूप से गणेशजी की स्तुति और अर्चना की। मंत्रोच्चार और स्तोत्र-पाठ से उन्होंने उनका हृदय पिघलाया। अंततः गणेशजी ने चन्द्रमा को आंशिक क्षमा दी और कहा—

“वर्ष के सभी दिनों में तुम सुंदरता और शीतलता का प्रसार करोगे, परंतु भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन, जिस दिन तुमने मेरा उपहास किया था, उस दिन तुम्हें देखने वाला कलंकित होगा। इस प्रकार लोगों को यह शिक्षा मिलेगी कि—

👉 ‘रूप और सौंदर्य का अहंकार मत करो।’

सच्चा सौंदर्य आत्मा में है, बाहरी रूप में नहीं। परमात्मा ही वास्तविक सौंदर्य का स्रोत है। बाहरी रूप क्षणभंगुर है, परंतु आत्मस्वरूप शाश्वत और अमर है। जो आत्मा को पहचान लेता है, वही सच्चे सौंदर्य का अनुभव करता है।”


📖 शास्त्रीय संदर्भ

श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध 10, अध्याय 56–57) में वर्णित है कि जब श्रीकृष्ण ने अनजाने में चतुर्थी का चन्द्र-दर्शन किया, तो उन पर स्यमंतक मणि चोरी का झूठा आरोप लगा। यह कलंक इतना प्रबल था कि उनके भ्राता बलरामजी तक भ्रमित हो गये और कृष्णजी को दोषी समझ बैठे। यद्यपि सत्य यह था कि भगवान कृष्ण निर्दोष थे, किंतु लोकापवाद का कलंक उन पर लग ही गया।

यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि शास्त्रों में वर्णित निषेध मात्र कथा नहीं, बल्कि जीवन में घटने वाला अनुभव-सत्य है।


🌿 आधुनिक अनुभव

अनादि काल से लेकर आज तक अनेक साधकों ने अनुभव किया है कि चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन अनावश्यक विघ्न और कलंक का कारण बनता है। एक महात्मा का अनुभव अत्यंत रोचक है। वे कहते हैं—

“मैंने चौथ का चन्द्र देखा। मुझे तो तत्काल कुछ नहीं हुआ… किंतु कुछ ही दिनों में समाज ने मेरे ऊपर ऐसा कलंक मढ़ दिया, जिसकी कोई वास्तविकता नहीं थी। भले ही ब्रह्मज्ञानी पर इसका कोई प्रभाव न हो, किंतु सामान्य जन के लिए यह अत्यंत हानिकारक सिद्ध होता है।”

इससे यह सिद्ध होता है कि शास्त्र का वचन केवल लोक-आस्था नहीं, बल्कि अनुभव-समर्थित सत्य है।


🙏 उपशमन उपाय

यदि किसी से भूलवश चतुर्थी का चन्द्र-दर्शन हो जाए, तो घबराना नहीं चाहिए। श्रीमद्भागवत में वर्णित स्यमंतक मणि की कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करना चाहिए। इससे दोष शांति होती है।

साथ ही तृतीया या पंचमी का चन्द्र-दर्शन कर लेने से भी चतुर्थी-दर्शन का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। शास्त्रों ने करुणा-पूर्वक यह उपाय बताया है, ताकि भक्तगण व्याकुल न हों और उनके मन में श्रद्धा बनी रहे।


⚠️ सावधानी और संदेश

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्जित है। विशेष रूप से चन्द्रास्त समय तक इसका ध्यान रखना चाहिए। गणेशजी की वाणी है—

“जिस दिन तुमने मेरा उपहास किया, उसी दिन तुम्हारा दर्शन करने वाला कलंकित होगा।”


🌺 उपसंहार

✨ अतः हे भक्तों! इस दिन चन्द्र-दर्शन से पूर्णतः बचें और गणपति बप्पा की आराधना में लीन रहें। उन्हें दूर्वा, मोदक और अटूट श्रद्धा अर्पित करें। आत्मचिंतन करें कि बाहरी रूप क्षणिक है और सच्चा सौंदर्य केवल आत्मस्वरूप में है। यही गणेश चतुर्थी का गूढ़ रहस्य है, यही शास्त्र सम्मत, अनुभव प्रमाणित और आध्यात्मिक सत्य है। ✨