Saturday, 22 November 2025

पूज्य मोटा जी का प्रेरक प्रसंग

पूज्य मोटा जी का प्रेरक प्रसंग – त्राटक, निर्भयता और ओमकार जप की शक्ति


पूज्य मोटा सन् 1930 में स्वतंत्रता संग्राम में सत्याग्रहियों के साथ थे और इसी कारण एक बार साबरमती जेल पहुँचे। जेल में भीषण अत्याचार होते थे और जब कैदियों को खेड़ा जेल भेजा जाता था, तो एक छोटे दरवाज़े से सिर झुकाकर जाने के दौरान सिपाही उनकी पीठ पर बेरहमी से डंडा मारते थे।

पूज्य मोटा का नंबर पचासवाँ था। आगे के उनचास कैदियों पर डंडे बरसते देखकर वे सोचने लगे — “अब क्या करूँ?” तभी भीतर से आवाज़ आयी — “त्राटक कर!” यह उनके गुरुदेव धूनीवाले दादा श्री केशवानंदजी की प्रेरणा थी।

जब उनकी बारी आई, मोटा जी ने निर्भय होकर ओमकार जपा, गुरुदेव का स्मरण किया और डंडा मारने वाले सिपाही की आँखों में त्राटक किया। सिपाही ने डंडा उठाया पर मार न सका। बड़े अधिकारी ने भी कोशिश की, पर वे भी असफल रहे।

अंग्रेज अधिकारी हैरान होकर बोले— “इसके पास क्या शक्ति है?” जेलर ने बुलाया और पूछा— “तू कौन है? क्या जादू करता है?” मोटा जी ने कहा— “भाई! हम तो केवल भगवान का नाम लेते हैं। ईश्वर सबमें है, आपके अंदर भी है।”

मोटा जी की शांत, निर्भय और दिव्य दृष्टि से जेलर प्रभावित हो गया और रजिस्टर में लिख दिया— “इन्हें A-Class की सुविधा दी जाए — घी, गुड़, दूध, मच्छरदानी और सभी अधिकार।”

लेकिन motāji ने वह सुविधा अपने साथियों में बाँट दी और स्वयं “C-Class” भोजन ही करते रहे। वे कहते— “ऊपर-ऊपर तीन क्लास दिखाई देती हैं, पर भीतर तो सबमें वही एक सत्ता है।”

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