Wednesday, 30 July 2025

सच्ची प्यास की पहचान: आत्मज्ञान की प्यास की कथा

 


  कहानी की मुख्य विन्दु - 

  • सच्चा प्यासा मोलभाव नहीं करता।

  • जिसे सच में चाहिए, वह पहले समर्पण करता है, बाद में पूछता है।

  • सच्चे प्रेम, ईश्वर, ज्ञान और साधना की राह में तर्क-वाद नहीं, अनुभव और समर्पण चलता है।

  • जिन्हें वाकई कुछ पाना होता है, वे बहस नहीं करते, श्रम करते हैं।

कहानी - 

रेलवे स्टेशन की भीड़भाड़, भागती दौड़ती ज़िंदगी की झलक होती है। कहीं कोई ट्रेन पकड़ने की जल्दी में होता है, तो कहीं कोई बिछड़े हुए को गले लगाने आया होता है। उसी तरह उस दिन भी एक प्लेटफ़ॉर्म पर रोज़ की तरह अफरा-तफरी का माहौल था। गाड़ी आकर रुकी, और यात्रियों के बीच एक दुबला-पतला लड़का, सिर पर मटका और हाथ में गिलास लिए, आवाज़ लगाता हुआ दौड़ रहा था—"पानी ले लो! ठंडा पानी!"

उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन आंखों में चमक और आत्मविश्वास था। वह लड़का मेहनत करता था, इज्ज़त से कमाता था और ईमानदारी से अपने काम में लगा हुआ था।

सेठ और सौदा

ट्रेन के एक डिब्बे में एक अमीर सेठ बैठे थे। उनकी उम्र पचास के पार थी, पहनावे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह पैसे वाले और दुनियादारी में खूब डूबे हुए व्यक्ति हैं। उन्होंने उस लड़के को बुलाया, “ए लड़के, इधर आ!”

लड़का दौड़ता हुआ आया, और घड़े से पानी का गिलास भरकर सेठ की ओर बढ़ा दिया। सेठ ने पूछा, “कितने पैसे में?”

लड़के ने सीधे कहा, “पच्चीस पैसे।”

सेठ थोड़ा मुस्कराया और बोला, “पंद्रह में देगा क्या?”

लड़का हल्के से मुस्कराया, कुछ नहीं बोला। उसने धीरे से पानी वापस घड़े में उड़ेला और चुपचाप आगे बढ़ गया।

मौन में छिपा गूढ़ संदेश

उसी डिब्बे में एक साधु महात्मा बैठे हुए थे। उन्होंने यह सारा दृश्य देखा—लड़के का व्यवहार, उसका उत्तर न देना, उसकी हल्की मुस्कान और आगे बढ़ जाना।

महात्मा को लगा, इस बालक के मन में जरूर कोई गूढ़ रहस्य छिपा है। वे ट्रेन से नीचे उतर आए और धीरे-धीरे उस लड़के के पीछे चलने लगे।

“ऐ लड़के, ज़रा ठहरो,” महात्मा ने पुकारा।

लड़का ठिठका और विनम्रता से बोला, “जी महाराज?”

महात्मा ने पूछा, “बेटा, जब सेठ ने तुझसे मोलभाव किया, तब तू मुस्कराया क्यों? और कुछ बोला भी नहीं?”

बालक का उत्तर – अनुभव की गहराई

लड़का शांति से बोला, “महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को वास्तव में प्यास लगी ही नहीं थी। उन्हें केवल पानी का रेट पूछना था। यदि उन्हें सच में प्यास लगी होती, तो वह बिना कुछ कहे पानी का गिलास पकड़ लेते और पी लेते। कीमत बाद में पूछते।”

महात्मा यह सुनकर चकित रह गए। उन्होंने कहा, “तू तो बहुत समझदार निकला। ऐसा कैसे सोच लिया तूने?”

लड़का बोला, “महाराज, मैं हर रोज़ सैकड़ों यात्रियों को पानी पिलाता हूं। जिनको सच में प्यास लगती है, उनके होठ सूखे होते हैं, हाथ कांपते हैं और आंखें गिलास पर टिकी होती हैं। वे कभी रेट नहीं पूछते। लेकिन जो केवल शौक या आदत में पूछते हैं, वे मोलभाव करते हैं।”

प्रतीकात्मक व्याख्या

महात्मा कुछ देर मौन रहे, फिर बोले, “बेटा, तूने आज बहुत बड़ी बात कह दी। वास्तव में यह संसार भी एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, और जीवन एक यात्रा। कुछ लोग इस जीवन में सच्ची प्यास—परमात्मा, सत्य, प्रेम, और ज्ञान की प्यास—लेकर आते हैं। वे साधना में लगते हैं, सेवा करते हैं, सवाल नहीं करते। लेकिन बहुत से लोग केवल चर्चा, तर्क, और मोलभाव में फंसे रहते हैं—‘क्या मिलेगा, कितनी मेहनत करनी होगी, क्या फायदा होगा।’ ऐसे लोग जीवन की असली मिठास नहीं चख पाते।”

आध्यात्मिक संकेत

महात्मा ने कहा, “आजकल लोग भगवान का नाम तो लेते हैं, लेकिन उनके भीतर सच्ची तड़प नहीं है। वे पहले यह पूछते हैं—क्या फल मिलेगा? कितनी तपस्या करनी पड़ेगी? क्या फायदा होगा? लेकिन जो सच्चे साधक होते हैं, वे पहले खुद को समर्पित करते हैं, बाद में सोचते हैं कि भगवान क्या देगा। उनका विश्वास यह होता है—‘मैंने जो भी पाया वो उसकी मेहरबानी है, और जो खोया वह मेरी नादानी।’”

जीवन का दर्शन

उस बालक ने न कोई प्रवचन दिया, न कोई किताब पढ़ी थी, लेकिन उसके अनुभव ने उसे ज्ञान की ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। वह जानता था कि जीवन में जो सच्चा होता है, वह तर्क नहीं करता। जैसे सच्चा प्यासा रेट नहीं पूछता, वैसे ही सच्चा साधक प्रश्नों में नहीं उलझता।

सुखी जीवन का मंत्र

महात्मा ने अंत में कहा, “बेटा, तू धन्य है। तूने आज मुझे भी सिखा दिया कि ज़िंदगी में सच्ची प्यास ही हमें परम लक्ष्य तक ले जाती है। बाकी सब दिखावा है। कुछ लोग पूछते हैं—भगवान है भी या नहीं? मैं उनसे कहता हूं—अगर नहीं है, तो ज़िक्र क्यों? और अगर है, तो फिक्र क्यों?”

उस दिन वह बालक, जो प्लेटफॉर्म पर पानी बेच रहा था, एक जीवनदर्शन का प्रतीक बन गया।


 जीवन की सादगी और गहराई

"खूबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच –
ज़्यादा मैं मांगता नहीं, और कम वो देता नहीं।"

"मंज़िलें गुमराह कर देती हैं कभी-कभी,
इसलिए हर किसी से रास्ता नहीं पूछना चाहिए।"

"जन्म और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं,
पर जीवन को कैसे जीना है – यह पूरी तरह हमारे हाथ में है।"

इसलिए जीवन को हँसते-हँसते, मस्ती में, और पूरे समर्पण भाव से जीना ही सच्ची साधना है। 🌼




Tuesday, 29 July 2025

प्रगति की असली सीढ़ी - शिक्षक और चित्रकार शिष्य की कहानी

 



यह एक प्रेरणादायी कथा है, जो हमें आत्मविकास और सच्चे मार्गदर्शन की महत्ता सिखाती है। इस कहानी के केंद्र में एक युवा चित्रकार है—उत्साही, लगनशील और प्रतिभाशाली। उसके जीवन का उद्देश्य था एक ऐसा चित्र बनाना, जो कला की दुनिया में बेमिसाल हो। उसने अपने अनुभव, कल्पना और अभ्यास का पूरा सार एक चित्र में उड़ेलने का निश्चय किया।

साधना की शुरुआत

उसने एक खाली कैनवास लिया और रंगों की दुनिया में उतर गया। दिन-रात उसकी साधना चलती रही। वह कभी आकाश के रंग देखता, तो कभी फूलों की पंखुड़ियों की बनावट समझता। हर क्षण उसकी दृष्टि में कला ही बसती थी। वह चित्र कोई साधारण चित्र नहीं था—उस चित्र में उसने जीवन की गहराई, भावनाओं की तरलता, और सौंदर्य की सम्पूर्णता को उकेरने का प्रयास किया।

छह महीने बीत गए। उसने अपने घर से बाहर कदम भी कम ही रखा। भोजन और विश्राम भी केवल उतना ही करता, जितना आवश्यक था। उसके मन में केवल एक ही बात थी—"मुझे ऐसा चित्र बनाना है, जो गुरु की कसौटी पर खरा उतरे।" आखिरकार, वह दिन भी आया जब चित्र पूर्ण हुआ।

गुरु के पास पहुँचना

चित्र को सहेजकर वह सीधे अपने गुरु के पास पहुँचा। मन में थोड़ा उत्साह, थोड़ा भय और बहुत अधिक श्रद्धा थी। उसने चित्र गुरु को दिखाया। गुरु ने चित्र को ध्यान से देखा, उसकी प्रत्येक रेखा, प्रत्येक रंग की परछाईं को निहारा। कुछ क्षणों तक वह चुपचाप देखते रहे, फिर मुस्कराकर बोले—"वाह! बेटा, ऐसा चित्र तो मैं भी नहीं बना सका।"

यह वाक्य सुनते ही उस चित्रकार की आँखों में आँसू आ गए। गुरु ने चकित होकर पूछा, "तू रो क्यों रहा है? मैंने तो तेरे चित्र की प्रशंसा की है। यह तो गर्व का क्षण होना चाहिए।" लेकिन शिष्य की आँखों में कुछ और ही चल रहा था। वह बोला—

शिष्य की पीड़ा

"गुरुदेव, आप मेरे आदर्श हैं। आपसे बढ़कर चित्रकार मैं नहीं मानता। यदि आपने मेरे चित्र में कोई कमी नहीं बताई, कोई त्रुटि नहीं निकाली, तो मैं आगे कैसे बढ़ पाऊँगा? जब मेरे कार्य को सुधारने का मार्ग नहीं मिलेगा, तो मैं कैसे जान पाऊँगा कि कहाँ सुधार करना है?"

यह सुनकर गुरु गम्भीर हो गए। उन्होंने उस शिष्य को देखा, मानो पहली बार उसकी भीतरी प्यास को समझा हो। उन्होंने कहा, "बेटा, तू वास्तव में आगे बढ़ने की इच्छा रखता है, और यही बात तुझे महान बनाएगी। अधिकतर लोग प्रशंसा सुनकर रुक जाते हैं, लेकिन तू तो आलोचना चाहता है, क्योंकि तुझे सीखना है। यह भावना तुझे साधक से सिद्ध बना सकती है।"

सच्चा मार्गदर्शन

गुरु ने फिर से चित्र देखा, इस बार बहुत ही आलोचनात्मक दृष्टिकोण से। उन्होंने कहा, "अब जब तू स्वयं सीखना चाहता है, तो सुन। इस चित्र में तुझे जो भाव दिखता है, वह स्पष्ट है, लेकिन कुछ स्थानों पर छायांकन थोड़ा असंतुलित है। यदि तू इस रेखा को थोड़ा और महीन करता, तो गहराई और बढ़ती। यह रंग यहाँ थोड़ा चटक है, जो भाव को भंग कर रहा है। और इस पक्ष की रचना थोड़ी और संतुलित होती, तो दृष्टि केंद्रित रहती।"

शिष्य ने गौर से सुना, कुछ लिखा और कुछ अपने हृदय में उतार लिया। अब उसे मार्ग मिल गया था। प्रशंसा से नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और सुधार से ही आत्म-विकास होता है—यह बात उसके अंतर में उतर चुकी थी।

कथा का सार

यह कथा केवल एक चित्रकार की नहीं, हर उस साधक की है जो अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। चाहे वह कलाकार हो, लेखक हो, विद्यार्थी हो या आध्यात्मिक जिज्ञासु—जो व्यक्ति केवल प्रशंसा चाहता है, वह वहीं रुक जाता है जहाँ उसे "वाह!" मिल जाती है। लेकिन जो व्यक्ति अपने कार्य में सुधार के लिए सजग रहता है, आलोचना को सच्चे मन से स्वीकारता है, वही आगे बढ़ता है।

गुरु का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता, बल्कि शिष्य को उसकी अगली सीढ़ी तक पहुँचाना होता है। लेकिन यदि शिष्य ही केवल प्रशंसा चाहता है, तो गुरु भी मौन रह जाता है। जब शिष्य स्वयं कहता है—"मुझे कमी बताओ," तभी सच्चा ज्ञान और मार्गदर्शन संभव होता है।

अंत में

जीवन में आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम परिपूर्ण बन जाएँ। बल्कि यह आवश्यक है कि हम अपनी अपूर्णताओं को जानें और उन्हें स्वीकार करें। क्योंकि जहाँ स्वीकार है, वहीं सुधार का द्वार खुलता है।

इसलिए यदि कभी कोई आपके कार्य में कमी निकाले, तो उसे अपमान मत समझिए। बल्कि उस व्यक्ति का धन्यवाद कीजिए, जिसने आपको बेहतर बनने का अवसर दिया। यही भाव एक साधक को साधारण से असाधारण बना देता है।

"कमी पर दुखी मत हो,
कमी तो आगे बढ़ने का पहला संकेत है।
जो कमी देख पाए,
समझो उसने तुम्हें ऊँचाई का रास्ता दिखा दिया।"

Saturday, 1 March 2025

रजा देव बघेला की गुरु निष्ठा

 

 







    संत कबीर जी का जीवन लीला का समय पूरा होने वाला था। संसार से विदा लेने वाले थे, सभी भक्त दौड़-दौड़ कर आ रहे थे। वीर देव बघेला काशी के राजा थे, वह पहले कबीर जी का विरोध करते थे, लेकिन बाद में बहुत बड़े भक्त बन गए। विरोध इसलिए करते थे कि कबीर जी उनका महल देखें और उनकी सराहना करें, ऐसा उनका विचार था। पर कबीर दास जी ने कहा कि महल में दो अवगुण हैं। एक तो यह सदा नहीं रहेगा और दूसरा साथ नहीं चलेगा। राजा बघेल के अहंकार को चोट लगी, पर बाद में उन्होंने बहुत सोचा और सोचते-सोचते कहा कि बात तो सही है। ना तो यह महल हमेशा रहेगा और न ही मेरे साथ चलेगा।


    जब राजा को पता चला कि कबीर दास जी संसार से विदा लेने वाले हैं, तब वह दौड़ते-दौड़ते आए और उनके चरणों में गिरे और प्रणाम किया। वह कभी कबीर दास जी को देखते और कभी उनके चरणों में प्रणाम करते। राजा ने कहा, "महाराज, आप जा रहे हैं, मैं प्रण किया था कि गुरुदेव को अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाऊंगा, उनकी सेवा करूंगा और आप चोला छोड़ रहे हैं। तो मैं भी आपके साथ चलूंगा।" तभी कबीर जी ने देखा कि हृदय में सच्चाई है। कबीर जी तनिक मौन हुए और ईश्वर की मौज में डूबे, फिर सभी पर कृपापूर्ण दृष्टि डाली और वीर सिंह बघेल जी से कहा कि तुमने सच्चाई से प्रण किया है, ठीक है, 5 साल रुक जाते हैं। वीर सिंह बघेल राज भार, जिसको देना था, दे कर एक साधारण रसोईया और साधारण सफाई करने वाला बन गए और गुरु के द्वार पर आकर सेवा करने लग गए।


“गुरु की सेवा साधु जाने, गुरु सेवा क्या मूढ़ पिछाने”


    कबीर दास जी के 5 साल पूरे हो गए। बघेल की सेवा से संतुष्ट हुए कबीर दास जी ने जाते-जाते कहा कि बाघेला कि नाई अहंकार छोड़कर सच्चाई से सेवा करना। 


“क्योंकि देखने वाला तुम्हारी सच्चाई को भी देखता है और तुम्हारे दिखावेपन को भी देखता है।” 


    धन्य हैं भारत के ऐसे संत जो हँसते-खेलते मृत्यु को भी टाल  देते हैं। शिष्य के प्रेम और संकल्प के खातिर अपना संकल्प बदल देते हैं। बघेल जैसे शिष्य भी धन्य हैं जो अपना राजपाट छोड़, अहंकार छोड़ गुरु के द्वार में झाड़ू-बुहारी करते, बर्तन मांजते हैं। धन्य है भारत की गुरु-शिष्य परंपरा। धन्य है यहाँ की संस्कृति जहाँ स्वयं भगवान भी जन्म लेने को लालायित होते हैं।


* * * * *






Wednesday, 26 February 2025

शिवरात्रि में निशीथ काल क्या होता है?


निशीथ काल क्या होता है ?

शास्त्रों के अनुसार, निशित काल उस समय को कहा जाता है जब रात्रि अपने मध्य में होती है. निशित काल की अवधि एक घंटे से भी कम होती है. पंचांग के अनुसार इसे रात का आठवां मुहूर्त कहा जाता है जो कि ज्योतिषीय गणनाओं के बाद निर्धारित किया जाता है.

निशीथ काल क्यों होता है ?

महाशिवरात्रि के दिन निशित काल में पूजा करने का महत्व माना गया है. क्योंकि मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव पृथ्वी पर शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे, वह निशितकाल का ही समय था. यही कारण है कि भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए निशितकाल को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. खासकर शिवलिंग पूजन के लिए निशितकाल अच्छा समय माना जाता है.

निशीथ काल कब होता है ?

 यह समय आधी रात या 12 बजे के करीब होता है. मान्यता है कि इस समय शिव की ऊर्जा ब्रह्मांड में सर्वव्यापी होती है. 


निशीथ काल के बारे में कुछ और बातें:

  • शास्त्रों के मुताबिक, यह समय अदृश्य शक्तियों और भूत-पिशाचों का समय होता है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना सबसे शुभ माना गया है. 

  • मान्यता है कि निशीथ काल में शिव पूजा करने से भक्त की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. 

  • निशीथ काल में ध्यान करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा करने से अनंत पुष्यफल मिलता है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा करने से भक्त की सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था तक पहुंचने में मदद मिलती है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. 




Thursday, 13 June 2024

संसार कैसा है ?

        




        एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा,'गुरुदेव’,आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है? इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई।'एक नगर में एक शीश महल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जड़े हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देख कर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीश महल पहुंचा। वह खुश मिजाज और जिंदा दिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा..'संसार भी ऐसा ही शीश महल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।'








Saturday, 11 May 2024

सूरदास


सूरदास



        सूरदासजी जन्मांध थे उनके कोई गुरु भी नहीं थे, फिर भी कृष्ण भक्ति रस की ऐसी वर्षा, जो 'मैं' को भिगो दे.. उन्हें कैसे मिली, जब भी कभी वो किसी गड्ढे में गिरते या नदी खाई में या झरने में गिराने वाले रहते तो, उन्हें भगवन स्वयं आके बचाते थे..!!


सूरदास जी के जीवन परिचय

            सूरदास, भारतीय साहित्य के प्रमुख संत-कवि थे जिनकी रचनाएं भक्ति, प्रेम, और आध्यात्मिकता के माध्यम से जनता के बीच लोकप्रिय थीं। सूरदास का जन्म 1478 ईसा पूर्व में वाराणसी के पास सिथली नामक गाँव में हुआ था। उनका असली नाम सुदास था, लेकिन उन्हें 'सूरदास' के नाम से अधिक पहचाना जाता है। सूरदास की रचनाओं में गोपीयों के प्रेम, राधा-कृष्ण का लीलाचरित्र, और भक्ति की उच्चता का वर्णन है।

सूरदास के दोहे उनकी आध्यात्मिक भावना और भक्ति का प्रतिक हैं। उनके दोहे भक्ति-मार्ग के आधारशिला माने जाते हैं और उनमें दिव्यता की अनुभूति का संवेदनशीलता से विवरण है।

सूरदास के दोहे में एक सामाजिक संदेश भी छिपा होता है। उन्होंने भ्रष्टाचार, अंधविश्वास, और सामाजिक असमानता के खिलाफ विचार किए। उनके दोहे सामान्य जीवन के मूल्यों की बड़ी मात्रा में समर्थन करते हैं और जीवन को सरल, साफ, और निष्कपट बनाने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

सूरदास के दोहे अपने अन्य ग्रंथों के साथ भारतीय साहित्य का अमूल्य अंग हैं। उनकी कविताएं और दोहे आज भी हमें आध्यात्मिक उद्धारण और जीवन में सही मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनकी भावनाओं की गहराई, उनके भक्तिभाव, और उनकी कल्पनाशीलता का विस्तार हमें एक अद्वितीय साहित्यिक अनुभव प्रदान करता है।


उद्धव बने सूरदास

सूरदास जी के ज्ञान और भक्ति से पूरी दुनिया चकित थी की सूरदासजी कृष्ण की ऐसी छवि कैसे देख पाते और उन्हें ऐसा ज्ञान कैसे मिल गया..!!

इसका जवाब भी भागवत में है, द्वापर युग में जब कृष्ण वृन्दावन छोड़ मथुरा चले गए थे, तब उन के विरह में गोपिया बेसुध रहती और सब कुछ भूल कर विलाप करती थी.. जब कृष्ण मथुरा के राजा बने तो कर्मयोग के कारण वापस वृन्दावन कभी नहीं लौट पाये.. जब उन्हें ये समाचार मिला तो उन्होंने अपने परम ज्ञानी दोस्त उद्धव को गोपियों को समझने भेजा की वो विलाप छोड़ दे और दुखी न हो मूर्त रूप को छोड़ कर परम स्वरुप में ध्यान लगाये.. उद्धव को भी घमंड था, अपने ज्ञान का और वो वृन्दावन पहुँच गए और गोपियों को उपदेश देने लगे और उन्हें कृष्ण के शरीर रूपी स्वरुप से मोह का त्याग करने कहने लगे. उद्धव ने गोपियों का उपहास भी उड़ाया.. तब गोपियों ने भी उद्धव को ऐसे ऐसे तर्क दिए, जिन्हे सुन कर उसका भी माथा ठमका और उसे अपना ज्ञान भी कम लगने लगा.. ये तो प्रेम की बात है उद्धव आशिकी इतनी सस्ती नहीं है..!!

उसके उद्धव के उपहास से क्रोधित हो, राधा की सखी ललिता ने श्राप दिया की उद्धवजी आप कृष्ण के शरीर रूप से मोह भंग करने को कह रहे हो पर ये संभव नहीं है, अत्यंत दुष्कर है आप को इस का ज्ञान नहीं है.. ललिता ने श्राप दिया कि जिस तरह हम कृष्ण के दर्शन को तरस रहे है, उसी तरह तुम भी तरसोगे, पर तुम्हे आँखों से दर्शन नहीं होंगे.. तब तुम्हे मन की आँखों से ही देखना होगा, जैसा तुम हमें करने को कह रहे हो.. तब तुम्हे हमारी पीड़ा का एहसास होगा.. उद्धव पर गोपियों का ऐसा रंग चढ़ा कि वो खुद बावले प्रतीत हो रहे थे और उन्होंने कृष्ण के पास जा कर गोपियों का दर्द कहा और खुद भी विलाप करने लगे..!!

तब कृष्ण ने उद्दव को श्राप में सहायता का आश्वासन दिया.. सूरदास के रूप में उसी उद्धव ने जन्म लिया और ललिता का श्राप भोगा.. मन में तो कृष्ण थे, पर अपनी आँखों से वो देख नहीं पाये और तब उन्हें गोपियों के दर्द का एहसास हुआ.. जिसका उन्होंने उद्धव रूप में उपहास उड़ाया था..!!





सबसे ज्यादा प्रचलित सूरदास जी के दोहे -



1. बिन सतसंगते मिलै नहीं मोहि, रति कृष्ण भजन में।

गोरी किरीती कम्पै करि बूझै, तात गुरु बिनु बैकुंठ में॥



2. मानस के हृदय बसहु स्यामा संग, जोय कछु सोवत नहिं अंग।

संगी संग संगी नर, फिरे ताहि पथ देसु, कहि सूरदास भजहुरी मन भावन रंग॥



3. अपने मन को जीतना है, विश्वास रखो राम में।

कर्म करो फल की इच्छा मत करो, इश्वर को समर्पित करो धरती पर॥



4. जाहिं गोराख नाथ नरद, धरतें ध्यान बड़ाई।

सूरदास ने कही आप, तब समुझौं मुख समुझ माई॥



5. चितवत बिरहिनी कृष्ण को, तब मूढ़ जीव भए।

कहते सूरदास, इतना ध्यान, साधो बिरहिनी न सुन जाए॥



6. सूरदास प्रभु साचे, मिलि है निरंजन भाव।

जन सुन सुन बहुत लोभी, ध्यान धरे चार नाव॥



7. दुर्बुद्धि जन जोषी लोभ में, अज्ञान धरै को दार।

सूरदास कहते, ऐसे मन नहीं बिसार॥



8. गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपकी, जिन गोविन्द दियो बताय॥



9. देखा जब तब सभी कोई, लगता दुख का मोह।

सूरदास कहते भजो भगवान, जो तुम्हे मिलें दोनों॥



10. साधु संग लागे आधार, राम भजन रसिक प्यार।

कहते सूरदास, बिन संतोष कोई, किन्ह का मन ध्यार॥



ये दोहे सूरदास जी के काव्यसंग्रह में सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं और सामाजिक, आध्यात्मिक, और नैतिक मुद्दों पर गहरा प्रभाव डालते हैं।





 *     *     *     *     *

Tuesday, 7 May 2024

रवींद्रनाथ टैगोर

      

रवींद्रनाथ टैगोर


          रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के महान और अग्रणी व्यक्तित्वों में से एक हैं। उन्हें भारतीय और विश्व साहित्य के महान कवि, लेखक, और धर्मगुरु के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था और उनकी मृत्यु 7 अगस्त 1941 को हुई थी।

        रवींद्रनाथ टैगोर ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपन्यास, कविता, नाटक, गीत, और अन्य विधाओं में अपनी रचनाएँ लिखीं। उनके लेखन में धर्म, प्रेम, और मानवता के महत्वपूर्ण विषयों पर बल दिया गया।

        रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं को एक विश्व कवि माना, जिनका काव्य और विचार सर्वदेशीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डाला। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से मानवता के साथ जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार किए और सामाजिक परिवर्तन के लिए आवाज उठाई।

        रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं में भावनात्मकता और सुन्दरता का अद्वितीय संगम होता है। उनकी कविताओं में प्रकृति, प्रेम, आत्मविश्वास, और भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम का उदाहरण होता है।

        टैगोर की नाटक रचनाओं में उन्होंने समाज, धर्म, और मानवता के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। उनका प्रसिद्ध नाटक "चित्रा" और "रक्तकरवी" इसका अद्वितीय उदाहरण हैं।

        रवींद्रनाथ टैगोर के विचार और उनकी रचनाएँ अभिजात मानवता की अहम पहचान बनीं। उनके विचारों में स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, और मानवता के मूल्यों का प्रमोद था।

        रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने विचारों को स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय एकता, और सामाजिक सुधार के लिए भी उत्तेजित किया। उन्होंने अपनी साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्षमता के माध्यम से लोगों को जोड़ा और प्रेरित किया।

        रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव भारतीय समाज में अद्वितीय है। उनके विचारों और रचनाओं का प्रभाव आज भी भारतीय साहित्य, संस्कृति, और समाज पर महसूस किया जा सकता है।

        अंत में, रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के एक अमूल्य रत्न हैं, जिनकी रचनाएँ हमें धर्म, प्रेम, और मानवता के महत्व को समझने और महसूस करने का मार्ग दिखाती हैं। उनके विचारों और उनकी कला का महत्व आज भी हमारे जीवन में अटल है। उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।

   *     *     *     *     *