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Tuesday, 13 January 2026

पितामह भीष्म और उत्तरायण

 

अष्ट वसु, नंदिनी और भीष्म: कर्म, श्राप और मोक्ष की अमर कथा



देवलोक में अष्ट वसु—आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—धर्म, तेज और सेवा के प्रतीक माने जाते थे। इन वसुओं में प्रभास सबसे अधिक तेजस्वी थे। एक समय ये सभी महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में अतिथि बनकर पहुँचे। वशिष्ठ मुनि का आश्रम तप, शांति और दिव्य समृद्धि का केंद्र था। उसी आश्रम में निवास करती थीं दिव्य कामधेनु नंदिनी, जो केवल एक गाय नहीं, बल्कि धर्म, अन्न और यज्ञ की साक्षात् शक्ति थीं।

नंदिनी के अनुपम सौंदर्य और अद्भुत सामर्थ्य को देखकर प्रभास वसु की पत्नी का मन मोहित हो उठा। उनके हृदय में यह कामना जागी कि यदि यह दिव्य गाय उनकी सखी के पास चली जाए, तो उसका जीवन धन्य हो जाए। उन्होंने यह इच्छा प्रभास के सामने रखी। प्रभास ने शांत और विवेकपूर्ण स्वर में उत्तर दिया कि यह ऋषि की संपत्ति है, और चोरी का फल अवश्य भोगना पड़ता है; देव होकर अधर्म करना उन्हें शोभा नहीं देता।

किन्तु बार-बार का आग्रह, सखी के प्रति करुणा और पत्नी के भावनात्मक दबाव के कारण प्रभास का विवेक धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। अंततः अन्य वसुओं की मौन सहमति के साथ उन्होंने महर्षि वशिष्ठ की नंदिनी का अपहरण कर लिया।

महर्षि वशिष्ठ ध्यानस्थ थे। तपोबल से उन्होंने तुरंत जान लिया कि यह कृत्य अष्ट वसुओं द्वारा किया गया है। उनका वचन क्रोध से नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए निकला—जो देव धर्म का उल्लंघन करेंगे, वे देवपद से गिरकर मनुष्य योनि में जन्म लेंगे। यह सुनकर देवता भयभीत हो उठे और ब्रह्मा की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा ने स्पष्ट कहा कि ऋषि का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता।

देवताओं की करुण प्रार्थना पर यह विधान हुआ कि सात वसु मनुष्य योनि में जन्म लेकर शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होंगे, जिससे उन्हें तुरंत मुक्ति मिल जाएगी। किंतु आठवाँ वसु प्रभास, जिसने प्रत्यक्ष रूप से अधर्म किया था, उसे दीर्घ जीवन भोगना पड़ेगा।

इसी श्राप और वर के विधान से राजा शंतनु और देवी गंगा के यहाँ अष्ट वसुओं का जन्म हुआ। जन्म लेते ही गंगा ने अपने सात पुत्रों को जल में प्रवाहित कर दिया, जिससे वे बंधन से मुक्त हो गए। आठवाँ पुत्र जीवित रहा। वही प्रभास वसु आगे चलकर देवव्रत कहलाया और कालांतर में वही संसार में भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भीष्म धर्म की सजीव प्रतिमा थे। पिता की प्रसन्नता और वचन की रक्षा के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत धारण किया। उनकी इस अनुपम प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ।

महाभारत के महासंग्राम में भीष्म शरशय्या पर लेटे रहे। वे चाहें तो उसी क्षण अपने प्राण त्याग सकते थे, किंतु उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की। शास्त्र कहते हैं कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाला योगी सूर्य मार्ग से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। भीष्म जानते थे कि काल, दिशा और चेतना—तीनों का समन्वय ही उत्तम गति का कारण बनता है।

जब उत्तरायण का पुण्य काल आया, भीष्म ने अपने नेत्र मूँद लिए। शरशय्या पर लेटे-लेटे उन्होंने परब्रह्म परमात्मा की स्तुति की—उस परब्रह्म की, जो कर्म, श्राप और वर से परे है, और फिर भी सबका साक्षी है। उस समय स्वयं श्रीकृष्ण उनके समीप उपस्थित थे। भीष्म की चेतना धीरे-धीरे शब्द, रूप और देह की सीमाओं को पार करती हुई ब्रह्म में लीन हो गई। इस प्रकार प्रभास वसु का अधूरा कर्म पूर्ण हुआ और एक श्राप अंततः मोक्ष में परिवर्तित हो गया।

शिक्षा

यह कथा हमें गहराई से यह सिखाती है कि कर्म का विधान देवताओं पर भी समान रूप से लागू होता है। विवेक से किया गया छोटा-सा निर्णय जीवन की दिशा बदल सकता है, और भावनात्मक आग्रह में लिया गया एक गलत कदम दीर्घ भोग का कारण बन जाता है।

अष्ट वसुओं का पतन यह स्मरण कराता है कि धर्म केवल ज्ञान से नहीं, आचरण से जीवित रहता है। वहीं भीष्म का जीवन यह दर्शाता है कि यदि मनुष्य जीवन भर सत्य, संयम और प्रतिज्ञा का पालन करे, तो सबसे कठोर कर्मफल भी अंततः मोक्ष का मार्ग बन सकता है।

उत्तरायण की प्रतीक्षा करता हुआ भीष्म हमें यह शिक्षा देता है कि काल, दिशा और चेतना का सामंजस्य आध्यात्मिक उन्नति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंततः यह कथा यही कहती है कि श्राप और वर दोनों से परे केवल परब्रह्म की शरण ही परम शांति और मुक्ति का साधन है।

हरि ॐ।

Monday, 18 August 2025

दुःख पड़े तो क्या करें? - मदालसा प्रसंग

 

 


एक लड़की ने ठान लिया कि मैं पहले आत्मविद्या पाऊँगी, जिससे सारे दुख सदा के लिए मिट जाएँ और परमात्मा का साक्षात्कार हो जाए। उसने सत्संग किया, अनुष्ठान किया और अंततः उसे साक्षात्कार प्राप्त हुआ।


वह बड़े घर की राजकन्या थी, उसका नाम था मदालसा। शादी हो गई तो उसने सोचा – “मेरे गर्भ से जो संतान जन्म लेगी, वे अज्ञानी कैसे रहें? संसार में लोग तो भगवान को बड़ा मानते हैं, परंतु मैं अपने बच्चों को आत्मा और परमात्मा का ज्ञान देकर उन्हें भगवद्रूप बनाऊँगी।”


मदालसा अपने शिशुओं को दूध पिलाते समय भी यही उपदेश देती – “तू शुद्ध है, तू अमर है, तू आत्मा है, तू चेतन है। मरने वाला शरीर तू नहीं है, बदलने वाला मन तू नहीं है, बदलने वाली बुद्धि तू नहीं है, तू अहंकार नहीं है। तू तो चैतन्य आत्मा है, अमर है। अपनी अमरता को पहचान।” 


लोरी में भी वही बातें कहती और जब बच्चे समझदार होते, तो उन्हें आत्मज्ञान से पूर्ण कर देती। एक-एक करके चार पुत्र आत्मसाक्षात्कार कर महापुरुष बन गए।


जब पाँचवें पुत्र अलर्क  का जन्म हुआ, तो मदालसा ने वही उपदेश देना चाहा, पर राजा ने कहा – *“यदि यह भी स्वतंत्र महापुरुष बन गया तो राजकाज कौन संभालेगा?”इसलिए अलर्क को पूरा आत्मज्ञान नहीं दिया गया, केवल थोड़ा-सा मार्गदर्शन दिया गया।


समय बीता, मदालसा वृद्ध हो गई। उसने सोचा – “अब यह शरीर कभी भी समाप्त हो सकता है और मेरे अलर्क पुत्र को आत्मज्ञान नहीं मिला है। जब यह बड़े संकट में होगा, तब इसे दुख सताएगा।” उसने एक चिट्ठी लिखकर ताबीज में डाल दी और अलर्क को देते हुए कहा – “बेटा! जब बहुत बड़ी मुसीबत आ जाए और कोई उपाय न सूझे, तब यह ताबीज खोलना।”


मां का देहांत हो गया। अलर्क राजा बन गया। संसार में कौन-सा ऐसा राज्य है जिसमें चिंता, दुख और टेंशन न हो? जिनके पास आत्मज्ञान नहीं है, उन्हें तो हर हाल में चिंता सताती है।


चारों भाइयों ने सोचा – “हमारी मां का उद्देश्य था कि सब पुत्र आत्मसाक्षात्कार करें, पर अलर्क रह गया। यह राजा है, इसलिए उपदेश मानने वाला नहीं है। बिना संकट के यह संत के पास नहीं जाएगा।”


इसलिए उन्होंने काशी नरेश से मिलकर नाटक रचा और फौज लेकर अलर्क के राज्य को चारों ओर से घेर लिया। अलर्क घबरा गया – *“मेरे अपने भाई और काशी नरेश मिलकर युद्ध करेंगे तो मैं क्या करूँगा?”* दुखी होकर उसे मां की दी हुई ताबीज याद आई। उसने खोलकर देखा, उसमें लिखा था –

“दुख पड़े तो संत शरण जाइए।”


अलर्क तुरंत संत गोरखनाथ के पास पहुँचा और बोला – *“महाराज! मैं बहुत दुखी हूँ। मेरे भाई और काशी नरेश युद्ध कर रहे हैं, मैं कुछ नहीं कर पा रहा।”


गुरु गोरखनाथ ने कहा – “ठहरो।”* पास रखे अंगारे में चिमटा डालकर जब वह तपकर लाल हो गया, तो उन्होंने कहा – “तेरे दिल में दुख है न? हाथ हटाओ, दुख को मारते हैं। बताओ, दुख कहाँ है? दुख पहले था क्या? नहीं। अब आया है तो क्यों आया है? तू दुखी है या दुख आया है? जब दुख नहीं था, तब भी तू था। और जब दुख चला जाएगा, तब भी तू रहेगा। तो दुख कहाँ है?”


अलर्क ने गहराई से सोचा। उसे समझ आया – "महाराज! दुख इसलिए है कि मैं शरीर और राज्य को ‘मैं’ मान बैठा हूँ। राज्य सदा रहने वाला नहीं, शरीर भी सदा रहने वाला नहीं। यही मूर्खता दुख का कारण है। वास्तव में मैं तो अमर आत्मा हूँ, परंतु अभी मैंने आत्मा को पहचाना नहीं।”


गुरु ने कहा – “अच्छा, जो ‘नहीं जानना’ है, उसको कौन जानता है? खोज।”

ध्यान गहरा हुआ, और अचानक उसे अनुभूति हुई – “नहीं जानने को जो जानता है, वही आत्मा-परमात्मा है।”


क्षणभर में अलर्क को परम शांति मिली। उसकी आँखों में दिव्य चमक आ गई, चेहरे पर आनंद खिल उठा। उसने गुरु को प्रणाम करते हुए कहा – “महाराज! अब सदा के लिए दुख मिट गए। अब तो मृत्यु भी मुझे दुखी नहीं कर सकती। आपकी कृपा से आत्मविद्या का प्रकाश हो गया।”


उसने भाइयों को संदेश भेजा – "मैंने अब तक राजकाज संभाला, अब तुम संभालो।" पर भाइयों ने गले लगाकर कहा – “हमें राज्य नहीं चाहिए। हम तो केवल चाहते थे कि तू आत्मराज प्राप्त करे, इसलिए यह नाटक किया था। अब तू जीवनमुक्त होकर राज्य कर, अब तेरे लिए यह बंधन नहीं रहा।”


उस दिन से अलर्क ने निर्लिप्त होकर राज्य किया। क्योंकि जिसने आत्मराज पा लिया, उसके लिए बाहरी राज कोई बंधन नहीं रहता। आसक्ति मिट जाती है, और जब आसक्ति मिट जाती है, तब चिंता और दुख भी मिट जाते हैं।


जो अपने को चाहिए – वह तो स्वयं हम हैं, अमर चैतन्य आत्मा। उसे मौत भी नहीं छीन सकती। और जो नश्वर है – शरीर, धन, राज्य – वह चाहे जितना संभालें, एक दिन छूट ही जाएगा। फिर उसमें आसक्ति क्यों?


धर्म के अनुसार व्यवहार करते हुए भी भीतर से निर्भय रहना चाहिए। क्योंकि सत्य तो यही है – आत्मा अमर है, चैतन्य है, और मृत्यु केवल नश्वर शरीर को छू सकती है, आत्मा को नहीं।

 

Wednesday, 30 July 2025

सच्ची प्यास की पहचान: आत्मज्ञान की प्यास की कथा

 


  कहानी की मुख्य विन्दु - 

  • सच्चा प्यासा मोलभाव नहीं करता।

  • जिसे सच में चाहिए, वह पहले समर्पण करता है, बाद में पूछता है।

  • सच्चे प्रेम, ईश्वर, ज्ञान और साधना की राह में तर्क-वाद नहीं, अनुभव और समर्पण चलता है।

  • जिन्हें वाकई कुछ पाना होता है, वे बहस नहीं करते, श्रम करते हैं।

कहानी - 

रेलवे स्टेशन की भीड़भाड़, भागती दौड़ती ज़िंदगी की झलक होती है। कहीं कोई ट्रेन पकड़ने की जल्दी में होता है, तो कहीं कोई बिछड़े हुए को गले लगाने आया होता है। उसी तरह उस दिन भी एक प्लेटफ़ॉर्म पर रोज़ की तरह अफरा-तफरी का माहौल था। गाड़ी आकर रुकी, और यात्रियों के बीच एक दुबला-पतला लड़का, सिर पर मटका और हाथ में गिलास लिए, आवाज़ लगाता हुआ दौड़ रहा था—"पानी ले लो! ठंडा पानी!"

उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन आंखों में चमक और आत्मविश्वास था। वह लड़का मेहनत करता था, इज्ज़त से कमाता था और ईमानदारी से अपने काम में लगा हुआ था।

सेठ और सौदा

ट्रेन के एक डिब्बे में एक अमीर सेठ बैठे थे। उनकी उम्र पचास के पार थी, पहनावे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह पैसे वाले और दुनियादारी में खूब डूबे हुए व्यक्ति हैं। उन्होंने उस लड़के को बुलाया, “ए लड़के, इधर आ!”

लड़का दौड़ता हुआ आया, और घड़े से पानी का गिलास भरकर सेठ की ओर बढ़ा दिया। सेठ ने पूछा, “कितने पैसे में?”

लड़के ने सीधे कहा, “पच्चीस पैसे।”

सेठ थोड़ा मुस्कराया और बोला, “पंद्रह में देगा क्या?”

लड़का हल्के से मुस्कराया, कुछ नहीं बोला। उसने धीरे से पानी वापस घड़े में उड़ेला और चुपचाप आगे बढ़ गया।

मौन में छिपा गूढ़ संदेश

उसी डिब्बे में एक साधु महात्मा बैठे हुए थे। उन्होंने यह सारा दृश्य देखा—लड़के का व्यवहार, उसका उत्तर न देना, उसकी हल्की मुस्कान और आगे बढ़ जाना।

महात्मा को लगा, इस बालक के मन में जरूर कोई गूढ़ रहस्य छिपा है। वे ट्रेन से नीचे उतर आए और धीरे-धीरे उस लड़के के पीछे चलने लगे।

“ऐ लड़के, ज़रा ठहरो,” महात्मा ने पुकारा।

लड़का ठिठका और विनम्रता से बोला, “जी महाराज?”

महात्मा ने पूछा, “बेटा, जब सेठ ने तुझसे मोलभाव किया, तब तू मुस्कराया क्यों? और कुछ बोला भी नहीं?”

बालक का उत्तर – अनुभव की गहराई

लड़का शांति से बोला, “महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को वास्तव में प्यास लगी ही नहीं थी। उन्हें केवल पानी का रेट पूछना था। यदि उन्हें सच में प्यास लगी होती, तो वह बिना कुछ कहे पानी का गिलास पकड़ लेते और पी लेते। कीमत बाद में पूछते।”

महात्मा यह सुनकर चकित रह गए। उन्होंने कहा, “तू तो बहुत समझदार निकला। ऐसा कैसे सोच लिया तूने?”

लड़का बोला, “महाराज, मैं हर रोज़ सैकड़ों यात्रियों को पानी पिलाता हूं। जिनको सच में प्यास लगती है, उनके होठ सूखे होते हैं, हाथ कांपते हैं और आंखें गिलास पर टिकी होती हैं। वे कभी रेट नहीं पूछते। लेकिन जो केवल शौक या आदत में पूछते हैं, वे मोलभाव करते हैं।”

प्रतीकात्मक व्याख्या

महात्मा कुछ देर मौन रहे, फिर बोले, “बेटा, तूने आज बहुत बड़ी बात कह दी। वास्तव में यह संसार भी एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, और जीवन एक यात्रा। कुछ लोग इस जीवन में सच्ची प्यास—परमात्मा, सत्य, प्रेम, और ज्ञान की प्यास—लेकर आते हैं। वे साधना में लगते हैं, सेवा करते हैं, सवाल नहीं करते। लेकिन बहुत से लोग केवल चर्चा, तर्क, और मोलभाव में फंसे रहते हैं—‘क्या मिलेगा, कितनी मेहनत करनी होगी, क्या फायदा होगा।’ ऐसे लोग जीवन की असली मिठास नहीं चख पाते।”

आध्यात्मिक संकेत

महात्मा ने कहा, “आजकल लोग भगवान का नाम तो लेते हैं, लेकिन उनके भीतर सच्ची तड़प नहीं है। वे पहले यह पूछते हैं—क्या फल मिलेगा? कितनी तपस्या करनी पड़ेगी? क्या फायदा होगा? लेकिन जो सच्चे साधक होते हैं, वे पहले खुद को समर्पित करते हैं, बाद में सोचते हैं कि भगवान क्या देगा। उनका विश्वास यह होता है—‘मैंने जो भी पाया वो उसकी मेहरबानी है, और जो खोया वह मेरी नादानी।’”

जीवन का दर्शन

उस बालक ने न कोई प्रवचन दिया, न कोई किताब पढ़ी थी, लेकिन उसके अनुभव ने उसे ज्ञान की ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। वह जानता था कि जीवन में जो सच्चा होता है, वह तर्क नहीं करता। जैसे सच्चा प्यासा रेट नहीं पूछता, वैसे ही सच्चा साधक प्रश्नों में नहीं उलझता।

सुखी जीवन का मंत्र

महात्मा ने अंत में कहा, “बेटा, तू धन्य है। तूने आज मुझे भी सिखा दिया कि ज़िंदगी में सच्ची प्यास ही हमें परम लक्ष्य तक ले जाती है। बाकी सब दिखावा है। कुछ लोग पूछते हैं—भगवान है भी या नहीं? मैं उनसे कहता हूं—अगर नहीं है, तो ज़िक्र क्यों? और अगर है, तो फिक्र क्यों?”

उस दिन वह बालक, जो प्लेटफॉर्म पर पानी बेच रहा था, एक जीवनदर्शन का प्रतीक बन गया।


 जीवन की सादगी और गहराई

"खूबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच –
ज़्यादा मैं मांगता नहीं, और कम वो देता नहीं।"

"मंज़िलें गुमराह कर देती हैं कभी-कभी,
इसलिए हर किसी से रास्ता नहीं पूछना चाहिए।"

"जन्म और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं,
पर जीवन को कैसे जीना है – यह पूरी तरह हमारे हाथ में है।"

इसलिए जीवन को हँसते-हँसते, मस्ती में, और पूरे समर्पण भाव से जीना ही सच्ची साधना है। 🌼




Tuesday, 29 July 2025

प्रगति की असली सीढ़ी - शिक्षक और चित्रकार शिष्य की कहानी

 



यह एक प्रेरणादायी कथा है, जो हमें आत्मविकास और सच्चे मार्गदर्शन की महत्ता सिखाती है। इस कहानी के केंद्र में एक युवा चित्रकार है—उत्साही, लगनशील और प्रतिभाशाली। उसके जीवन का उद्देश्य था एक ऐसा चित्र बनाना, जो कला की दुनिया में बेमिसाल हो। उसने अपने अनुभव, कल्पना और अभ्यास का पूरा सार एक चित्र में उड़ेलने का निश्चय किया।

साधना की शुरुआत

उसने एक खाली कैनवास लिया और रंगों की दुनिया में उतर गया। दिन-रात उसकी साधना चलती रही। वह कभी आकाश के रंग देखता, तो कभी फूलों की पंखुड़ियों की बनावट समझता। हर क्षण उसकी दृष्टि में कला ही बसती थी। वह चित्र कोई साधारण चित्र नहीं था—उस चित्र में उसने जीवन की गहराई, भावनाओं की तरलता, और सौंदर्य की सम्पूर्णता को उकेरने का प्रयास किया।

छह महीने बीत गए। उसने अपने घर से बाहर कदम भी कम ही रखा। भोजन और विश्राम भी केवल उतना ही करता, जितना आवश्यक था। उसके मन में केवल एक ही बात थी—"मुझे ऐसा चित्र बनाना है, जो गुरु की कसौटी पर खरा उतरे।" आखिरकार, वह दिन भी आया जब चित्र पूर्ण हुआ।

गुरु के पास पहुँचना

चित्र को सहेजकर वह सीधे अपने गुरु के पास पहुँचा। मन में थोड़ा उत्साह, थोड़ा भय और बहुत अधिक श्रद्धा थी। उसने चित्र गुरु को दिखाया। गुरु ने चित्र को ध्यान से देखा, उसकी प्रत्येक रेखा, प्रत्येक रंग की परछाईं को निहारा। कुछ क्षणों तक वह चुपचाप देखते रहे, फिर मुस्कराकर बोले—"वाह! बेटा, ऐसा चित्र तो मैं भी नहीं बना सका।"

यह वाक्य सुनते ही उस चित्रकार की आँखों में आँसू आ गए। गुरु ने चकित होकर पूछा, "तू रो क्यों रहा है? मैंने तो तेरे चित्र की प्रशंसा की है। यह तो गर्व का क्षण होना चाहिए।" लेकिन शिष्य की आँखों में कुछ और ही चल रहा था। वह बोला—

शिष्य की पीड़ा

"गुरुदेव, आप मेरे आदर्श हैं। आपसे बढ़कर चित्रकार मैं नहीं मानता। यदि आपने मेरे चित्र में कोई कमी नहीं बताई, कोई त्रुटि नहीं निकाली, तो मैं आगे कैसे बढ़ पाऊँगा? जब मेरे कार्य को सुधारने का मार्ग नहीं मिलेगा, तो मैं कैसे जान पाऊँगा कि कहाँ सुधार करना है?"

यह सुनकर गुरु गम्भीर हो गए। उन्होंने उस शिष्य को देखा, मानो पहली बार उसकी भीतरी प्यास को समझा हो। उन्होंने कहा, "बेटा, तू वास्तव में आगे बढ़ने की इच्छा रखता है, और यही बात तुझे महान बनाएगी। अधिकतर लोग प्रशंसा सुनकर रुक जाते हैं, लेकिन तू तो आलोचना चाहता है, क्योंकि तुझे सीखना है। यह भावना तुझे साधक से सिद्ध बना सकती है।"

सच्चा मार्गदर्शन

गुरु ने फिर से चित्र देखा, इस बार बहुत ही आलोचनात्मक दृष्टिकोण से। उन्होंने कहा, "अब जब तू स्वयं सीखना चाहता है, तो सुन। इस चित्र में तुझे जो भाव दिखता है, वह स्पष्ट है, लेकिन कुछ स्थानों पर छायांकन थोड़ा असंतुलित है। यदि तू इस रेखा को थोड़ा और महीन करता, तो गहराई और बढ़ती। यह रंग यहाँ थोड़ा चटक है, जो भाव को भंग कर रहा है। और इस पक्ष की रचना थोड़ी और संतुलित होती, तो दृष्टि केंद्रित रहती।"

शिष्य ने गौर से सुना, कुछ लिखा और कुछ अपने हृदय में उतार लिया। अब उसे मार्ग मिल गया था। प्रशंसा से नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और सुधार से ही आत्म-विकास होता है—यह बात उसके अंतर में उतर चुकी थी।

कथा का सार

यह कथा केवल एक चित्रकार की नहीं, हर उस साधक की है जो अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। चाहे वह कलाकार हो, लेखक हो, विद्यार्थी हो या आध्यात्मिक जिज्ञासु—जो व्यक्ति केवल प्रशंसा चाहता है, वह वहीं रुक जाता है जहाँ उसे "वाह!" मिल जाती है। लेकिन जो व्यक्ति अपने कार्य में सुधार के लिए सजग रहता है, आलोचना को सच्चे मन से स्वीकारता है, वही आगे बढ़ता है।

गुरु का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता, बल्कि शिष्य को उसकी अगली सीढ़ी तक पहुँचाना होता है। लेकिन यदि शिष्य ही केवल प्रशंसा चाहता है, तो गुरु भी मौन रह जाता है। जब शिष्य स्वयं कहता है—"मुझे कमी बताओ," तभी सच्चा ज्ञान और मार्गदर्शन संभव होता है।

अंत में

जीवन में आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम परिपूर्ण बन जाएँ। बल्कि यह आवश्यक है कि हम अपनी अपूर्णताओं को जानें और उन्हें स्वीकार करें। क्योंकि जहाँ स्वीकार है, वहीं सुधार का द्वार खुलता है।

इसलिए यदि कभी कोई आपके कार्य में कमी निकाले, तो उसे अपमान मत समझिए। बल्कि उस व्यक्ति का धन्यवाद कीजिए, जिसने आपको बेहतर बनने का अवसर दिया। यही भाव एक साधक को साधारण से असाधारण बना देता है।

"कमी पर दुखी मत हो,
कमी तो आगे बढ़ने का पहला संकेत है।
जो कमी देख पाए,
समझो उसने तुम्हें ऊँचाई का रास्ता दिखा दिया।"

Saturday, 1 March 2025

रजा देव बघेला की गुरु निष्ठा

 

 







    संत कबीर जी का जीवन लीला का समय पूरा होने वाला था। संसार से विदा लेने वाले थे, सभी भक्त दौड़-दौड़ कर आ रहे थे। वीर देव बघेला काशी के राजा थे, वह पहले कबीर जी का विरोध करते थे, लेकिन बाद में बहुत बड़े भक्त बन गए। विरोध इसलिए करते थे कि कबीर जी उनका महल देखें और उनकी सराहना करें, ऐसा उनका विचार था। पर कबीर दास जी ने कहा कि महल में दो अवगुण हैं। एक तो यह सदा नहीं रहेगा और दूसरा साथ नहीं चलेगा। राजा बघेल के अहंकार को चोट लगी, पर बाद में उन्होंने बहुत सोचा और सोचते-सोचते कहा कि बात तो सही है। ना तो यह महल हमेशा रहेगा और न ही मेरे साथ चलेगा।


    जब राजा को पता चला कि कबीर दास जी संसार से विदा लेने वाले हैं, तब वह दौड़ते-दौड़ते आए और उनके चरणों में गिरे और प्रणाम किया। वह कभी कबीर दास जी को देखते और कभी उनके चरणों में प्रणाम करते। राजा ने कहा, "महाराज, आप जा रहे हैं, मैं प्रण किया था कि गुरुदेव को अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाऊंगा, उनकी सेवा करूंगा और आप चोला छोड़ रहे हैं। तो मैं भी आपके साथ चलूंगा।" तभी कबीर जी ने देखा कि हृदय में सच्चाई है। कबीर जी तनिक मौन हुए और ईश्वर की मौज में डूबे, फिर सभी पर कृपापूर्ण दृष्टि डाली और वीर सिंह बघेल जी से कहा कि तुमने सच्चाई से प्रण किया है, ठीक है, 5 साल रुक जाते हैं। वीर सिंह बघेल राज भार, जिसको देना था, दे कर एक साधारण रसोईया और साधारण सफाई करने वाला बन गए और गुरु के द्वार पर आकर सेवा करने लग गए।


“गुरु की सेवा साधु जाने, गुरु सेवा क्या मूढ़ पिछाने”


    कबीर दास जी के 5 साल पूरे हो गए। बघेल की सेवा से संतुष्ट हुए कबीर दास जी ने जाते-जाते कहा कि बाघेला कि नाई अहंकार छोड़कर सच्चाई से सेवा करना। 


“क्योंकि देखने वाला तुम्हारी सच्चाई को भी देखता है और तुम्हारे दिखावेपन को भी देखता है।” 


    धन्य हैं भारत के ऐसे संत जो हँसते-खेलते मृत्यु को भी टाल  देते हैं। शिष्य के प्रेम और संकल्प के खातिर अपना संकल्प बदल देते हैं। बघेल जैसे शिष्य भी धन्य हैं जो अपना राजपाट छोड़, अहंकार छोड़ गुरु के द्वार में झाड़ू-बुहारी करते, बर्तन मांजते हैं। धन्य है भारत की गुरु-शिष्य परंपरा। धन्य है यहाँ की संस्कृति जहाँ स्वयं भगवान भी जन्म लेने को लालायित होते हैं।


* * * * *






Saturday, 11 May 2024

सूरदास


सूरदास



        सूरदासजी जन्मांध थे उनके कोई गुरु भी नहीं थे, फिर भी कृष्ण भक्ति रस की ऐसी वर्षा, जो 'मैं' को भिगो दे.. उन्हें कैसे मिली, जब भी कभी वो किसी गड्ढे में गिरते या नदी खाई में या झरने में गिराने वाले रहते तो, उन्हें भगवन स्वयं आके बचाते थे..!!


सूरदास जी के जीवन परिचय

            सूरदास, भारतीय साहित्य के प्रमुख संत-कवि थे जिनकी रचनाएं भक्ति, प्रेम, और आध्यात्मिकता के माध्यम से जनता के बीच लोकप्रिय थीं। सूरदास का जन्म 1478 ईसा पूर्व में वाराणसी के पास सिथली नामक गाँव में हुआ था। उनका असली नाम सुदास था, लेकिन उन्हें 'सूरदास' के नाम से अधिक पहचाना जाता है। सूरदास की रचनाओं में गोपीयों के प्रेम, राधा-कृष्ण का लीलाचरित्र, और भक्ति की उच्चता का वर्णन है।

सूरदास के दोहे उनकी आध्यात्मिक भावना और भक्ति का प्रतिक हैं। उनके दोहे भक्ति-मार्ग के आधारशिला माने जाते हैं और उनमें दिव्यता की अनुभूति का संवेदनशीलता से विवरण है।

सूरदास के दोहे में एक सामाजिक संदेश भी छिपा होता है। उन्होंने भ्रष्टाचार, अंधविश्वास, और सामाजिक असमानता के खिलाफ विचार किए। उनके दोहे सामान्य जीवन के मूल्यों की बड़ी मात्रा में समर्थन करते हैं और जीवन को सरल, साफ, और निष्कपट बनाने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

सूरदास के दोहे अपने अन्य ग्रंथों के साथ भारतीय साहित्य का अमूल्य अंग हैं। उनकी कविताएं और दोहे आज भी हमें आध्यात्मिक उद्धारण और जीवन में सही मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनकी भावनाओं की गहराई, उनके भक्तिभाव, और उनकी कल्पनाशीलता का विस्तार हमें एक अद्वितीय साहित्यिक अनुभव प्रदान करता है।


उद्धव बने सूरदास

सूरदास जी के ज्ञान और भक्ति से पूरी दुनिया चकित थी की सूरदासजी कृष्ण की ऐसी छवि कैसे देख पाते और उन्हें ऐसा ज्ञान कैसे मिल गया..!!

इसका जवाब भी भागवत में है, द्वापर युग में जब कृष्ण वृन्दावन छोड़ मथुरा चले गए थे, तब उन के विरह में गोपिया बेसुध रहती और सब कुछ भूल कर विलाप करती थी.. जब कृष्ण मथुरा के राजा बने तो कर्मयोग के कारण वापस वृन्दावन कभी नहीं लौट पाये.. जब उन्हें ये समाचार मिला तो उन्होंने अपने परम ज्ञानी दोस्त उद्धव को गोपियों को समझने भेजा की वो विलाप छोड़ दे और दुखी न हो मूर्त रूप को छोड़ कर परम स्वरुप में ध्यान लगाये.. उद्धव को भी घमंड था, अपने ज्ञान का और वो वृन्दावन पहुँच गए और गोपियों को उपदेश देने लगे और उन्हें कृष्ण के शरीर रूपी स्वरुप से मोह का त्याग करने कहने लगे. उद्धव ने गोपियों का उपहास भी उड़ाया.. तब गोपियों ने भी उद्धव को ऐसे ऐसे तर्क दिए, जिन्हे सुन कर उसका भी माथा ठमका और उसे अपना ज्ञान भी कम लगने लगा.. ये तो प्रेम की बात है उद्धव आशिकी इतनी सस्ती नहीं है..!!

उसके उद्धव के उपहास से क्रोधित हो, राधा की सखी ललिता ने श्राप दिया की उद्धवजी आप कृष्ण के शरीर रूप से मोह भंग करने को कह रहे हो पर ये संभव नहीं है, अत्यंत दुष्कर है आप को इस का ज्ञान नहीं है.. ललिता ने श्राप दिया कि जिस तरह हम कृष्ण के दर्शन को तरस रहे है, उसी तरह तुम भी तरसोगे, पर तुम्हे आँखों से दर्शन नहीं होंगे.. तब तुम्हे मन की आँखों से ही देखना होगा, जैसा तुम हमें करने को कह रहे हो.. तब तुम्हे हमारी पीड़ा का एहसास होगा.. उद्धव पर गोपियों का ऐसा रंग चढ़ा कि वो खुद बावले प्रतीत हो रहे थे और उन्होंने कृष्ण के पास जा कर गोपियों का दर्द कहा और खुद भी विलाप करने लगे..!!

तब कृष्ण ने उद्दव को श्राप में सहायता का आश्वासन दिया.. सूरदास के रूप में उसी उद्धव ने जन्म लिया और ललिता का श्राप भोगा.. मन में तो कृष्ण थे, पर अपनी आँखों से वो देख नहीं पाये और तब उन्हें गोपियों के दर्द का एहसास हुआ.. जिसका उन्होंने उद्धव रूप में उपहास उड़ाया था..!!





सबसे ज्यादा प्रचलित सूरदास जी के दोहे -



1. बिन सतसंगते मिलै नहीं मोहि, रति कृष्ण भजन में।

गोरी किरीती कम्पै करि बूझै, तात गुरु बिनु बैकुंठ में॥



2. मानस के हृदय बसहु स्यामा संग, जोय कछु सोवत नहिं अंग।

संगी संग संगी नर, फिरे ताहि पथ देसु, कहि सूरदास भजहुरी मन भावन रंग॥



3. अपने मन को जीतना है, विश्वास रखो राम में।

कर्म करो फल की इच्छा मत करो, इश्वर को समर्पित करो धरती पर॥



4. जाहिं गोराख नाथ नरद, धरतें ध्यान बड़ाई।

सूरदास ने कही आप, तब समुझौं मुख समुझ माई॥



5. चितवत बिरहिनी कृष्ण को, तब मूढ़ जीव भए।

कहते सूरदास, इतना ध्यान, साधो बिरहिनी न सुन जाए॥



6. सूरदास प्रभु साचे, मिलि है निरंजन भाव।

जन सुन सुन बहुत लोभी, ध्यान धरे चार नाव॥



7. दुर्बुद्धि जन जोषी लोभ में, अज्ञान धरै को दार।

सूरदास कहते, ऐसे मन नहीं बिसार॥



8. गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपकी, जिन गोविन्द दियो बताय॥



9. देखा जब तब सभी कोई, लगता दुख का मोह।

सूरदास कहते भजो भगवान, जो तुम्हे मिलें दोनों॥



10. साधु संग लागे आधार, राम भजन रसिक प्यार।

कहते सूरदास, बिन संतोष कोई, किन्ह का मन ध्यार॥



ये दोहे सूरदास जी के काव्यसंग्रह में सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं और सामाजिक, आध्यात्मिक, और नैतिक मुद्दों पर गहरा प्रभाव डालते हैं।





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Tuesday, 7 May 2024

रवींद्रनाथ टैगोर

      

रवींद्रनाथ टैगोर


          रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के महान और अग्रणी व्यक्तित्वों में से एक हैं। उन्हें भारतीय और विश्व साहित्य के महान कवि, लेखक, और धर्मगुरु के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था और उनकी मृत्यु 7 अगस्त 1941 को हुई थी।

        रवींद्रनाथ टैगोर ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपन्यास, कविता, नाटक, गीत, और अन्य विधाओं में अपनी रचनाएँ लिखीं। उनके लेखन में धर्म, प्रेम, और मानवता के महत्वपूर्ण विषयों पर बल दिया गया।

        रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं को एक विश्व कवि माना, जिनका काव्य और विचार सर्वदेशीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डाला। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से मानवता के साथ जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार किए और सामाजिक परिवर्तन के लिए आवाज उठाई।

        रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं में भावनात्मकता और सुन्दरता का अद्वितीय संगम होता है। उनकी कविताओं में प्रकृति, प्रेम, आत्मविश्वास, और भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम का उदाहरण होता है।

        टैगोर की नाटक रचनाओं में उन्होंने समाज, धर्म, और मानवता के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। उनका प्रसिद्ध नाटक "चित्रा" और "रक्तकरवी" इसका अद्वितीय उदाहरण हैं।

        रवींद्रनाथ टैगोर के विचार और उनकी रचनाएँ अभिजात मानवता की अहम पहचान बनीं। उनके विचारों में स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, और मानवता के मूल्यों का प्रमोद था।

        रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने विचारों को स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय एकता, और सामाजिक सुधार के लिए भी उत्तेजित किया। उन्होंने अपनी साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्षमता के माध्यम से लोगों को जोड़ा और प्रेरित किया।

        रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव भारतीय समाज में अद्वितीय है। उनके विचारों और रचनाओं का प्रभाव आज भी भारतीय साहित्य, संस्कृति, और समाज पर महसूस किया जा सकता है।

        अंत में, रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के एक अमूल्य रत्न हैं, जिनकी रचनाएँ हमें धर्म, प्रेम, और मानवता के महत्व को समझने और महसूस करने का मार्ग दिखाती हैं। उनके विचारों और उनकी कला का महत्व आज भी हमारे जीवन में अटल है। उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।

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वीर सावरकर: स्वतंत्रता सेनानी

 



वीर सावरकर


स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भारतीय राष्ट्र की गर्वशाली धारा है। इस संग्राम में निरंतर प्रेरणा और समर्पण के प्रतीक के रूप में अनेक वीर सेनानी ने अपने बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनमें से एक नाम है, वीर सावरकर। वे न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण योद्धा थे, बल्कि उनकी विचारधारा और साहस ने देशवासियों को एक समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर किया।



वीर सावरकर का जन्म २८ मई, १८८३ को महाराष्ट्र के भगुर में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर था और माता का नाम राधाबाई था। बचपन से ही सावरकर ने देश के प्रति अपनी समर्पण भावना का प्रदर्शन किया था। उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होकर राष्ट्र सेवा का मार्ग चुना।


सावरकर का योगदान स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाई में अपनी जान को खतरे में डाला। उन्होंने विभाजन के खिलाफ एकता की अपील की और अपने विचारों को लोगों के बीच फैलाने के लिए विभिन्न धार्मिक और सामाजिक सभाओं का संचालन किया।


सावरकर को स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्भुत योगदान के लिए उन्हें १९२४ में ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस प्रशासन के विरुद्ध अपराधिक रूप से गिरफ्तार किया था। उन्हें काला पानी, ताजा वायरस जैसी कठिन शारीरिक और मानसिक प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ा। हालांकि, इन सभी कठिनाइयों के बावजूद, उनकी अद्भुत आत्मगाथा और निष्ठा ने उन्हें अद्वितीय बना दिया।


सावरकर की विचारधारा में राष्ट्रवाद, स्वाधीनता और समाज की समृद्धि के लिए समर्पण शामिल था। उनकी प्रेरणा और आदर्शों ने लाखों लोगों को राष्ट्रीय उत्थान की दिशा में प्रेरित किया।


उनका जीवन एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि एक व्यक्ति अपने संघर्षों और विपदाओं के बावजूद भी अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है। सावरकर के विचार और योगदान को समझने के लिए हमें उनकी जीवनी और कार्य का अध्ययन करना चाहिए।


उनकी विचारधारा में राष्ट्रप्रेम, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय को बल देने के लिए उन्होंने कई पुस्तकें और लेख लिखे। उनकी किताब "हिंदू राष्ट्र की स्थापना" और "कितना पहचान जारी है" भारतीय समाज को जागरूक करने वाली किताबें हैं।


सावरकर को एक समर्थक और एक कट्टरपंथी राष्ट्रवादी के रूप में देखा जाता है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा थे, जिनका योगदान देश के इतिहास में अविस्मरणीय है। उनका संघर्ष और समर्पण हमें आज भी प्रेरित करता है और हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की राह पर हमें समर्पित और संघर्षशील रहना होगा।


वीर सावरकर की प्रेरणा का उपयोग करते हुए हमें समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर होने की दिशा में कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उनके योगदान को याद करते हुए हमें समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर होने की दिशा में कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उनके योगदान को याद करते हुए हमें समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर होने की दिशा में कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

वीर सावरकर ने अपने जीवन में राष्ट्रप्रेम, समर्पण और साहस के उदाहरण से हमें स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर करने का संदेश दिया। उनके योगदान को याद करते हुए हमें आज भी उनके आदर्शों का पालन करना चाहिए और देश के विकास में अपना योगदान देना चाहिए।


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Thursday, 24 August 2023

दुआ और बद्दुआ

  


    एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भिख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदी_गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, कभी_कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें|


         एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आओ देखा ना ताओ, सीधा उसे पत्थर से दे मारा, भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वहां भिखारी के पीछे चलने लगा|


       भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जालिल करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, अब अंधेरा हो चला था, भिखारी अपने घर लौट रहा था, सेठ भी उसके पीछे था, भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी, जो भिखारी की पत्नी थी, जैसे ही उसने अपने पति को देखा उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी, उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी, उसे देखते ही बुढिया बोली बस इतना ही और कुछ नही, और ये आपका सर कहा फूट गया?


       भिखारी बोला, हाँ बस इतना ही किसी ने कुछ नही दिया सबने गालिया दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सर फूट गया, भिखारी ने फिर कहा सब अपने ही पापों का परिणाम हैं, याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे, क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया, याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी,.......

( बुढिया की ऑखों में ऑसू आ गये और उसने कहा हाँ,)

    कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे, कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जालिल करते थे, कैसे हम उसे कभी_कभी मार वा धकेल देते थे, अब बुढिया ने कहा हाँ सब याद है मुजे, कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था, जब भी वहाँ रोटिया मांगता मैंने बस उसे गालियाँ दी, एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया|


      और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे, मैं नही, आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी

      फिर भिखारी ने कहा, पर मैं किसी को बद्दुआ नही देता, चाहे मेरे साथ कितनी भी जात्ती क्यू ना हो जाए, मेरे लब पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता, की कोई और इतने बुरे दिन देखे, मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूं, क्यूकि उनको मालूम ही नही, वो क्या पाप कर रहें है, जो सीधा ईश्वर देख रहा हैं, जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते, इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती हैं,|

      

        सेठ चुपके_चुपके सब सुन रहा था, उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी, बुढे_बुढिया ने आधी रोटी को दोनो मिलकर खाया, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गयें|


     अगले दिन, वहाँ भिखारी भिख मांगने सेठ कर यहाँ गया, सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी, उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, माफ करना बाबा, गलती हो गयी, भिखारी ने कहा, ईश्वर तुम्हारा भला करे, और वो वहाँ से चला गया|

       सेठ को एक बात समझ आ गयी थी, इंसान तो बस दुआ_बद्दुआ देते है पर पूरी वो ईश्वर वो जादूगर कर्मो के हिसाब से करता हैं,,,,,,,,|


     हो सके तो बस अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास |


 


 

सत्संग का असर




एक संत रोज अपने शिष्यों को गीता पढ़ाते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे। लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ पढ़ाते हैं, वह समझ में नहीं आता। जबकि बाकी सारे लोग समझ लेते हैं। मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। आखिर मुझे गीता का भाष्य क्यों समझ में नहीं आता? गुरु ने कहा- तुम कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ। शिष्य चकित हुआ। आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए वह टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर पड़ा। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई। लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं। कोई फायदा नहीं। गुरु बोले- फायदा है। तुम जरा टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार- बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह सत्संग  बार- बार सुनने से खूब फायदा होता है। भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन तुम इसका फायदा बाद में महसूस करोगे।

लालच (Greed)





एक सच्ची प्रेरक कहानी


रमेश चंद्र शर्मा का मेडिकल स्टोर अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।

रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।

वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। लेकिन बूढ़ा सोच रहा था। उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, "मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।"

लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।

फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।

समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमतों को जानता हूं।

एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।

मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं। गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं, कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।
        *।। जय सियाराम जी।।*
         *।। ॐ नमह शिवाय।।*

*    *    *    *    *    *    *







Tuesday, 22 August 2023

दुःख का कितना बड़ा उपकार

 



एक बड़ा प्रसिध्द राज नेता था बंगाल में ….बड़ा जाना-माना था..धर्म परायण व्यक्ति था..अश्विनी दत्त बंगाल के प्रसिध्द राज नेता थे..उन के गुरु राज नारायण थे.

उस के गुरु को लकवा मार गया..3 महीने के बाद अश्विनी को पता चला…3 महीने से गुरु को लकवा मार गया, मुझे पता नही चला सोच कर विव्हल हो कर भागता भागता आया गुरु के पास…ज्यो ही गुरु के पास पहुँचा..प्रणाम करने जाता है तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा  हो चुका था..गुरु ने दूसरे हाथ से पकड़ के उठाया..
बोले, ‘बेटा, कैसे भागे भागे आए हो…देखो भागा तो शरीर..और दुख हुआ मन में..लेकिन इन दोनो को तुम जानने वाले हो..ऐसा कर के गुरु ने सत्य स्वरूप ईश्वर आत्मा की सार बातें बताई..सुनते सुनते वो तो दुखी आया था, चिंतित हो के आया था…लेकिन गुरु की वाणी सुनते सुनते उस का दुख चिंता गायब हो गया..3 घंटे कैसे बीत  गये पता ही नही चला…
हसने लगा,”गुरु जी 3 घंटे बीत  गये!मुझे तो पता ही नही चला..मैं तो बहोत विव्हल  हो के आया था आप का स्वास्थ्य पुछने के लिए..लेकिन आप को ये लकवा मार गया इस की पीड़ा नही?..दुख नही? हम तो बहोत  दुखी थे और आप ने तो मेरे को 3 घंटे तक सत्संग का अमृतपान  कराया…”
गुरु ने अश्विनी दत्त(बंगाल के प्रसिध्द नेता) के पीठ पे थपथपाया..बोले, “पगले पीड़ा हुई है तो शरीर को..लकवा मारा है तो शरीर को..इस हाथ को..लेकिन दूसरा हाथ मौजूद है, पैर भी मौजूद है, जिव्हा भी मौजूद है..ये उस प्रभु की कितनी कृपा है!..पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था..हार्ट एटैक हो सकता था.और 60 साल तक शरीर स्वस्थ रहा..अभी थोड़े दिन..3 महीने से ही तो लकवा है …ये उस की कितनी कृपा है की दुख भेज कर वो हम को शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है..सुख भेज कर हमें उदार बनाने का और परोपकार करने का संदेश देता है..हम को तो दुख का आदर करना चाहिए..दुख का उपकार मानना चाहिए..बचपन में हम दुखी होते थे जब माँ-बाप ज़बरदस्ती स्कूल ले जाते थे..लेकिन वो दुख नही होता तो आज हम विद्वान भी नही हो सकते थे..ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नही है जिस का दुख के बिना विकास हुआ हो…दुख का तो खूब खूब धन्यवाद करना चाहिए…और दिखता दुख है, लेकिन अंदर से सुख, सावधानी और विवेक से भरा है.. और मुझे हरिचर्चा में विश्रान्ति दिलाया.. सत्संग करने के भागा दौड़ी से आराम करना चाहिए था, लेकिन मैं नही कर पा रहा था…तुम लोग नही करने देते थे..तो भगवान ने लकवा कर के आराम दिया..देखो ये उस की कितनी कृपा है..भगवान की और दुख की बड़ी कृपा है..माँ-बाप की कृपा है तो माँ बाप का हम श्राध्द  करते, तर्पण करते..लेकिन इस दुख देवता का तो हम श्राध्द तर्पण भी नही करते..क्यूँ की वो बेचारा आता है, मर जाता है..रहेता नही है…अभी ठीक भी हो जाएगा, अथवा शरीर के साथ चला जाएगा..माँ बाप तो मरने के बाद भी रहेते है..ये बेचारा तो एक बार मर जाता है तो फिर रहेता ही नही..तो इस का तो श्राद्ध  भी नही करते, तो इस का तो उपकार माने बेटे अश्विनी…”
अश्विनी देखता रहे गया !
गुरु ने कहा, “बेटा ये तेरी मेरी वार्ता जो सुनेगा वो भी स्वस्थ हो जाएगा.. बीमारी शरीर में आती है लाला!..दुख  तो मान में आता है …चिंता चित्त में आती है..तुम तो निर्लेप  नारायण के अमर आत्मा हो!”
हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम.. माधुर्य ओम..मेरे जी ओम ओम..प्यारे जी ओम…हा हा हा हा

मनुष्य को भगवान ने कितने कितने  अनुदान दिए है..ज़रा सोचते है तो मौन हो जाता है! मन विश्रान्ति में चला जाता है…जब तेरा गुरु है, और तू बोले की मैं परेशान हूँ, मैं दुखी हूँ तो तू गुरु का अपमान करता है..मानवता का अपमान करता है..जो बोलते है ना मैं दुखी हूँ, परेशान हूँ  तो समझ लेना की उन के भाग्य के वे शत्रु है…अभागे लोग सोचते है मैं दुखी, परेशान हूँ..समझदार लोग ऐसा कभी नही सोचते है…जो बोलते मैं दुखी परेशान हूँ उस के मान में  दुख परेशानी  ऐसा गहेरा उतरता जाएगा की जैसे हाथी दलदल में फँसे और ज्यों निकलना चाहे तो और गहेरा उतरे ..ऐसे ही दुखी और परेशान हूँ बोलते तो समझो वो दुख और परेशानी में हाथी के नाई  गहेरा जा रहा है..अभागा है..अपने भाग्य को कोस रहा है..
‘मैं दुखी नही हूँ, मैं परेशान नही हूँ..दुख है तो मन को है, परेशानी है तो मन को है..’ ये पक्का करे..वास्तव में मन की कल्पना है परेशानी..दुख परेशानी  तो मेरे विकास करने के लिए है  ..वाह मेरे प्रभु !
सुखम वा यदि वा दुखम स योगी परमो मतः ll

जिस वस्तु को हम प्यार करते वो प्यारी हो जाती है, जिस वस्तु को हम महत्व देते वो महत्व पूर्ण हो जाती है..जिस वस्तु को मानव ठुकरा दे वो वस्तु बेकार हो जाती है..नोइडा में जहा सत्संग हुआ था तो वहाँ खेत थे..और वहाँ अब पौने चार लाख रुपये में 1 मीटर जगह मिलती है..हे मानव तू जिस जगह को महत्व देता वो जगह कीमती हो जाती..तू जिस फॅशन को महत्व देता वो कीमती हो जाती..तू इतना सब को महत्व देनेवाला अपने आप को कोस कर अपना सत्यानाश क्यूँ करता है?

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Saturday, 26 November 2022

माता शबरी की कहानी


बात भगवान राम के जन्म से पहले की है, जब भील आदिवासी कबीले के मुखिया अज के घर बेटी पैदा हुई थी। उसका एक नाम श्रमणा और दूसरा नाम शबरी रखा गया। शबरी की मां इन्दुमति उसे खूब प्यार करती थी। बचपन से ही शबरी पशु-पक्षियों की भाषा समझकर उनसे बातें करती और जब सबरी की मां उसे देखती, तो कुछ समझ नहीं पाती थी।

कुछ समय बाद एक पंडित ने शबरी के परिवार को बताया कि वो आगे चलकर संन्यासी बन सकती है। इस बात का पता चलते ही शबरी के पिता ने उसका रिश्ता तय कर दिया। जैसे ही शादी का दिन नजदीक आया, शबरी के घर वालों ने खूब सारी बकरियां और अन्य जानवर घर के पास लाकर बांध दिए।

एक दिन शबरी का मां जब उसके बाल बना रही थी, तो उसने मां से पूछा, “इतने सारे जानवर हमारे घर क्यों लाए गए हैं।”

मां ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हारा विवाह होने वाला है, इसलिए हम लोगों ने इनका इंतजाम बलि के लिए किया है। तुम्हारी शादी के दिन ही बलि प्रथा होगी और फिर इनसे स्वादिष्ट भोजन बनाकर सबको परोसा जाएगा।’ यह सब सुनकर शबरी दुखी हो गई। काफी देर तक शबरी ने उन जानवरों को आजाद करने के बारे में सोचा।

सोचते-सोचते शबरी के मन में हुआ कि अगर ये जानवर यहां नहीं होंगे, तो इनकी बलि रूक सकती है। ऐसा नहीं हुआ, तो मेरे घर से कहीं चले जाने पर ही यह बलि रुकेगी। जब मैं ही नहीं रहूंगी, तब न विवाह होगा और न ही बलि प्रथा। इससे मासूम जानवर बच जाएंगे।

इसी सोच के साथ जानवरों को रखी गई जगह पर सबरी पहुंची। उसने सोचा कि उन्हें खोल देती हूं, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई। उसके बाद शबरी जंगल की तरफ भागने लगी। भागते-भागते शबरी ऋषिमुख पर्वत पहुंच गई। वहां करीब दस हजार ऋषि रहा करते थे। शबरी को लगा कि वो भी इसी जंगल में किसी तरह ऋषि-मुनियों की सेवा करके अपना जीवन जी लेगी।

वो चुपचाप उसी जंगल में एक हिस्से में किसी तरह से रहने लगी। शबरी रोजाना ऋषि-मुनियों की झोपड़ी के आगे झाड़ु लगाती और हवन के लिए लकड़ियां भी लाकर रख देती। ऋषि-मुनियों को समझ नहीं आ रहा था कि जंगल में उनके काम अपने आप कैसे हो रहे हैं।

एक दिन शबरी को किसी ऋषि ने देख लिया। उसे देखते ही उसका परिचय पूछा। जैसे ही शबरी ने बताया कि वो भील आदिवासी परिवार से संबंध रखती है, तो उसे ऋषियों ने खूब डांट लगाई। शबरी को इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि उसकी जाति छोटी है और उसे ऋषियों द्वारा जाति की वजह अपमान सहन करना पड़ेगा।

इतना सब होने के बाद भी शबरी हर ऋषि-मुनि के दरवाजे पहुंचती और उनके आंगन में झाड़ू लगाकर उनसे गुरु दीक्षा देने के लिए कहती। हर कोई शबरी को उसकी जाति की वजह से अपने आश्रम से भगा देता था। ऐसा होते-होते काफी समय बीत गया। उसके बाद शबरी मतंग ऋषि की कुटिया में पहुंची।

वहां पहुंचकर मतंग ऋषि को सबरी ने बताया कि वो उनसे गुरु दीक्षा लेना चाहती है। उन्होंने खुशी-खुशी उसे अपने गुरुकुल में रहने दिया और भगवान से जुड़ा ज्ञान देते रहे। शबरी ने भी अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो गुरुकुल के भी सारे काम करती थी। शबरी से खुश होकर मतंग ऋषि ने उसे बेटी मान लिया था।

समय के साथ मतंग ऋषि का शरीर बूढ़ा हो गया। उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, ‘बेटी मैं अपना देह त्यागना चाह रहा हूं। बहुत साल हो गए इस शरीर में रहते-रहते।’

शबरी ने दुखी मन से कहा, ‘आपके ही सहारे मैं इस जंगल में रह पाई हूं। आप ही चले जाएंगे, तो मैं जीकर क्या करुंगी। आप अपने संग मुझे भी ले जाइए। मैं भी देह त्याग दूंगी।’

मतंग ऋषि ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। राम तुम्हारी चिंता करेंगे और ध्यान भी रखेंगे।’

शबरी ने ‘राम’ का नाम सुनने के बाद पूछा, ‘वो कौन हैं और उन्हें मैं किस तरह से ढूढूंगी।’

मंतग ऋषि ने बताया, ‘राम कोई और नहीं भगवान हैं। वो तुम्हें सारे अच्छे कर्मों का फल देंगे। तुम्हें उन्हें ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। वो एक दिन खुद तुम्हें खोजते हुए इस कुटिया में आएंगे और तु्म्हें उनके हाथों ही मोक्ष मिलेगा। तब तक तुम इसी आश्रम में रहो।’ इतना कहते ही मंतग ऋषि ने अपना शरीर त्याग दिया।

शबरी के मन में मंतग ऋषि के जाने के बाद से एक ही बात थी कि भगवान राम स्वयं उससे मिलने आएंगे। वो रोज भगवान राम से मिलने के लिए बाग से अच्छे-अच्छे फूल लाकर पूरा आश्रम सजाती और भगवान के लिए बेर तोड़कर लाती। भगवान के लिए बेर चुनते हुए शबरी उन्हें चख लेती थी, ताकि भगवान वो सिर्फ मीठे बेर ही दे।

रोजाना शबरी इसी तरह भगवान के दर्शन की आस में फूल और बेर इकट्ठा करती रहती थी। इसी तरह इंतजार में कई साल बीत गए। शबरी का शरीर एकदम वृद्ध हो गया।

एक दिन आश्रम के पास के ही तलाब में शबरी पानी लेने के लिए गई। तभी पास के ही एक ऋषि ने उसे अछूत कहते हुए वहां से भागने के लिए कहा और एक पत्थर मार दिया। वो पत्थर जब शबरी को लगा, तो उसे चोट लगी और खून बहने लगा।

बहते हुए खून की एक बूंद उसी तलाब के पानी में गिर गई। तभी पूरा तालाब का पानी खून में बदल गया।

ये सब होता देखकर ऋषि ने शबरी को ही डांटा और कहा कि पापीन तुम्हारी वजह से पूरा पानी खराब हो गया। रोज ऋषि उस पानी को साफ करने के लिए अपनी कई तरह की विद्याओं का इस्तेमाल करते। कई सारे जतन करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने गंगा जैसी कई पवित्र नदियों का जल भी उस तालाब में डाला। फिर भी तालाब का पानी साफ नहीं हो पाया और वो खून जैसा ही रहा।

कई सालों तक तालाब के पानी को साफ करने की कोशिश के बाद भी कुछ काम नहीं आया, तो ऋषि ने थककर सबकुछ छोड़ दिया। इस घटना के कई सालों के बाद भगवान राम अपनी पत्नी सीता के हरण के बाद उन्हें ढूंढते हुए उसी तालाब के पास पहुंचे। ऋषि-मुनियों ने उन्हें पहचान लिया। भगवान को वहां देखकर ऋषियों ने तालाब का पानी साफ करने के लिए भगवान को अपने पैर उसमें डालने के लिए कहा, लेकिन पानी जैसे का तैसा ही था।

ऋषि-मुनियों ने भगवान से भी कई अन्य जतन करवाए, लेकिन वो पानी जस का तस खून जैसा ही रहा। तब भगवान ने ऋषियों से पानी के रक्त में बदलने की कहानी पूछी। तब ऋषि ने शबरी को पत्थर मारने वाली सारी बात बता दी। उसके बाद कहा कि वो महिला ही अपवित्र है, छोटी जात की है, इसलिए ये सब हुआ है।

उसी वक्त भगवान राम ने कहा, ‘ये सब आप लोगों के खराब वचनों से हुआ है। शबरी को इस तरह के शब्द बोलकर आप लोगों ने उसे नहीं, बल्कि मेरे दिल को घायल किया है। इसी घायल दिल के रक्त का प्रतीक यह तालाब का लाल पानी है।’ आगे भगवान राम बोले, ‘कहा हैं वो माईं मैं उनसे मिलना चाहता हूं।’ तबतक शबरी उसी तलाब के पास पहुंच जाती हैं। इस दौरान शबरी के पैर को ठोकर लगती है और कुछ घूल उस तालाब में गिर जाती है। तभी सारा पानी साफ हो जाता है।

भगवान सबसे कहते हैं कि देखिए, आप लोगों ने क्या कुछ नहीं किया, लेकिन पानी साफ नहीं हो पाया। अभी सिर्फ इनके पैर की थोड़ी-सी धूल ने ही तलाब का पानी साफ कर दिया। भगवान राम को शबरी पहचान चुकी थीं। उन्हें प्रणाम करके शबरी ने कहा, ‘भगवान! आप मेरे साथ कुटिया में चलिए।’ भगवान भी खुशी-खुशी शबरी के साथ चल पड़े।

फूलों से शबरी ने भगवान राम का स्वागत किया। वो सीधे बेर तोड़ने के लिए बाग गईं और चख-चखकर उनके लिए बेर लेकर आई। उन्होंने बड़े ही प्यार से भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण को बेर दिए। भगवान राम ने भी उतने ही प्यार से उन बेर को खाना शुरू किया।

तभी बेर देखकर मुंह बनाते हुए लक्ष्मण ने कहा, ‘भैया ये बेर जूठे हैं, इन्हें आप कैसे खा सकते हैं।’

भगवान ने जवाब दिया. ‘लक्ष्मण! ये जूठे नहीं, बल्कि बहुत मीठे हैं। शबरी माई हम सबके लिए ये बहुत प्यार से तोड़कर लाई हैं।’

इतना कहकर भगवान राम प्यार से उन बेर को खाने लगे। भगवान ने जाते हुए शबरी माई से कहा, ‘आप मुझसे जो चाहे वो मांग सकती हैं।’

शबरी ने उन्हें कहा, ‘मतंग ऋषि के कहने पर मैं आजतक सिर्फ आपके दर्शन करने के लिए जी रही थी। अब आप मुझे मोक्ष प्रदान कीजिए। मैं अपना शरीर आपके सामने ही त्यागूंगी।’

उसी वक्त शबरी ने अपना शरीर त्याग दिया। भगवान राम ने अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया और सीता मां की खोज में आगे बढ़ गए।

Tuesday, 5 May 2020

गुरु भक्त संदीपक





प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म
मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-
शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने
अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने
का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के
प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस
श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-
कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने अपने शिष्यों को एकत्र करके
कहाः " हे शिष्यों ! पूर्वजन्म में मैंने कुछ
पापकर्म किये हैं। उनमें से कुछ तो जप-तप,
अनुष्ठान करके मैंने काट लिये,
अभी थोड़ा प्रारब्ध बाकी है। उसका फल
इसी जन्म में भोग लेना जरूरी है। उस कर्म
का फल भोगने के लिए मुझे भयानक बीमारी आ
घेरेगी, इसलिए मैं काशी जाकर रहूँगा। वहाँ मुझे
कोढ़ निकलेगा, अँधा हो जाऊँगा। उस समय मेरे
साथ काशी आकर मेरी सेवा कौन करेगा ? है कोई
हरि का लाल, जो मेरे साथ रहने के लिए तैयार
हो ?"
वेदधर्म मुनि ने परीक्षा ली। शिष्य पहले
तो कहा करते थेः "गुरुदेव ! आपके चरणों में
हमारा जीवन न्योछावर हो जाये मेरे प्रभु !" अब
सब चुप हो गये। गुरु का जयघोष होता है, माल-
मिठाइयाँ आती हैं, फूल-फल के ढेर लगते हैं तब
बहुत शिष्य होते हैं लेकिन आपत्तिकाल में उनमें
से कितने टिकते हैं !
वेदधर्म मुनि के शिष्यों में संदीपक नाम
का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त एवं
कुशाग्र बुद्धिवाला था।
उसने कहाः "गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में
रहेगा।"
गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए
रहना होगा।"
संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन
ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन
की सार्थकता है।"
वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी नगर में
मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। संदीपक
सेवा में लग गया। प्रातः काल में गुरु
की आवश्यकता के अनुसार दातुन-पानी,
स्नान-पूजन, वस्त्र-परिधान
इत्यादि की तैयारी पहले से ही करके रखता।
समय होते ही भिक्षा माँगकर लाता और गुरुदेव
को भोजन कराता। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर
में कोढ़ निकला और संदीपक
की अग्निपरीक्षा शुरु हो गयी। गुरु कुछ समय
बाद अंधे हो गये। शरीर कुरूप और स्वभाव
चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र
भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन-रात
गुरुजी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के
घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु
को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता,
भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन
कराता।
गुरुजी को मिजाज और भी क्रोधी एवं
चिड़चिड़ा हो गया। वे गाली देते, डाँटते,
तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध
प्रकार से परीक्षा लेते। संदीपक खूब शांति से,
धैर्य से यह सब सहते हुए दिन प्रतिदिन
ज्यादा तत्परता से गुरु की सेवा में मग्न रहने
लगा। धनभागी संदीपक के हृदय में गुरु के
प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़
होता गया।
संदीपक की ऐसी अनन्य गुरुनिष्ठा देखकर
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ
उसके समक्ष प्रकट हो गये और
बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम
प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह
मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट
करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। इसलिए
बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक ने अपने गुरु
की आज्ञा के बिना कुछ भी माँगने से मना कर
दिया। शिवजी ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और
बोलाः "शिवजी वरदान देना चाहते है। आप
आज्ञा दें तो मैं वरदान माँग लूँ कि आपका रोग
एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाये।"
गुरु ने संदीपक को खूब डाँटते हुए
कहाः "सेवा करते-करते थका है इसलिए वरदान
माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से
तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! जरा तो सोच
कि मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे
भोगना ही पड़ेगा।"
इस जगह पर कोई आधुनिक शिष्य होता तो गुरु
को आखिरी नमस्कार करके चल देता। संदीपक
वापस शिवजी के पास गया और वरदान के लिए
मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित
हो कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये
विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से
सारा वृत्तान्त कहा। भगवान विष्णु भी संतुष्ट
हो संदीपक के पास वरदान देने के लिए प्रकटे।
गुरुभक्त संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ
नहीं चाहिए।" भगवान ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक ने कहाः "आप मुझे
यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल
श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर
प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन-प्रतिदिन भक्ति दृढ़
होती रहे। इसके अलावा मुझे और कुछ
नहीं चाहिए।" ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ने
संदीपक को गले लगा लिया।
जब तक गुरू का हृदय शिष्य पर संतुष्ट
नहीं होता, तब तक शिष्य में ज्ञान प्रकट
नहीं होता। उसके हृदय में गुरु का ज्ञानोपदेश
पचता नहीं है। गुरु का संतोष ही शिष्य की परम
उपासना है, परम साधना है। गुरु को जो संतुष्य
करता है, प्रसन्न करता है उस पर सब संतुष्ट
हो जाते हैं। गुरुद्रोही पर विश्वात्मा हरि रूष्ट होते
हैं। आज संदीपक जैसे
सत्शिष्यों की गाथा का वर्णन सत्शास्त्र कर
रहे हैं। धन्य हैं ऐसे सत्शिष्य !
संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ
बैठे थे। न कोढ़, न कोई अंधापन, न अस्वस्थता !
शिवस्वरूप सदगुरु श्री वेदधर्म ने संदीपक
को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से
पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे
बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा !
जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा सुनायेंगे,
वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र
संदीपक ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानन्दस्वरूप
हो।"
गुरु के संतोष से संदीपक गुरुतत्त्व में जग गया,
गुरुस्वरूप हो गया।
अपनी श्रद्धा को कभी भी,
कैसी भी परिस्थिति में गुरु पर से तनिक भी कम
नहीं करना चाहिए। गुरु परीक्षा लेने के लिए
कैसी भी लीला कर सकते हैं। निजामुद्दीन
औलिया ने भी अपने चेलों की परीक्षा ली थी।
खास-खास 24 चेलों में से भी 2-2 करके फिसलते
गये। आखिरी ऊँचाई तक अमीर खुसरो ही डटे रहे।

Wednesday, 17 October 2018

बेटियों की अहमियत



       एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई।
        चेहरे पर झलकता आक्रोश...


        संत ने पूछा - बोलो बेटी क्या बात है?


        बालिका ने कहा- महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है।
        वह कुछ भी करे, कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती।
        इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है।
        यह मत करो, यहाँ मत जाओ, घर जल्दी आ जाओ आदि।


        संत मुस्कुराए और कहा...


         बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं?
        ये गार्डर सर्दी, गर्मी, बरसात, रात दिन इसी प्रकार पड़े रहते हैं।
         इसके बावजूद इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता।
          लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में।


         अब तुम चलो एक ज्वेलरी शॉप में।
         एक बड़ी तिजोरी, उसमें एक छोटी तिजोरी।
         उसमें रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा।
         क्योंकि जौहरी जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी।


         समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है।
         पूरे घर को रोशन करती झिलमिलाते हीरे की तरह।
          जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के पास कुछ नहीं बचता।
          बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में।


         पूरी सभा में चुप्पी छा गई।
          उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।।।




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