Thursday, 31 May 2018

महानता की और


   बंगाल के एक प्रसिद्ध राजनेता थे अश्विनी कुमार दत्त । वे इतने ईमानदार थे कि चहुँओर उनकी ख्याति थी । वे बड़े धर्मपरायण व्यक्ति थे । उनके गुरु थे राजनारायण बसु । एक बार राजनारायण बसु को लकवा मार गया । जब अश्विनी कुमार को इस बात का पता चला तो वे सोचने लगे कि ‘गुरुजी तीन महीने से बिस्तर पर पड़े हैं और मुझे अभी तक पता नहीं चला !’ वे बड़े दुःखी होकर भागते-भागते अपने गुरु का समाचार पूछने गये । गुरु को प्रणाम करने गये तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा हो चुका था, दूसरे हाथ से पकड़कर उठाया और प्रेम से थप्पी लगाते हुए बोले : ‘‘बेटा ! कैसे भागे-भागे आये हो ! देखो, भागा तो शरीर और दुःख हुआ मन में लेकिन उन दोनों को तुम जाननेवाले हो ।’’ ऐसा करके गुरुजी ने सत्यस्वरूप ईश्वर, आत्मा की सार बातें बतायीं ।

वे तो दुःखी, चिंतित होकर आये थे पर सत्संग सुनते-सुनते उनकी दुःख-चिंता गायब हो गयी और बोले : ‘‘गुरुजी ! मैं तो मायूस होकर आपका स्वास्थ्य देखने के लिए आया था लेकिन आपसे मिलने के बाद मेरी मायूसी चली गयी । आपको लकवा मार गया लेकिन आपको उसकी पीड़ा नहीं, दुःख नहीं ! हम तो बहुत दुःखी थे । आपने सत्संग-अमृत का पान कराया, तीन घंटे बीत गये और मुझे पता भी नहीं चला ।’’

गुरुजी ने अश्विनी कुमार को थपथपाया, बोले : ‘‘पगले ! पीड़ा हुई है तो शरीर को हुई है, लकवा मारा है तो एक हाथ को मारा है, दूसरा तो ठीक है, पैर भी ठीक हैं, जिह्वा भी ठीक है... यह उसकी (भगवान की) कितनी कृपा है ! पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था, हृदयाघात हो सकता था । ६० साल तक शरीर स्वस्थ रहा, अभी थोड़े दिन से ही तो लकवा है, यह उसकी कितनी कृपा है ! दुःख भेजकर वह हमें शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है, सुख भेजकर हमें उदार बनने और परोपकार करने का संदेश देता है । हमको तो दुःख का आदर करना चाहिए, दुःख का उपकार मानना चाहिए ।

बचपन में हम दुःखी होते थे क्योंकि माँ-बाप जबरदस्ती विद्यालय ले जाते थे लेकिन ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नहीं, जिसका दुःख के बिना विकास हुआ हो । दुःख का तो खूब-खूब धन्यवाद करना चाहिए और यह दुःख दिखता दुःख है किंतु अंदर से सावधानी, सुख और विवेक जगानेवाला है । दुःख विवेक-वैराग्य जगाकर परमात्मा तक पहुँचने का सुंदर साधन है ।

मुझे सत्संग करने की भागादौड़ी से आराम करना चाहिए था किंतु मैं नहीं कर पा रहा था, तुम लोग नहीं करने देते थे तो भगवान ने लकवा करके देखो आराम दे दिया । यह उसकी कितनी कृपा है ! भगवान और दुःख की बड़ी कृपा है । माँ-बाप की कृपा है अतः मृत्यु के पश्चात् माँ-बाप का श्राद्ध-तर्पण करते हैं लेकिन इस बेचारे दुःख का तो श्राद्ध भी नहीं करते, तर्पण भी नहीं करते । यह बेचारा आता है, मर जाता है, रहता नहीं है । अब यह दुःख भी मिट जायेगा अथवा शरीर के साथ चला जायेगा ।’’

अश्विनी देखता रह गया ! गुरु ने आगे कहा : ‘‘बेटा ! यह तेरी-मेरी वार्ता जो सुनेगा-पढ़ेगा वह भी स्वस्थ हो जायेगा । बीमारी शरीर को होती है लाला ! दुःख मन में आता है, चिंता चित्त में आती है, तुम तो निर्लेप नारायण, अमर आत्मा हो ।’’
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Saturday, 31 March 2018

जय बोलो हनुमान की








       हनुमानजी माता सीता की खोज में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए लंका पहुँचे । अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन कर उन्हें भगवान राम का संदेश दिया । माता सीता हनुमानजी पर बहुत प्रसन्न हुईं तथा उनको आशीर्वाद दिया ।


      कितनी कसौटियों से गुजरने के बाद हनुमानजी को माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त होता है । सीताजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि ‘‘अजर बनो ।’’ लेकिन अजर होने (कभी वृद्ध न होने) का आशीर्वाद सुनकर हनुमानजी खामोश ही खड़े रहे, तनिक भी नहीं हिले-डुले । सीताजी को लगा कि शायद अजर होने का वरदान इसे कम पड़ता है, इसलिए उन्होंने दूसरा वरदान दिया कि ‘‘तुम अमर बनोगे ।’’ परंतु हनुमानजी इससे भी प्रभावित नहीं हुए । जब माता को लगा कि इसे अजर-अमर होने में रस नहीं है, तब तो उन्होंने तीसरा आशीर्वाद दिया कि ‘‘...गुननिधि सुत होहू । तुम गुणों की निधि होओगे ।’’
        हनुमानजी को इससे भी आनंद न मिला तब माताजी समझ गयीं कि इसको किस बात की भूख है । उन्होंने कहा : ‘‘अजर, अमर और गुणनिधि तो ठीक लेकिन जाओ, मेरा आशीर्वाद है कि श्रीराम तुमसे बहुत प्रेम करेंगे।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ।।’’

        ‘प्रेम करेंगे’- इतना सुनते ही हनुमानजी को मानो समाधि लग गयी । कुछ समय बाद वे बोले : -

                 ‘‘बस माँ ! मुझे यही चाहिए । मुझे अजर-अमरवाला वरदान नहीं, मुझे तो ‘मेरे भगवान मुझसे प्रेम करें’- यही चाहिए ।’’


       सीता माता ने पूछा : ‘‘हनुमंत ! इतने सारे आशीर्वाद मिले फिर भी तुम खुश न हुए लेकिन ‘रामजी तुम्हें प्रेम करेंगे’ यह सुनकर तुम शरीर की सुध-बुध भी खो बैठे, इसका क्या कारण है ?’’


          हनुमानजी ने वंदन कर कहा : ‘‘माता ! आप तो सर्वज्ञ हैं, सब जानती हैं । श्रीराम जिससे प्रेम करें, उसके लिए तो क्या कहना ! उसके वर्णन के लिए तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं ।’’


          फिर लंका में अपनी पूँछ का चमत्कार दिखाकर प्रभु के पास लौटने से पहले हनुमानजी पुनः अशोक वाटिका में माता से आज्ञा माँगने पहुँचे तो हनुमानजी की सच्ची निष्ठा से माता बहुत प्रसन्न हुईं । सीता माता ने उन्हें भगवान श्रीराम के लिए संदेश दिया और आशीर्वाद देकर हनुमानजी को जाने की आज्ञा प्रदान की । हनुमानजी की अनन्य निष्ठा का ही तो यह फल है कि जहाँ भी ‘राम-लक्ष्मण-जानकी’ को याद किया जाता है, वहाँ हनुमानजी का जयघोष अवश्य होता है । 



राम लक्ष्मण जानकी । जय बोलो हनुमान की ।। 



(लोक कल्याण सेतु : मार्च 2013)


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Saturday, 13 January 2018

एक पत्र ; जो आप के लिएभी है






घनश्यामदास जी बिड़ला का अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला के नाम 1934 में लिखित एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए –

चि. बसंत…..

यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना, अपने अनुभव की बात कहता हूँ।

संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग किया, वह पशु है।

तुम्हारे पास धन है, तन्दुरुस्ती है, अच्छे साधन हैं, उनको सेवा के लिए उपयोग किया, तब तो साधन सफल है अन्यथा वे शैतान के औजार हैं। तुम इन बातों को ध्यान में रखना।

धन का मौज-शौक में कभी उपयोग न करना, ऐसा नहीं की धन सदा रहेगा ही, इसलिए जितने दिन पास में है उसका उपयोग सेवा के लिए करो, अपने ऊपर कम से कम खर्च करो, बाकी जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो।

धन शक्ति है, इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है, इसका ध्यान रखो की अपने धन के उपयोग से किसी पर अन्याय ना हो।

अपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोड़कर जाओ। यदि बच्चे मौज-शौक, ऐश-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और हमारे व्यापार को चौपट करेंगे।

ऐसे नालायकों को धन कभी न देना, उनके हाथ में जाये उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम में लगा देना या गरीबों में बाँट देना। तुम उसे अपने मन के अंधेपन से संतान के मोह में स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं कर सकते।

हम भाइयों ने अपार मेहनत से व्यापार को बढ़ाया है तो यह समझकर कि वे लोग धन का सदुपयोग करेंगे l

भगवान को कभी न भूलना,
वह अच्छी बुद्धि देता है,

इन्द्रियों पर काबू रखना, वरना यह तुम्हें डुबो देगी।

नित्य नियम से व्यायाम-योग करना। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी सम्पदा है। स्वास्थ्य से कार्य में कुशलता आती है, कुशलता से कार्यसिद्धि और कार्यसिद्धि से समृद्धि आती है l

सुख-समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है l मैंने देखा है की स्वास्थ्य सम्पदा से रहित होनेपर करोड़ों-अरबों के स्वामी भी कैसे दीन-हीन बनकर रह जाते हैं स्वास्थ्य के अभाव में सुख-साधनों का कोई मूल्य नहीं। इस सम्पदा की रक्षा हर उपाय से करना।

भोजन को दवा समझकर खाना। स्वाद के वश होकर खाते मत रहना। जीने के लिए खाना हैं, न कि खाने के लिए जीना ।

घनश्यामदास बिड़ला

नोट :
श्री घनश्यामदास जी बिरला का अपने बेटे के नाम लिखा हुवा पत्र इतिहास के सर्वश्रेष्ठ पत्रों में से एक माना जाता है l

( विश्व में जो दो सबसे सुप्रसिद्ध और आदर्श पत्र माने गए है उनमें एक है ‘अब्राहम लिंकन का शिक्षक के नाम पत्र’ और दूसरा है ‘घनश्याम दास बिरला का पुत्र के नाम पत्र’)








Sunday, 13 August 2017

सफलता का मंत्र




कभी कभी हमारे जीवन में ऐसा समय आता है की हम हमारे वर्तमान समय, परिस्थिति को अनादर कर भविष्य की किसी संभावना के पीछे चले जाते हैं | और आयु, शक्ति और सामर्थ्य गवां बैठते हैं | जैसा इस शिष्य ने किया ---

एक नवयुवक जो जल्दी ही बोध को प्राप्त करना चाहता था| वह रोज़ गुरु से कहे कि कब बोध होगा, कब बोध होगा? एक दिन इस युवक को पता चला कि दूर एक शहर में एक ऐसा गुरु है, जिसके पास लोगों की बड़ी जल्दी उन्नति होती है| वह अपने गुरु के पास जाकर कहता है- ‘गुरुदेव! मैने सुना है एक गुरु हैं, जो जल्दी ही उन्नति करा देते हैं| तो क्या आप अनुमति देंगे कि मैं उन गुरु के पास चला जाऊं?’ गुरु ने कहा – ‘हाँ, चले जाओ|’
लम्बी यात्रा करके उस गुरु तक पहुँच गया और वहाँ जाकर जब उस गुरु से मिला तो गुरु ने पूछा कि कहाँ से आए हो? तो उसने अपने बौद्ध –मठ का नाम लिया| सुनकर गुरु के ओंठो पर मुस्कान आ गई और वह मौन रहे| फिर बोले कि ठीक है| फिर वह युवक बीस साल तक उनके पास रहा| बीस साल लग गए उसको साधना करते हुए और बड़े उतार-चढ़ाव आए| फिर एक दिन उसके  भीतर साधना का कमल खिल गया| बड़ा आनंदित होकर गुरु के पास गया और प्रणाम करके उनको धन्यवाद देता है और कहता है-‘ आपकी कृपा से अंतत: मेरी इच्छा पूर्ण हो गई?’
गुरु ने कहा – ‘क्या तुम जानते हो कि मेरा गुरु कौन है?’ युवक ने कहा – ‘यह तो आज तक मैने पूछा ही नहीं, तो कृपया आज मुझे बता ही दीजिए| गुरु ने कहा – ‘बेटे! तू जिस गुरु को छोड़ कर आया है, वह मेरा ही गुरु है| जो तुम्हें यहाँ बीस सालों में हुआ है, वह मुझे मेरे  गुरु ने दो सालों में दिया था| चूँकि तुमने जब कहा कि तुम वहाँ से आ रहे हो तो इस नाते तू मेरा गुरु भाई था| मुझे तुम पर बड़ी करुणा आ रही थी कि अपने महान गुरु की महिमा को तू पहचान ही नहीं पाया| तू कहीं भटक न जाए इसलिए मैने तुमको यह रहस्य उस समय नहीं बताया और चुपचाप तुमको यहाँ रख रहने की अनुमति दे दी| पर तेरी जल्दबाज़ी के कारण और तेरी गुरु को जाँचने और परखने की कमी के कारण तूने इतना समय गँवाया है| और मैं यह जानता हूँ कि अगर तुम वहाँ रहते और उन्हीं के पास रहते तो शायद यह कार्य आधे समय में ही हो जाता| क्योंकि गुरु तो गुरु ही है, कोई चेला गुरु के बराबर नहीं हो सकता|’
आगे गुरु बोले –‘ मैं जिनकी धूल माथे पर लगा कर बुद्धत्व को प्राप्त हुआ था, तू ऐसे महान गुरु को छोड़ कर मेरे पास आया था|’
इंसान के पास जो होता है, वह उसको पहचान ही नहीं पाता|

                                      



  (ऋषि अमृत अक्तूबर 2009)





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Sunday, 16 April 2017

अपने जन्म और कर्म को दिव्य कैसे बनायें ? #Bapuji

    जन्मोत्सव मनाना चाहिए, लेकिन विवेकपूर्ण मनाने से बहुत फायदा होता है; और विवेक में अगर वैराग्य मिला दिया जाये, तो और विशेष फायदा होता है...

और विवेक वैराग्य के साथ अगर भगवान के जन्म-कर्म को जानने वाली गति-मति हो जाये, तो परम कल्याण समझो...

ईश्वर में न जन्म और कर्म हैं, और न ही जीवत्व के बंधन और वासना है, इसलिए भगवान के कर्म और जन्म दिव्य माने जाते हैं...

भगवान के जन्म और कर्म दिव्य मानने से, जानने से, आपको भी लगेगा कि कर्म होते हैं तो पंचभौतिक शरीर से होते हैं, मन की मान्यता से होते हैं; मैं सब परिस्थितियों से असंग हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, प्रकाश मात्र हूँ, चैतन्य स्वरूप हूँ, आनंद स्वरूप हूँ...

इस प्रकार भगवान अपने स्वतः सिद्ध स्वभाव को जानते हैं, ऐसे ही आप भी अपने सिद्ध स्वभाव को जान लें, तो आपका जन्म और कर्म दिव्य हो जायेगा...

वास्तव में उत्तम साधक जानता है कि हाथ-पैर काम करते हैं, मन सोचता है, बुद्धि निर्णय लेती है, इन सब में बदलाहट होती है... 

लेकिन इनको जानने वाले ज्ञानस्वरूप हम स्वतः सिद्ध हैं, इनके आने जाने को भी हम देखते हैं...

ऐसी अपने आप में स्मृति आ जाये, अपने आप में जग जाये, तो उसका जन्म-कर्म दिव्य हो जायेगा...

जैसे तरंग हुए, बुलबुले हुए, झाग हुए, भँवर हुए, लेकिन पानी ज्यों का त्यों; 

ऐसे ही मन में स्फुरणा हुआ, बुद्धि में निर्णय हुए, शरीर में बदलाहट हुई, सुखाकार-दुखाकार वृत्तियाँ हुई, लेकिन वो सब वृत्तियाँ जिस परमात्म सत्ता से जानी जाती हैं, वो मैं आत्मा हूँ...

ऐसा जो जान लेता है, तो वो मरने के बाद नीच योनी या ऊँच योनी में भटकता नहीं है, भगवान के स्वतः सिद्ध स्वभाव में स्थित हो जाता है...

जिसमें कर्तृत्व भाव नहीं है, फल आकांक्षा नहीं है, उसके जन्म और कर्म दिव्य हो जाते हैं...

तो महापुरुषों का जन्मोत्सव मनाने से महापुरुषों को तो कोई फायदे-नुकसान का सवाल नहीं है, लेकिन हम लोगों को फायदा होता है कि उस निमित्त हम भी अपने जन्म और कर्म को दिव्य बनायें, कर्म बंधन से छूट जायें...

अष्टावक्र मुनि ने कहा: कर्तृत्व भोक्तृत्व जब तक रहेगा तब तक ये जीव जन्म मरण में भटकेगा; अपने आत्मा को अकर्ता और अभोक्ता जब मानता है उसी समय वो कर्म बंधन से छूट जाता है....

शुभ कर्म तो करे लेकिन शुभ कर्म का कर्ता अपने को न माने, प्रकृति ने किया और परमात्मा की सत्ता से हुआ...

अशुभ कर्म से बचे और कभी गलती से हो गए, तो अशुभ कर्म के कर्तापन में न उलझे, और फिर-फिर से ने करे, ह्रदयपूर्वक उसका त्याग कर दे, प्रायश्चित हो गया... 

तो शुभ अशुभ में अपने को न उलझाये, सुख और दुःख में अपने को न उलझाये, पुण्य और पाप में अपने को न उलझाये, अपने ज्ञान स्वभाव में जग जाये तो उसका जन्म-कर्म दिव्य हो जाता है...

Avtaran Divas Satsang Video of Pujya Gurudev

https://youtu.be/XndFYpEXXDg

(Haridwar Ashram, 4th April, 2010)7

Sunday, 19 February 2017

गौमाता प्रिय या पुत्र - अहिल्याबाई

एक बार की बात है इन्दौर नगर के किसी मार्ग के किनारे एक गाय अपने बछड़े के साथ खड़ी थी, तभी देवी अहिल्याबाई के पुत्र मालोजीराव अपने रथ पर सवार होकर गुजरे। मालोजीराव बचपन से ही बेहद शरारती व उच्छृंखल प्रवृत्ति के थे। राह चलते लोगों को परेशान करने में उन्हें विशेष आंनद आता था।
गाय का बछड़ा अकस्मात उछलकर उनके रथ के सामने आ गया। गाय भी उसके पीछे दौड़ी पर तब तक मालोजी का रथ बछड़े के ऊपर से निकाल चुका था ।

रथ अपने पहिये से बछड़े को कुचलता हुआ आगे निकल गया था । गाय बहुत देर तक अपने पुत्र की मृत्यु पर शोक मनाती रही ।

तत्पश्चात उठकर देवी अहिल्याबाई के दरबार के बाहर टंगे उस घण्टे के पास जा पहुँची, जिसे अहिल्याबाई ने प्राचीन राज परम्परा के अनुसार त्वरित न्याय हेतु विशेष रूप से लगवाया था।
अर्थात् जिसे भी न्याय की जरूरत होती,वह जाकर उस घन्टें को बजा देता था। जसके बाद तुरन्त दरबार लगता तुरन्त न्याय मिलता । घन्टें की आवाज सुनकर देवी अहिल्याबाई ने ऊपर से एक विचित्र दृश्य देखा कि एक गाय न्याय का घन्टा बजा रही है । देवी ने तुरन्त प्रहरी को आदेश दिया कि गाय के मालिक को दरबार में हाजिर किया जाये।

कुछ देर बाद गाय का मालिक हाथ जोड़ कर दरबार में खड़ा था। देवी अहिल्याबाई ने उससे कहा कि ” आज तुम्हारी गाय ने स्वंय आकर न्याय की गुहार की है । जरूर तुम गो माता को समय पर चारा पानी नही देते होगें। उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा कि माते श्री ऐसी कोई बात नही है ।
गोमाता अन्याय की शिकार तो हुई है, परन्तु उसका कारण मैं नही कोई ओर है, उनका नाम बताने में मुझे प्राणो का भय है ।” देवी अहिल्या ने कहा कि अपराधी जो कोई भी है उसका नाम निडर होकर बताओं ,तुम्हे हम अभय -दान देते है। तब उस व्यक्ति ने पूरी वस्तु:स्थित कह सुनायी । अपने पुत्र को अपराधी जानकर देवी अहिल्याबाई तनिक भी विचलीत नही हुई। और फिर गोमाता स्वयं उनके दरबार में न्याय की गुहार लगाने आयी थी। उन्होने तुरन्त मालोजी की पत्नी मेनावाई को दरबार में बुलाया यदि कोई व्यक्ति किसी माता के पुत्र की हत्या कर दें ,तो उसे क्या दण्ड मिलना चाहिए ? मालो जी की पत्नी ने कहा कि जिस प्रकार से हत्या हुई, उसी प्रकार उसे भी प्राण-दण्ड मिलना चाहिए। देवी अहिल्याने तुरन्त मालोजी राव का प्राण-दण्ड सुनाते हुए उन्हें उसी स्थान पर हाथ -पैर बाँधकर उसी अवस्था में मार्ग पर डाल दिया गया। रथ के सारथी को देवी ने आदेश दिया ,पर सारथी ने हाथ जोड़कर कहा मातेश्री मालोजी राजकुल के एकमात्र कुल दीपक है। आप चाहें तो मुझे प्राण -दण्ड दे दे, किन्तु मे उनके प्राण नही ले सकता ।

तब देवी अहिल्याबाई स्वंय रथ पर सवार हुई और मालोजी की ओर रथ को तेजी से दोड़ाया, तभी अचानक एक अप्रत्याशित घटना हुई। रथ निकट आते ही फरियादी गोमाता रथ निकट आ कर खड़ी हो गयी । गोमाता को हटाकर देवी ने फिर एक बार रथ दौड़ाया , फिर गोमाता रथ के सामने आ खड़ी हो गयी। सारा जन समुदाय गोमाता और उनके ममत्व की जय जयकार कर उठा। देवी अहिल्या की आँखो से भी अश्रुधारा बह निकलीं ।
गोमाता ने स्वंय का पुत्र खोकर भी उसके हत्यारे के प्राण ममता के वशीभूत होकर बचाये। जिस स्थान पर गोमाता आड़ी खड़ी हुई थी, वही स्थान आज इन्दौर में ( राजबाड़ा के पास) आड़ा बाजार के नाम से जाना जाता है।







Sunday, 12 February 2017

ऊपरवाली सरकार की नजरों से कोई बच नहीं सकता !





पाकिस्तानके सख्खर मेंसाधुबेलाआश्रम था। रमेशचन्द्रनाम के आदमीको उस समय केसंत महात्माने अपनी जीवनकथा सुनाई थीऔर कहा था किमेरी यह कथासब लोगों कोसुनाना। मैंकैसे साधु-संतबना यह समाजमें जाहिरकरना। वहरमेशचन्द्रबाद मेंपाकिस्तानछोड़कर मुंबईमें आ गया था।उस संत नेअपनी कहानीउसे बताते हुएकहा थाः“मैंजब गृहस्थ थातब मेरे दिनकठिनाई से बीतरहे थे। मेरेपास पैसे नहींथे। एक मित्रने अपनी पूँजीलगाकर रूई काधन्धा किया औरमुझे अपनाहिस्सेदारबनाया। रूईखरीदकरसंग्रह करतेऔर मुंबई मेंबेच देते।धन्धे मेंअच्छा मुनाफाहोने लगा।
एकबार हम दोनोंमित्रों कोवहाँ केव्यापारी नेमुनाफे के एकलाख रूपयेलेने के लिएबुलाया। हमरूपये लेकरवापस लौटे। एकसराय मेंरात्रिगुजारनेरूके। आज सेसाठ-सत्तर वर्षपहले की बातहै। उस समय कएक लाख जिससमय सोनासाठ-सत्तररूपये तोलाथा। मैंनेसोचाः एक लाखमें से पचासहजार मेरामित्र ले जाएगा।हालाँकिधन्धे मेंसारी पूँजीउसी ने लगाईथी फिर भीमुझे मित्र केनाते आधाहिस्सा दे रहाथा। फिर भीमेरी नीयतबिगड़ी।मैंने उसे दूधमें जहर पिलादिया। लाश कोठिकाने लगाकरअपने गाँव चलागया। मित्र केकुटुम्बीमेरे पास आयेतब मैंने नाटककिया, आँसूबहाय और उनकोदस हजार रूपयेदेते हुए कहाकि मेरा प्यारामित्र रास्तेमें बीमार होगया, एकाएक पेटदुखने लगा,काफी इलाजकिये लेकिन…हम सबको छोड़करविदा हो गये।दस हजार रूपयेदेखकर उन्हेंलगा कि, ‘यहबड़ा ईमानदारहै। बीस हजारमुनाफा हुआहोगा उसमें सेदस हजार देरहा है।‘ उन्हेंमेरी बात परयकीन आ गया।

बादमें तो मेरेघर मेंधन-वैभव होगया। नब्बे हजारमेरे हिस्सेमें आ गये थे।मैं जलसा करनेलगा। मेरे घरपुत्र का जन्महुआ। मेरेआनन्द काठिकाना न रहा।बेटा कुछ बड़ाहुआ कि वहकिसी अगम्यरोग से ग्रस्तहो गया। रोगऐसा था किभारत के किसीडॉक्टर का बसन चला उसे स्वस्थकरने में। मैंअपने लाडले कोस्वीटजरलैंडले गया। काफीइलाज करवाये,पानी की तरहपैसे खर्चकिये,बड़े-बड़ेडॉक्टरों कोदिखाया लेकिनकोई लाभ नहींहुआ। मेराकरीब करीब सबधन नष्ट होगया। दूसरा धनकमाया वह भीखर्च हो गया।आखिर निराशहोकर बच्चे कोभारत में वापसले आया। मेराइकलौता बेटा ! अब कोईउपाय नहीं बचाथा। डॉक्टर,वैद्य, हकीमोंके इलाज चालूरखे। रात्रिको मुझे नींदनहीं आती औरबेटा दर्द सेचिल्लातारहता।

एकदिन बेटे कोदेखते देखतेमैं बहुतव्याकुल होगया। विह्वलहोकर उसे कहनेलगाः
“बेटा! तूक्यों दिनोदिन क्षीणहोता चला जारहा है ? अबतेरे लिए मैंक्या करूँ ? मेरेलाडले लाल ! तेरा यहबाप आँसूबहाता है। अबतो अच्छा होजा, पुत्र !
बेटागंभीर बीमारीमें मूर्छितसा पड़ा था। मैंनेनाभि से आवाजउठाकर बेटे कोपुकारा था तोबेटा हँसनेलगा। मुझेआश्चर्य हुआ।अभी तो बेहोशथा फिर कैसेहँसी आई ? मैंनेबेटे से पूछाः
“बेटा! एकाएककैसे हंस रहाहै ?”
“जानेदो….।“
“नहींनहीं…. बताक्यों हँस रहाहै ?”
आग्रहकरने पर आखिरबेटा कहनेलगाः
“अभीलेना बाकी है,अभी बीमारीचालू रहेगी,इसलिए मैं हँसरहा हूँ। मैंतुम्हारा वहीमित्र हूँजिसे तुमनेजहर दिया था।मुंबई की धर्मशालामें मुझे खत्मकर दिया था औरमेरा सारा धनहड़प लिया था।मेरा वह धन औरउसका सूद मैंवसूल करने आयाहूँ। काफी कुछहिसाब पूरा होगया है। अबकेवल पाँच सौरूपये बाकीहैं। अब मैंआपको छुट्टीदेता हूँ। आपभी मुझे इजाजतदो। ये बाकीके पाँच सौरूपये मेरीउत्तर क्रियामें खर्चडालना, हिसाबपूरा होजाएगा। मैंजाता हूँ… रामराम….“ औरमेरे बेटे नेआँख मूँद ली,उसी क्षण वहचल बसा।

मेरेदोनों गालोंपर थप्पड़ पड़चुकी थी। साराधन नष्ट होगया और बेटाभी चला गया। मुझेकिये हुए पापकी याद आयी तोकलेजा छटपटानेलगा। जब कोईहमारे कर्मनहीं देखता हैतब देखने वालामौजूद है।यहाँ की सरकारअपराधी को शायदनहीं पकड़ेगीतो भी ऊपरवालीसरकार तो है ही।उसकी नजरों सेकोई बच नहींसकता।

मैंनेबेटे की उत्तरक्रियाकरवाई। अपनीबची-खुचीसंपत्तिअच्छी-अच्छीजगहों में लगादी और मैंसाधु बन गयाहूँ। आप कृपाकरके मेरी यहबात लोगों कोकहना। मैंनेभूल की ऐसीभूल वे न करें,क्योंकि यहपृथ्वीकर्मभूमि है।“

कर्मप्रधानविश्व करीराखा।
जोउस करे तैसाफल चाखा।।

कर्मका सिद्धान्तअकाट्य है।जैसे काँटे सेकाँटा निकलताहै ऐसे हीअच्छे कमों सेबुरे कर्मोंकाप्रायश्चितहोता है। सबसेअच्छा कर्म हैजीवनदातापरब्रह्मपरमात्मा कोसर्वथा समर्पितहो जाना।पूर्व काल मेंकैसे भी बुरेकर्म हो गयेहों उन कर्मोंकाप्रायश्चितकरके फिर सेऐसी गलती न होजाए ऐसा दृढ़संकल्प करनाचाहिए। जिसकेप्रति बुरेकर्म हो गयेहों उनसेक्षमायाचनाकरके, अपनाअन्तःकरणउज्जवल करकेमौत से पहलेजीवनदाता सेमुलाकात करलेनी चाहिए।
भगवानश्रीकृष्णकहते हैं-
अपिचेत्सुदराचारोभजतेमामनन्यभाक्।
साधुरेवस मन्तव्यःसम्यग्व्यवसितोहि सः।।

‘यदिकोई अतिशयदुराचारी भीअनन्य भाव सेमेरा भक्तहोकर मुझकोभजता है तो वहसाधु ही माननेयोग्य है,क्योंकि वहयथार्थनिश्चयवालाहै। अर्थात्उसनेभलीभाँतिनिश्चय करलिया है कि परमेश्वरके भजन केसमान अन्य कुछभी नहीं है।‘
(भगवद्गीताः 9.30)
तथा-


अपिचेदासिपापेभ्यःसर्वेभ्यःपापकृत्तमः।
सर्वंज्ञानप्लवेनैववृजिनंसंतरिष्यसि।।

‘यदितू अन्य सर्वपापियों से भीअधिक पाप करनेवाला है तो भीतू ज्ञान रूपनौका द्वारानिःसन्देहसम्पूर्णपाप-समुद्र सेभली-भाँति तरजाएगा।‘
(भगवद्गीताः 4.36)