Friday, 26 December 2025

अकबर और बीरबल की कथा — पाव भर चूना

 


कथा - मुगल सम्राट अकबर के दरबार में बीरबल अपनी विलक्षण बुद्धि और गहरी समझ के लिए प्रसिद्ध थे। अकबर स्वयं तर्कशील और व्यवहारकुशल शासक थे, फिर भी बीरबल की सूझ‑बूझ उन्हें विशेष रूप से प्रभावित करती थी। कहा जाता है कि बीरबल निरंतर सरस्वती मंत्र का स्मरण करते थे, जिससे उनकी बुद्धि में स्थिरता, स्पष्टता और समय से पहले परिस्थितियों को समझ लेने की क्षमता विकसित हो गई थी।

एक प्रातःकाल अकबर का एक खोजा बीरबल के पास आया। उसने विनम्रता से कहा, “बीरबल जी, मुझे पाव भर चूना चाहिए।” बीरबल  आगरा में पान की गुमटी चलाता था, पढ़ा‑लिखा था और उसी आय से अपने माता‑पिता तथा परिवार का पालन‑पोषण करता था। 

यह बात सुनकर बीरबल साधारण रूप से उत्तर देने के बजाय कुछ क्षण मौन हो गए। उन्होंने मन‑ही‑मन सरस्वती मंत्र का स्मरण किया और ध्यान में स्थिति को परखा। उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि इस माँग के पीछे कोई गंभीर कारण छिपा है।

बीरबल ने खोजे से कहा, “तुमने कल बादशाह अकबर को पान लगाते समय लापरवाही की है। चूना अधिक लग गया, जिससे बादशाह के मुख में छाले पड़ गए हैं। आज वे अत्यंत क्रोधित हैं। वे तुम्हें दरबार में बुलवाकर पाव भर चूना मंगवाएँगे और सिपाहियों के सामने तुम्हें उसे खाने के लिए बाध्य करेंगे। यदि तुम मना करोगे, तो तलवार और भालों की नोक पर खिलाया जाएगा।”

यह सुनते ही खोजा भय से काँप उठा। उसने व्याकुल होकर कहा, “तो अब मैं क्या करूँ? क्या भाग जाना ही एकमात्र उपाय है, या मृत्यु को स्वीकार कर लूँ?”

बीरबल ने शांत और आश्वस्त स्वर में कहा, “घबराओ मत। कल मैं पाव भर से अधिक घी लाया था। तुम पहले पाव भर घी अच्छी तरह पी लो और उसके बाद ही दरबार में जाना। जब ऊपर से चूना खाओगे, तो घी उसकी तीव्रता को कम कर देगा। इस प्रकार तुम सुरक्षित रहोगे।”

खोजे ने बीरबल की बात पर पूरा विश्वास किया। उसने वैसा ही किया और साहस जुटाकर चूना लेकर अकबर के दरबार में पहुँचा।

दरबार में पहुँचते ही अकबर का क्रोध प्रकट हो गया। उन्होंने कठोर शब्दों में कहा, “लापरवाह व्यक्ति दुश्मन से भी अधिक घातक होता है। बुद्धिमान शत्रु से बचा जा सकता है, पर मूर्ख और असावधान सेवक पूरे राज्य के लिए संकट बन जाता है। मेरे मुख में छाले पड़ गए हैं। तू कर्तव्य‑भ्रष्ट है।”

अकबर ने सिपाहियों को आदेश दिया, “यदि यह चूना खाने से मना करे, तो तलवार और भालों की नोक पर इसे खिलाया जाए।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी की दृष्टि खोजे पर टिक गई। खोजा बिना किसी हिचकिचाहट के चूना खाने लगा। लोग आश्चर्य से यह दृश्य देखते रहे, यह सोचकर कि उसका अंत निकट है।

दो दिन बीत गए। सभी को विश्वास था कि खोजा जीवित नहीं बचेगा। किंतु दो दिन बाद वही खोजा पूर्णतः स्वस्थ, ताजा और निर्भीक होकर पुनः अकबर के सामने उपस्थित हुआ। अकबर उसे देखकर अचंभित रह गए।

उन्होंने पूछा, “पाव भर चूना खाने के बाद भी तू जीवित कैसे है?”

तब खोजे ने पूरी घटना विस्तार से सुना दी और बताया कि यह सब बीरबल की बुद्धि और मार्गदर्शन का परिणाम था। बीरबल ने पहले ही बादशाह के मन की बात समझ ली थी और उसी अनुसार उसे उपाय बताया था।

अकबर ने तुरंत बीरबल को सम्मानपूर्वक दरबार में बुलवाया और कहा, “बीरबल, तुमने मेरे मन की बात जान ली।”

बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। यह गुरु‑प्रदत्त मंत्र और गुरु की आज्ञा का फल है। मैं तो केवल उसी के अनुसार अपने मन का अनुसंधान करता हूँ।”

 शिक्षा

यह कथा सिखाती है कि सच्ची बुद्धि केवल चतुराई या रटंत विद्या से नहीं आती, बल्कि शांत मन, विवेक और अहंकार‑रहित ज्ञान से उत्पन्न होती है। अहंकार व्यक्ति को अंधा कर देता है, जबकि विनम्रता और गुरु‑कृपा मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थिति में भी मार्ग दिखा देती है।

विद्या वही श्रेष्ठ है जो विवेक जगाए, धन वही सार्थक है जो धर्म के मार्ग पर लगे और शक्ति वही उपयोगी है जो करुणा से संचालित हो। बीरबल का जीवन इस सत्य का उदाहरण है कि जब ज्ञान अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर‑स्मृति से जुड़ जाता है, तब वही ज्ञान मनुष्य को महान बनाता है।





No comments:

Post a Comment