अष्ट वसु, नंदिनी और भीष्म: कर्म, श्राप और मोक्ष की अमर कथा
देवलोक में अष्ट वसु—आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—धर्म, तेज और सेवा के प्रतीक माने जाते थे। इन वसुओं में प्रभास सबसे अधिक तेजस्वी थे। एक समय ये सभी महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में अतिथि बनकर पहुँचे। वशिष्ठ मुनि का आश्रम तप, शांति और दिव्य समृद्धि का केंद्र था। उसी आश्रम में निवास करती थीं दिव्य कामधेनु नंदिनी, जो केवल एक गाय नहीं, बल्कि धर्म, अन्न और यज्ञ की साक्षात् शक्ति थीं।
नंदिनी के अनुपम सौंदर्य और अद्भुत सामर्थ्य को देखकर प्रभास वसु की पत्नी का मन मोहित हो उठा। उनके हृदय में यह कामना जागी कि यदि यह दिव्य गाय उनकी सखी के पास चली जाए, तो उसका जीवन धन्य हो जाए। उन्होंने यह इच्छा प्रभास के सामने रखी। प्रभास ने शांत और विवेकपूर्ण स्वर में उत्तर दिया कि यह ऋषि की संपत्ति है, और चोरी का फल अवश्य भोगना पड़ता है; देव होकर अधर्म करना उन्हें शोभा नहीं देता।
किन्तु बार-बार का आग्रह, सखी के प्रति करुणा और पत्नी के भावनात्मक दबाव के कारण प्रभास का विवेक धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। अंततः अन्य वसुओं की मौन सहमति के साथ उन्होंने महर्षि वशिष्ठ की नंदिनी का अपहरण कर लिया।
महर्षि वशिष्ठ ध्यानस्थ थे। तपोबल से उन्होंने तुरंत जान लिया कि यह कृत्य अष्ट वसुओं द्वारा किया गया है। उनका वचन क्रोध से नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए निकला—जो देव धर्म का उल्लंघन करेंगे, वे देवपद से गिरकर मनुष्य योनि में जन्म लेंगे। यह सुनकर देवता भयभीत हो उठे और ब्रह्मा की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा ने स्पष्ट कहा कि ऋषि का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता।
देवताओं की करुण प्रार्थना पर यह विधान हुआ कि सात वसु मनुष्य योनि में जन्म लेकर शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होंगे, जिससे उन्हें तुरंत मुक्ति मिल जाएगी। किंतु आठवाँ वसु प्रभास, जिसने प्रत्यक्ष रूप से अधर्म किया था, उसे दीर्घ जीवन भोगना पड़ेगा।
इसी श्राप और वर के विधान से राजा शंतनु और देवी गंगा के यहाँ अष्ट वसुओं का जन्म हुआ। जन्म लेते ही गंगा ने अपने सात पुत्रों को जल में प्रवाहित कर दिया, जिससे वे बंधन से मुक्त हो गए। आठवाँ पुत्र जीवित रहा। वही प्रभास वसु आगे चलकर देवव्रत कहलाया और कालांतर में वही संसार में भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भीष्म धर्म की सजीव प्रतिमा थे। पिता की प्रसन्नता और वचन की रक्षा के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत धारण किया। उनकी इस अनुपम प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ।
महाभारत के महासंग्राम में भीष्म शरशय्या पर लेटे रहे। वे चाहें तो उसी क्षण अपने प्राण त्याग सकते थे, किंतु उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की। शास्त्र कहते हैं कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाला योगी सूर्य मार्ग से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। भीष्म जानते थे कि काल, दिशा और चेतना—तीनों का समन्वय ही उत्तम गति का कारण बनता है।
जब उत्तरायण का पुण्य काल आया, भीष्म ने अपने नेत्र मूँद लिए। शरशय्या पर लेटे-लेटे उन्होंने परब्रह्म परमात्मा की स्तुति की—उस परब्रह्म की, जो कर्म, श्राप और वर से परे है, और फिर भी सबका साक्षी है। उस समय स्वयं श्रीकृष्ण उनके समीप उपस्थित थे। भीष्म की चेतना धीरे-धीरे शब्द, रूप और देह की सीमाओं को पार करती हुई ब्रह्म में लीन हो गई। इस प्रकार प्रभास वसु का अधूरा कर्म पूर्ण हुआ और एक श्राप अंततः मोक्ष में परिवर्तित हो गया।
शिक्षा
यह कथा हमें गहराई से यह सिखाती है कि कर्म का विधान देवताओं पर भी समान रूप से लागू होता है। विवेक से किया गया छोटा-सा निर्णय जीवन की दिशा बदल सकता है, और भावनात्मक आग्रह में लिया गया एक गलत कदम दीर्घ भोग का कारण बन जाता है।
अष्ट वसुओं का पतन यह स्मरण कराता है कि धर्म केवल ज्ञान से नहीं, आचरण से जीवित रहता है। वहीं भीष्म का जीवन यह दर्शाता है कि यदि मनुष्य जीवन भर सत्य, संयम और प्रतिज्ञा का पालन करे, तो सबसे कठोर कर्मफल भी अंततः मोक्ष का मार्ग बन सकता है।
उत्तरायण की प्रतीक्षा करता हुआ भीष्म हमें यह शिक्षा देता है कि काल, दिशा और चेतना का सामंजस्य आध्यात्मिक उन्नति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंततः यह कथा यही कहती है कि श्राप और वर दोनों से परे केवल परब्रह्म की शरण ही परम शांति और मुक्ति का साधन है।
हरि ॐ।

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