Thursday, 15 January 2026

जयपुर - गलता तीर्थ का इतिहास : शांडिली, महर्षि गालव और गरुड़ जी प्रसंग


 नींद बनेगी भक्ति - सोने से पहले की दिव्य साधना

शांडिली, जिसे शांली भी कहा गया, एक साधारण परिवार की कन्या थी। विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह अपने गुरु के पास आई और विनम्र भाव से पूछा—“गुरु जी, अब आगे क्या करूँ?” गुरु ने उससे पूछा कि क्या वह गुरु की आज्ञा का पालन करेगी। शांडिली ने दृढ़ स्वर में कहा कि वह पूर्ण रूप से आज्ञा का पालन करेगी। तभी गुरु ने उसका नाम पूछा। उसने कहा—“मेरा नाम शांली है।” गुरु ने पुनः पूछा—“क्या सचमुच मानेगी?” और उसने निश्चयपूर्वक उत्तर दिया—“हाँ गुरु जी, अवश्य मानूँगी।” तब गुरु ने उसे अनुष्ठान, मंत्र-साधना और आत्मशक्ति को जगाने का मार्ग बताया।

गुरु ने समझाया कि घर का वातावरण प्रायः राजसी और तामसी होता है, वहाँ शोर-गुल और सांसारिक हलचल रहती है, जिससे भक्ति में गहराई नहीं आ पाती। इसलिए उन्होंने उसे जयपुर के समीप, लगभग बाईस किलोमीटर दूर एक पहाड़ी की गुफा में साधना करने का निर्देश दिया। शांडिली ने गुरु-आज्ञा को ही जीवन का आधार मानकर उसी गुफा में जाकर अनुष्ठान आरंभ किया।

वहाँ वह नियमित रूप से गुरु-मंत्र का जप, प्राणायाम, और नियमपूर्वक साधना करने लगी। वह सांसारिक आकर्षणों से दूर रही। न किसी लौकिक संबंध में उलझी, न किसी भोग की ओर झुकी। इसी कारण उसकी भक्ति शीघ्र फल देने लगी। कुछ ही दिनों में उसके भीतर की आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत होने लगीं। कभी वह भाव-विभोर हो जाती, कभी हँसी आ जाती, कभी दिव्य प्रकाश दिखाई देता, तो कभी देवी-देवताओं के दर्शन होते।

उस समय कन्याएँ अपने बाल लंबे रखती थीं। शांडिली के केश भी रेशम-से लंबे थे। वह उन्हें घुमाकर जटा की भाँति बाँध लेती, जैसे भगवान शिव अपनी जटाएँ धारण करते हैं। संध्या के समय वह पहाड़ी पर स्थित तुलसी या पुष्पों को जल अर्पित करती। उसका जीवन पूरी तरह संयम, पवित्रता और साधना में लीन हो गया था।

एक दिन महर्षि गालव और गरुड़ जी जयपुर की शोभा देखते हुए उस पहाड़ी की ओर आए। दूर से उन्हें लगा कि कोई तेजस्वी ब्रह्मचारी युवक तपस्या कर रहा है, शिव-तुल्य वेश धारण किए हुए। जिज्ञासा से वे नीचे उतरे। समीप जाकर देखा तो आश्चर्य हुआ—वह कोई युवक नहीं, बल्कि एक दिव्य तेज से युक्त कन्या थी। शांडिली ने उनका यथोचित स्वागत किया, जल-फल-फूल अर्पित किए। वह जितनी बाह्य रूप से सुंदर थी, उतनी ही बुद्धि और विवेक से परिपक्व थी।

गालव ऋषि उसके संयम, शांति और तेज को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने मन ही मन सोचा कि ऐसी कन्या धरती पर सामान्य जीवन के लिए नहीं बनी है। वे उसे भगवान नारायण के पास ले जाकर उपलक्ष्मी बनाने का विचार करने लगे। गरुड़ जी ने भी यही प्रस्ताव रखा। उन्होंने शांडिली से कहा कि वे उसे भगवान नारायण की सहचरी बनाना चाहते हैं।

शांडिली ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया—“महाराज, मैं यह साधना विवाह या ऐश्वर्य के लिए नहीं कर रही। भगवान नारायण जैसे नारायण हैं, शिव जैसे शिव हैं, ब्रह्मा जैसे ब्रह्मा हैं, और उसी चेतना से हम जीवात्माएँ प्रकट हुई हैं। अज्ञान में हम स्वयं को तुच्छ समझते हैं, पर ज्ञान में जान लेते हैं कि वही परमात्मा हम ही हैं। मैं उस आत्मा का साक्षात्कार चाहती हूँ जिसमें शांति, आनंद और सामर्थ्य है। गुरु ने दीक्षा में जो बताया है—जप, विश्रांति योग, अभिकंप योग—मैं उसी का अनुभव चाहती हूँ।”

यह देखकर गालव और गरुड़ समझ गए कि यह कन्या साधारण नहीं है। उन्होंने उस रात वहीं ठहरने का निर्णय लिया। भीतर-भीतर उन्होंने विचार किया कि शांडिली अभी मान नहीं रही है, अतः उसे बलपूर्वक भगवान नारायण के दर्शन कराने ले जाया जाए। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि में उसका अपहरण करेंगे।

रात्रि के मध्य, जब शांडिली श्वास के साथ ओम-स्मरण करते हुए विश्राम में थी, तब गालव ऋषि गुफा में प्रविष्ट हुए। उसी क्षण उसके अंतरात्मा में स्पंदन हुआ। उसने नेत्र खोलकर ध्यान किया और जान लिया कि ऋषि उसका अपहरण करने आए हैं। उसने निर्भीक होकर कहा कि स्त्रियाँ और कन्याएँ अपनी शक्ति को भूलकर स्वयं को अबला मान लेती हैं, पर आज वह अपनी आत्मशक्ति का परिचय देना चाहती है।

उसने घोषणा की—“ओम श्री परमात्मने नमः। जो मेरी अंतरात्मा है वही वायु, जल, अग्नि, वरुण, कुबेर सभी देवताओं की भी अंतरात्मा है। उसी साक्षी में मैं कहती हूँ कि मैंने कभी किसी पुरुष के प्रति अशुद्ध भाव नहीं रखा और गुरु-आज्ञा से किया गया मेरा अनुष्ठान सत्य है।”

इतना कहते ही भयंकर वायु-प्रकोप आरंभ हो गया। उसी क्षण वायु देवता ने अपना परिचय दिया। चारों ओर ऐसा चक्रवात उठा कि जल छंटने लगा, पेड़-पौधे हिलने लगे और पूरी गुफा-गिरि में भूमंडल काँप उठा। ऐसा प्रतीत होने लगा मानो धरती स्वयं आकाश में उठकर उड़ जाएगी। यह साधारण हवा नहीं थी, बल्कि वायु देवता की सजीव और चेतन सत्ता थी।

गरुड़ जी घबरा उठे। उन्होंने अपने पंख फैलाकर स्थिर रहने का प्रयास किया, किंतु उनके पंख शिथिल होने लगे, मानो गल रहे हों। गालव ऋषि भी भयभीत हो उठे। उन्होंने मंत्रों का स्मरण कर स्वयं को बचाने का प्रयास किया, पर वही वायु-चक्र बार-बार उन्हें घुमा देता। वायु देवता में यह सामर्थ्य प्रत्यक्ष प्रकट हो गया कि वह जिसे चाहे उड़ा ले जाए और जहाँ चाहे पटक दे। तब दोनों को स्पष्ट हो गया कि यह किसी साधारण कन्या की नहीं, बल्कि गुरु-आज्ञा से जाग्रत आत्मशक्ति का प्रभाव है।

अंततः गालव ऋषि और गरुड़ जी दोनों ने हाथ जोड़कर कहा—“शांडिली, अपना प्रकोप शांत करो। अब हमें ज्ञात हो गया है कि तुम साधारण कन्या नहीं हो। तुम्हारी साधना सत्य है और गुरु-आज्ञा से युक्त है। हमें क्षमा करो।” उन्होंने वायु देवता से भी करुण प्रार्थना की। तब शांडिली ने पुनः ओमकार का स्मरण किया और उसी क्षण वायु देवता शांत हो गए, प्रकृति स्थिर हो गई।

प्रसन्न होकर गालव ऋषि और गरुड़ जी ने शांडिली को वरदान दिया कि उसकी ओमकार साधना, श्वास-साधना और आत्मा-परमात्मा के ऐक्य का यह दृढ़ ज्ञान संसार की बहू-बेटियों और स्त्रियों को अबलापन के भाव से मुक्त करेगा। उन्होंने घोषणा की कि इस पर्वत का नाम गलता तीर्थ होगा—जहाँ गालव और गरुड़ के पंख गल गए और एक तेजस्विनी कन्या की तपस्या अमर हो गई। आज भी यह तीर्थ जयपुर के समीप स्थित है और साक्ष्य देता है कि कन्याओं, स्त्रियों और बच्चों में परमात्मा का कितना महान सामर्थ्य निहित है—कि वायु देवता तक उनकी साधना के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।





Tuesday, 13 January 2026

पितामह भीष्म और उत्तरायण

 

अष्ट वसु, नंदिनी और भीष्म: कर्म, श्राप और मोक्ष की अमर कथा



देवलोक में अष्ट वसु—आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—धर्म, तेज और सेवा के प्रतीक माने जाते थे। इन वसुओं में प्रभास सबसे अधिक तेजस्वी थे। एक समय ये सभी महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में अतिथि बनकर पहुँचे। वशिष्ठ मुनि का आश्रम तप, शांति और दिव्य समृद्धि का केंद्र था। उसी आश्रम में निवास करती थीं दिव्य कामधेनु नंदिनी, जो केवल एक गाय नहीं, बल्कि धर्म, अन्न और यज्ञ की साक्षात् शक्ति थीं।

नंदिनी के अनुपम सौंदर्य और अद्भुत सामर्थ्य को देखकर प्रभास वसु की पत्नी का मन मोहित हो उठा। उनके हृदय में यह कामना जागी कि यदि यह दिव्य गाय उनकी सखी के पास चली जाए, तो उसका जीवन धन्य हो जाए। उन्होंने यह इच्छा प्रभास के सामने रखी। प्रभास ने शांत और विवेकपूर्ण स्वर में उत्तर दिया कि यह ऋषि की संपत्ति है, और चोरी का फल अवश्य भोगना पड़ता है; देव होकर अधर्म करना उन्हें शोभा नहीं देता।

किन्तु बार-बार का आग्रह, सखी के प्रति करुणा और पत्नी के भावनात्मक दबाव के कारण प्रभास का विवेक धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। अंततः अन्य वसुओं की मौन सहमति के साथ उन्होंने महर्षि वशिष्ठ की नंदिनी का अपहरण कर लिया।

महर्षि वशिष्ठ ध्यानस्थ थे। तपोबल से उन्होंने तुरंत जान लिया कि यह कृत्य अष्ट वसुओं द्वारा किया गया है। उनका वचन क्रोध से नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए निकला—जो देव धर्म का उल्लंघन करेंगे, वे देवपद से गिरकर मनुष्य योनि में जन्म लेंगे। यह सुनकर देवता भयभीत हो उठे और ब्रह्मा की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा ने स्पष्ट कहा कि ऋषि का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता।

देवताओं की करुण प्रार्थना पर यह विधान हुआ कि सात वसु मनुष्य योनि में जन्म लेकर शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होंगे, जिससे उन्हें तुरंत मुक्ति मिल जाएगी। किंतु आठवाँ वसु प्रभास, जिसने प्रत्यक्ष रूप से अधर्म किया था, उसे दीर्घ जीवन भोगना पड़ेगा।

इसी श्राप और वर के विधान से राजा शंतनु और देवी गंगा के यहाँ अष्ट वसुओं का जन्म हुआ। जन्म लेते ही गंगा ने अपने सात पुत्रों को जल में प्रवाहित कर दिया, जिससे वे बंधन से मुक्त हो गए। आठवाँ पुत्र जीवित रहा। वही प्रभास वसु आगे चलकर देवव्रत कहलाया और कालांतर में वही संसार में भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भीष्म धर्म की सजीव प्रतिमा थे। पिता की प्रसन्नता और वचन की रक्षा के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत धारण किया। उनकी इस अनुपम प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ।

महाभारत के महासंग्राम में भीष्म शरशय्या पर लेटे रहे। वे चाहें तो उसी क्षण अपने प्राण त्याग सकते थे, किंतु उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की। शास्त्र कहते हैं कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाला योगी सूर्य मार्ग से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। भीष्म जानते थे कि काल, दिशा और चेतना—तीनों का समन्वय ही उत्तम गति का कारण बनता है।

जब उत्तरायण का पुण्य काल आया, भीष्म ने अपने नेत्र मूँद लिए। शरशय्या पर लेटे-लेटे उन्होंने परब्रह्म परमात्मा की स्तुति की—उस परब्रह्म की, जो कर्म, श्राप और वर से परे है, और फिर भी सबका साक्षी है। उस समय स्वयं श्रीकृष्ण उनके समीप उपस्थित थे। भीष्म की चेतना धीरे-धीरे शब्द, रूप और देह की सीमाओं को पार करती हुई ब्रह्म में लीन हो गई। इस प्रकार प्रभास वसु का अधूरा कर्म पूर्ण हुआ और एक श्राप अंततः मोक्ष में परिवर्तित हो गया।

शिक्षा

यह कथा हमें गहराई से यह सिखाती है कि कर्म का विधान देवताओं पर भी समान रूप से लागू होता है। विवेक से किया गया छोटा-सा निर्णय जीवन की दिशा बदल सकता है, और भावनात्मक आग्रह में लिया गया एक गलत कदम दीर्घ भोग का कारण बन जाता है।

अष्ट वसुओं का पतन यह स्मरण कराता है कि धर्म केवल ज्ञान से नहीं, आचरण से जीवित रहता है। वहीं भीष्म का जीवन यह दर्शाता है कि यदि मनुष्य जीवन भर सत्य, संयम और प्रतिज्ञा का पालन करे, तो सबसे कठोर कर्मफल भी अंततः मोक्ष का मार्ग बन सकता है।

उत्तरायण की प्रतीक्षा करता हुआ भीष्म हमें यह शिक्षा देता है कि काल, दिशा और चेतना का सामंजस्य आध्यात्मिक उन्नति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंततः यह कथा यही कहती है कि श्राप और वर दोनों से परे केवल परब्रह्म की शरण ही परम शांति और मुक्ति का साधन है।

हरि ॐ।