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Tuesday, 22 August 2023

दुःख का कितना बड़ा उपकार

 



एक बड़ा प्रसिध्द राज नेता था बंगाल में ….बड़ा जाना-माना था..धर्म परायण व्यक्ति था..अश्विनी दत्त बंगाल के प्रसिध्द राज नेता थे..उन के गुरु राज नारायण थे.

उस के गुरु को लकवा मार गया..3 महीने के बाद अश्विनी को पता चला…3 महीने से गुरु को लकवा मार गया, मुझे पता नही चला सोच कर विव्हल हो कर भागता भागता आया गुरु के पास…ज्यो ही गुरु के पास पहुँचा..प्रणाम करने जाता है तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा  हो चुका था..गुरु ने दूसरे हाथ से पकड़ के उठाया..
बोले, ‘बेटा, कैसे भागे भागे आए हो…देखो भागा तो शरीर..और दुख हुआ मन में..लेकिन इन दोनो को तुम जानने वाले हो..ऐसा कर के गुरु ने सत्य स्वरूप ईश्वर आत्मा की सार बातें बताई..सुनते सुनते वो तो दुखी आया था, चिंतित हो के आया था…लेकिन गुरु की वाणी सुनते सुनते उस का दुख चिंता गायब हो गया..3 घंटे कैसे बीत  गये पता ही नही चला…
हसने लगा,”गुरु जी 3 घंटे बीत  गये!मुझे तो पता ही नही चला..मैं तो बहोत विव्हल  हो के आया था आप का स्वास्थ्य पुछने के लिए..लेकिन आप को ये लकवा मार गया इस की पीड़ा नही?..दुख नही? हम तो बहोत  दुखी थे और आप ने तो मेरे को 3 घंटे तक सत्संग का अमृतपान  कराया…”
गुरु ने अश्विनी दत्त(बंगाल के प्रसिध्द नेता) के पीठ पे थपथपाया..बोले, “पगले पीड़ा हुई है तो शरीर को..लकवा मारा है तो शरीर को..इस हाथ को..लेकिन दूसरा हाथ मौजूद है, पैर भी मौजूद है, जिव्हा भी मौजूद है..ये उस प्रभु की कितनी कृपा है!..पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था..हार्ट एटैक हो सकता था.और 60 साल तक शरीर स्वस्थ रहा..अभी थोड़े दिन..3 महीने से ही तो लकवा है …ये उस की कितनी कृपा है की दुख भेज कर वो हम को शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है..सुख भेज कर हमें उदार बनाने का और परोपकार करने का संदेश देता है..हम को तो दुख का आदर करना चाहिए..दुख का उपकार मानना चाहिए..बचपन में हम दुखी होते थे जब माँ-बाप ज़बरदस्ती स्कूल ले जाते थे..लेकिन वो दुख नही होता तो आज हम विद्वान भी नही हो सकते थे..ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नही है जिस का दुख के बिना विकास हुआ हो…दुख का तो खूब खूब धन्यवाद करना चाहिए…और दिखता दुख है, लेकिन अंदर से सुख, सावधानी और विवेक से भरा है.. और मुझे हरिचर्चा में विश्रान्ति दिलाया.. सत्संग करने के भागा दौड़ी से आराम करना चाहिए था, लेकिन मैं नही कर पा रहा था…तुम लोग नही करने देते थे..तो भगवान ने लकवा कर के आराम दिया..देखो ये उस की कितनी कृपा है..भगवान की और दुख की बड़ी कृपा है..माँ-बाप की कृपा है तो माँ बाप का हम श्राध्द  करते, तर्पण करते..लेकिन इस दुख देवता का तो हम श्राध्द तर्पण भी नही करते..क्यूँ की वो बेचारा आता है, मर जाता है..रहेता नही है…अभी ठीक भी हो जाएगा, अथवा शरीर के साथ चला जाएगा..माँ बाप तो मरने के बाद भी रहेते है..ये बेचारा तो एक बार मर जाता है तो फिर रहेता ही नही..तो इस का तो श्राद्ध  भी नही करते, तो इस का तो उपकार माने बेटे अश्विनी…”
अश्विनी देखता रहे गया !
गुरु ने कहा, “बेटा ये तेरी मेरी वार्ता जो सुनेगा वो भी स्वस्थ हो जाएगा.. बीमारी शरीर में आती है लाला!..दुख  तो मान में आता है …चिंता चित्त में आती है..तुम तो निर्लेप  नारायण के अमर आत्मा हो!”
हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम.. माधुर्य ओम..मेरे जी ओम ओम..प्यारे जी ओम…हा हा हा हा

मनुष्य को भगवान ने कितने कितने  अनुदान दिए है..ज़रा सोचते है तो मौन हो जाता है! मन विश्रान्ति में चला जाता है…जब तेरा गुरु है, और तू बोले की मैं परेशान हूँ, मैं दुखी हूँ तो तू गुरु का अपमान करता है..मानवता का अपमान करता है..जो बोलते है ना मैं दुखी हूँ, परेशान हूँ  तो समझ लेना की उन के भाग्य के वे शत्रु है…अभागे लोग सोचते है मैं दुखी, परेशान हूँ..समझदार लोग ऐसा कभी नही सोचते है…जो बोलते मैं दुखी परेशान हूँ उस के मान में  दुख परेशानी  ऐसा गहेरा उतरता जाएगा की जैसे हाथी दलदल में फँसे और ज्यों निकलना चाहे तो और गहेरा उतरे ..ऐसे ही दुखी और परेशान हूँ बोलते तो समझो वो दुख और परेशानी में हाथी के नाई  गहेरा जा रहा है..अभागा है..अपने भाग्य को कोस रहा है..
‘मैं दुखी नही हूँ, मैं परेशान नही हूँ..दुख है तो मन को है, परेशानी है तो मन को है..’ ये पक्का करे..वास्तव में मन की कल्पना है परेशानी..दुख परेशानी  तो मेरे विकास करने के लिए है  ..वाह मेरे प्रभु !
सुखम वा यदि वा दुखम स योगी परमो मतः ll

जिस वस्तु को हम प्यार करते वो प्यारी हो जाती है, जिस वस्तु को हम महत्व देते वो महत्व पूर्ण हो जाती है..जिस वस्तु को मानव ठुकरा दे वो वस्तु बेकार हो जाती है..नोइडा में जहा सत्संग हुआ था तो वहाँ खेत थे..और वहाँ अब पौने चार लाख रुपये में 1 मीटर जगह मिलती है..हे मानव तू जिस जगह को महत्व देता वो जगह कीमती हो जाती..तू जिस फॅशन को महत्व देता वो कीमती हो जाती..तू इतना सब को महत्व देनेवाला अपने आप को कोस कर अपना सत्यानाश क्यूँ करता है?

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Wednesday, 3 October 2018

सबसे ठोस क्या है?








सब से ज्यादा सुदृढ़ क्या है?

--- ज्यादा ठोस है संकल्प बल…!
दृढ निश्चय…. संकल्प बल सब से ठोस है….”
एक भाई विकलांग था…संकल्प बल मिला…विद्वान् हुआ…. महा-निदेशक बना…. फौज का निदेशक बना ..
ग्रंथो में भी संकल्प बल की बहोत महिमा गाई है…
लेकिन इस से भी ठोस है, जहाँ से संकल्प उठता है वो….. संकल्प बल से भी ज्यादा ठोस है वो “चिद-घन”!…..भगवान को “घन” कहा है …पथ्थर को तोड़नेवाला लोहा…लोहे को तपानेवाला अग्नि ..अग्नि में शीतलता देनेवाला जल ..और जल के मेघों को वायु उड़ा के ले जाएगा.. और वायु की गति को भी घुमा देगा ऐसा है मनुष्य का संकल्प बल…तो संकल्प बल सब से शक्तिशाली है…..
मैं इस बात को आगे ले चलता…..सब से ज्यादा ठोस है वो “चिद-घन विभु” ….संकल्प जहाँ से उठता है ..
वो आत्मा परमात्मा है “घन… चैत्यन्य..!”
संकल्प बल से महा निदेशक की कुर्सी मिली…कुर्सी चली गई… फिर भी जो नही गया….कुर्सी पे बैठनेवाला शरीर मर गया, फिर भी जो मरा नही वो है आत्मा ..!
महा शक्तिशाली!….
महा शाश्वत तत्व है !!
और उस आत्मा में प्रीति हो जाए, विश्रांति हो जाए…उस को “मैं” के रूप में स्वीकार कर लिया जाए ….
..अभी तो शरीर को “मैं”मानते…. वो तो छुट जाएगा …..शरीर मर जाएगा तो मरने के बाद भी नही मिटता वो कितना ठोस है!!
…. हजारो जनम से शरीर मिले..मिल मिल के मिट गए…. लेकिन आप का आत्मा कभी नही मिटा….
.. ‘ “मैं” हूँ की नही?’ ऐसा सवाल कभी नही उठता…. भगवान है की नही ये सवाल उठ सकता है …
“मैं” हूँ की नही ये सवाल नही उठेगा ..सब से ज्यादा जीवात्मा का वास्तविक “मैं” ठोस है…. जहाँ से संकल्प उठता है… संकल्प तो हो हो के मिट जाते….संकल्पों को सफलता विफलता मिल कर चली जाती…. फिर भी नही जाता इसी को उपनिषद बोलते

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,

पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।
ॐ शांति: शांति: शांतिः

..वो अपने आप में पूर्ण है…. परमात्मा की तरह जीवात्मा.भी पूर्ण है ..पूर्ण से ही उत्पत्ति होती है |





ref : an whatsapp collection

Saturday, 24 October 2015

मानवहित सर्वोपरि - महर्षि दधिची



  लोक कल्याण के लिये आत्मत्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है।इनकी माता का नाम शान्ति तथा पिता का नाम अथर्वा ऋषि था।ये तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। अटूट शिवभक्ति और वैराग्य में इनकी जन्म से ही निष्ठा थी।

 एक बार महर्षि दधीचि बड़ी ही कठोर तपस्या कर रहे थे। इनकी अपूर्व तपस्या के तेज से तीनों लोक आलोकित हो गये और इन्द्र का सिंहासन हिलने लगा। इन्द्र को लगा कि ये अपनी कठोर तपस्या के द्वारा इन्द्र पद छीनना चाहते हैं। इसलिये उन्होंने महर्षि की तपस्या को खण्डित करने के उद्देश्य से परम रूपवती अलम्बुषा अप्सरा के साथ कामदेव को भेजा। अलम्बुषा और कामदेव के अथक प्रयत्न के बाद भी महर्षि अविचल रहे और अन्त में विफल मनोरथ होकर दोनों इन्द्र के पास लौट गये। कामदेव और अप्सरा के निराश होकर लौटने के बाद इन्द्र ने महर्षि की हत्या करने का निश्चय किया और देवसेना को लेकर महर्षि दधीचि के आश्रम पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर देवताओं ने शान्त और समाधिस्थ महर्षि पर अपने कठोर-अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करना शुरू कर दिया। देवताओं के द्वारा चलाये गये अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तपस्या के अभेद्य दुर्ग को न भेद सके और महर्षि अविचल समाधिस्थ बैठे रहे। इन्द्र के अस्त्र-शस्त्र भी उनके सामने व्यर्थ हो गये। हारकर देवराज स्वर्ग लौट आये।

 एक बार देवराज इन्द्र अपनी सभा में बैठे थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पति आये। अहंकारवश इन्द्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर अन्यत्र चले गये। देवताओं को विश्वरूप को अपना पुरोहित बनाकर काम चलाना पड़ा, किन्तु विश्वरूप कभी-कभी देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे दिया करता था। इन्द्र ने उस पर कुपित होकर उसका सिर काट लिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था उन्होंने क्रोधित होकर इन्द्र को मारने के उद्देश्य से महाबली वृत्रासुर को उत्पन्न किया। वृत्रासुर के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ मारे-मारे फिरने लगे।

 ब्रह्मा जी की सलाह से देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियाँ माँगने के लिये गये। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए कहा- ‘प्रभो! त्रैलोक्य की मंगल-कामना हेतु आप अपनी हड्डियाँ हमें दान दे दीजिये।’ महर्षि दधीचि ने कहा- ‘देवराज! यद्यपि अपना शरीर सबको प्रिय होता है, किन्तु लोकहित के लिये मैं तुम्हें अपना शरीर प्रदान करता हूँ।’ महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र का निर्माण हुआ और वृत्रासुर मारा गया। इस प्रकार एक महान परोपकारी ऋषि के अपूर्व त्याग से देवराज इन्द्र बच गये और तीनों लोक सुखी हो गये। अपने अपकारी शत्रु के भी हित के लिये सर्वस्व त्याग करने वाले महर्षि दधीचि-जैसा उदाहरण संसार में अन्यत्र मिलना कठिन है।
      🌞 

Wednesday, 11 March 2015

Vinoba Bhave:Maa ki Bhagbat drusti # आचार्य विनोबा भावे : माँ की भगवत दॄष्टि





 


                             आचार्य विनोबा भावे




विनोबा भावे किसी साधारण माँ के बालक नहीं थे। उनकी माँ यज्ञ करना जानती थी और केवल अग्नि में आहुतिवाला यज्ञ नहीं वरन् गरीब-गुरबे को भोजन कराने का यज्ञ करना जानती थी।  विनोबा भावे के पिता नरहरि भावे शिक्षक थे। उन्हें नपा तुला वेतन मिलता था फिर भी सोचते थे कि जीवन में कुछ-न-कुछ सत्कर्म होना चाहिए। किसी गरीब सदाचारी विद्यार्थी को ले आते और अपने घर में रखते। माता रखुनाई अपने बेटों को भी भोजन कराती और उस अनाथ बालक को भी भोजन कराती किंतु खिलाने में पक्षपात करती। एक दिन बालक विनोबा ने माँ से कहाः

''माँ ! तुम कहती हो कि सबमें भगवान है, किसी से पक्षपात नहीं करना चाहिए। परंतु तुम खुद ही पक्षपात क्यों करती हो? जब बासी रोटी बचती है तो उसे गर्म करके तुम मुझे खिलाती हो, खुद खाती हो किंतु उस अनाथ विद्यार्थी के लिए गर्म-गर्म रोटी बनाती हो। ऐसा पक्षपात क्यों, माँ?"

वह बोलीः "मेरे लाल ! मुझे तू अपना बेटा लगता है परंतु वह बालक अतिथिदेव है, भगवान का स्वरूप है। उसमें मुझे भगवान दिखते हैं। जिस दिन तुझमें भी मुझे भगवान दिखेंगे उस दिन तुझे भी ताजी-ताजी रोटी खिलाऊँगी।"

भारत की उस देवी ने क्या गजब का उत्तर दिया है ! यह धर्म, संस्कृति नहीं तो और क्या है? वास्तव में यही धर्म है और यही यज्ञ है। अग्नि में घी की आहुतियाँ ही केवल यज्ञ है और दीन-दुःखी-गरीब को मदद करना, उनके आँसू पोंछना भी यज्ञ है और दीन-दुःखियों की सेवा ही वास्तव में परमात्मा की सेवा है, यह युग के अनुरूप यज्ञ है। यह इस युग की माँग है।