Wednesday, 13 July 2016

SANDIPAN KI GURU BHAKTI - संदीपन की गुरु भक्ति


संदीपन की गुरु भक्ति







पुराणों में एक कथा आती है कि प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहाः “हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो ?”
शिष्य पहले तो कहा करते थेः ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाय मेरे प्रभु !ʹ अब सब चुप हो गये। उनमें संदीपन नाम का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त था। उसने कहाः “गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।”
गुरुदेवः “इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।”
संदीपनः “इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।”
वेदधर्म मुनि एवं संदीपन काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपन के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ, करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता। गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते किंतु संदीपन की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपन के समक्ष प्रकट हो गये और बोलेः “तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।”
संदीपन गुरु से आज्ञा लेने गया और बोलाः “शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।”
गुरु ने डाँटाः “वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।”
संदीपन ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपन के पास वरदान देने प्रकटे।
संदीपन ने कहाः “प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।” भगवान ने आग्रह किया तो बोलाः “आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे।” भगवान विष्णु ने संदीपन को गले लगा लिया।
संदीपन ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन ! शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपन को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः “वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा ! जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे, सुनायेंगे, वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।”
गुरु के संतोष से संदीपन गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया। अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो, उऩ महापुरुषों का नाम सदगुरु है।
सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाये।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।

आगे चलकर जब भगवन ने कृष्णा अवतार लिया तो संदीपन मुनि को गुरु के रूप में धारण कर उनकी चरण सेवा की और ज्ञान प्राप्त किया ||


* * * * *





Sunday, 25 October 2015

ब्रह्मचर्य

     ब्रह्मचर्य सभी अवस्थाओं में विद्यार्थी, गृहस्थी, साधु-संन्यासी, सभी के लिए अत्यंत आवश्यक है।

जब स्वामी विवेकानंद जी विदेश में थे, तब ब्रह्मचर्य की चर्चा छिड़ने पर उन्होंने कहाः "कुछ दिन पहले एक भारतीय युवक मुझसे मिलने आया था। वह करीब दो वर्ष से अमेरिका में ही रहता है। वह युवक संयम का पालन बड़ी दृढ़तापूर्वक करता है। एक बार वह बीमार हो गया तो उसने डॉक्टर को बताया। तुम जानते हो कि डॉक्टर ने उस युवक को क्या सलाह दी ? कहाः ʹब्रह्मचर्य प्रकृति के नियम के विरूद्ध है। अतः ब्रह्मचर्य का पालन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं है।ʹ

उस युवक को बचपन से ही ब्रह्मचर्य-पालन के संस्कार मिले थे। डॉक्टर की ऐसी सलाह से वह उलझन में पड़ गया। उसने मुझे सारी बातें बतायीं। मैंने उसे समझायाः "तुम जिस देश के वासी हो वह भारत आज भी अध्यात्म के क्षेत्र में विश्वगुरु के पद पर आसीन है। अपने देश के ऋषि मुनियों के उपदेश पर तुम्हें ज्यादा विश्वास है कि ब्रह्मचर्य को जरा भी न समझने वाले पाश्चात्य जगत के असंयमी डॉक्टर पर? ब्रह्मचर्य को प्रकृति के नियम विरूद्ध कहने वालों को ʹब्रह्मचर्यʹ शब्द के अर्थ का भी पता नहीं है। ब्रह्मचर्य के विषय में ऐसे गलत ख्याल रखने वालों से एक ही प्रश्न है कि आपमें और पशुओं में क्या अन्तर है ?"

सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। चाहे बड़ा वैज्ञानिक हो या दार्शनिक, विद्वान हो या बड़ा उपदेशक, सभी को संयम की जरूरत है। स्वस्थ रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है, सुखी रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है और सम्मानित रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है। हे भारत के युवक व युवतियों ! यदि जीवन में संयम, सदाचार को अपना लो तो तुम भी महान-से-महान कार्य करने में सफल हो सकते हो।

Saturday, 24 October 2015

मानवहित सर्वोपरि - महर्षि दधिची



  लोक कल्याण के लिये आत्मत्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है।इनकी माता का नाम शान्ति तथा पिता का नाम अथर्वा ऋषि था।ये तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। अटूट शिवभक्ति और वैराग्य में इनकी जन्म से ही निष्ठा थी।

 एक बार महर्षि दधीचि बड़ी ही कठोर तपस्या कर रहे थे। इनकी अपूर्व तपस्या के तेज से तीनों लोक आलोकित हो गये और इन्द्र का सिंहासन हिलने लगा। इन्द्र को लगा कि ये अपनी कठोर तपस्या के द्वारा इन्द्र पद छीनना चाहते हैं। इसलिये उन्होंने महर्षि की तपस्या को खण्डित करने के उद्देश्य से परम रूपवती अलम्बुषा अप्सरा के साथ कामदेव को भेजा। अलम्बुषा और कामदेव के अथक प्रयत्न के बाद भी महर्षि अविचल रहे और अन्त में विफल मनोरथ होकर दोनों इन्द्र के पास लौट गये। कामदेव और अप्सरा के निराश होकर लौटने के बाद इन्द्र ने महर्षि की हत्या करने का निश्चय किया और देवसेना को लेकर महर्षि दधीचि के आश्रम पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर देवताओं ने शान्त और समाधिस्थ महर्षि पर अपने कठोर-अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करना शुरू कर दिया। देवताओं के द्वारा चलाये गये अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तपस्या के अभेद्य दुर्ग को न भेद सके और महर्षि अविचल समाधिस्थ बैठे रहे। इन्द्र के अस्त्र-शस्त्र भी उनके सामने व्यर्थ हो गये। हारकर देवराज स्वर्ग लौट आये।

 एक बार देवराज इन्द्र अपनी सभा में बैठे थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पति आये। अहंकारवश इन्द्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर अन्यत्र चले गये। देवताओं को विश्वरूप को अपना पुरोहित बनाकर काम चलाना पड़ा, किन्तु विश्वरूप कभी-कभी देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे दिया करता था। इन्द्र ने उस पर कुपित होकर उसका सिर काट लिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था उन्होंने क्रोधित होकर इन्द्र को मारने के उद्देश्य से महाबली वृत्रासुर को उत्पन्न किया। वृत्रासुर के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ मारे-मारे फिरने लगे।

 ब्रह्मा जी की सलाह से देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियाँ माँगने के लिये गये। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए कहा- ‘प्रभो! त्रैलोक्य की मंगल-कामना हेतु आप अपनी हड्डियाँ हमें दान दे दीजिये।’ महर्षि दधीचि ने कहा- ‘देवराज! यद्यपि अपना शरीर सबको प्रिय होता है, किन्तु लोकहित के लिये मैं तुम्हें अपना शरीर प्रदान करता हूँ।’ महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र का निर्माण हुआ और वृत्रासुर मारा गया। इस प्रकार एक महान परोपकारी ऋषि के अपूर्व त्याग से देवराज इन्द्र बच गये और तीनों लोक सुखी हो गये। अपने अपकारी शत्रु के भी हित के लिये सर्वस्व त्याग करने वाले महर्षि दधीचि-जैसा उदाहरण संसार में अन्यत्र मिलना कठिन है।
      🌞 

कहानी बच्चा और पेड़ की


एक बार की बात है एक जंगल में सेब का एक बड़ा
पेड़ था । एक बच्चा रोज उस पेड़ पर खेलने आया
करता था । वह कभी पेड़ की डाली से लटकता कभी
फल तोड़ता कभी उछल कूद करता था, सेब का पेड़
भी उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता था । कई साल इस
तरह बीत गये । अचानक एक दिन बच्चा कहीं चला
गया और फिर लौट के नहीं आया, पेड़ ने उसका
काफ़ी इंतज़ार किया पर वह नहीं आया । अब तो पेड़
उदास हो गया ।

काफ़ी साल बाद वह बच्चा फिर से पेड़ के पास आया
पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था । पेड़ उसे देखकर
काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए
कहा ।

पर बच्चा उदास होते हुए बोला कि अब वह बड़ा हो
गया है अब वह उसके साथ नहीं खेल सकता । बच्चा
बोला की अब मुझे खिलोने से खेलना अच्छा लगता है
पर मेरे पास खिलोने खरीदने के लिए पैसे नहीं है । पेड़
बोला उदास ना हो तुम मेरे फल तोड़ लो और उन्हें बेच
कर खिलोने खरीद लो । बच्चा खुशी खुशी फल तोड़ के
ले गया लेकिन वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं
आया| पेड़ बहुत दुखी हुआ ।

अचानक बहुत दिनों बाद बच्चा जो अब जवान हो गया
था वापस आया, पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने
साथ खेलने के लिए कहा पर लड़के ने कहा कि वह पेड़
के साथ नहीं खेल सकता अब मुझे कुछ पैसे चाहिए
क्यूंकी मुझे अपने बच्चों के लिए घर बनाना है ।
पेड़ बोला मेरी शाखाएँ बहुत मजबूत हैं तुम इन्हें काट
कर ले जाओ और अपना घर बना लो । अब लड़के ने
खुशी खुशी सारी शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला
गया । वह फिर वापस नहीं आया ।

बहुत दिनों बात जब वह वापिस आया तो बूढ़ा हो चुका
था पेड़ बोला मेरे साथ खेलो पर वह बोला की अब में
बूढ़ा हो गया हूँ अब नहीं खेल सकता । पेड़ उदास होते
हुए बोला की अब मेरे पास ना फल हैं और ना ही लकड़ी
अब में तुम्हारी मदद भी नहीं कर सकता । बूढ़ा बोला की
अब उसे कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक जगह चाहिए
जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम से गुजर सके । पेड़ ने उसे
अपने जड़ मे पनाह दी और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा ।

मित्रों इसी पेड़ की तरह हमारे माता पिता भी होते हैं,
जब हम छोटे होते हैं तो उनके साथ खेलकर बड़े होते
हैं और बड़े होकर उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं और
तभी वापस आते हैं जब हमें कोई ज़रूरत होती है ।
धीरे धीरे ऐसे ही जीवन बीत जाता है । हमें पेड़ रूपी
माता पिता की सेवा करनी चाहिए ना की सिर्फ़ उनसे

फ़ायदा लेना चाहिए..

Wednesday, 11 March 2015

Vinoba Bhave:Maa ki Bhagbat drusti # आचार्य विनोबा भावे : माँ की भगवत दॄष्टि





 


                             आचार्य विनोबा भावे




विनोबा भावे किसी साधारण माँ के बालक नहीं थे। उनकी माँ यज्ञ करना जानती थी और केवल अग्नि में आहुतिवाला यज्ञ नहीं वरन् गरीब-गुरबे को भोजन कराने का यज्ञ करना जानती थी।  विनोबा भावे के पिता नरहरि भावे शिक्षक थे। उन्हें नपा तुला वेतन मिलता था फिर भी सोचते थे कि जीवन में कुछ-न-कुछ सत्कर्म होना चाहिए। किसी गरीब सदाचारी विद्यार्थी को ले आते और अपने घर में रखते। माता रखुनाई अपने बेटों को भी भोजन कराती और उस अनाथ बालक को भी भोजन कराती किंतु खिलाने में पक्षपात करती। एक दिन बालक विनोबा ने माँ से कहाः

''माँ ! तुम कहती हो कि सबमें भगवान है, किसी से पक्षपात नहीं करना चाहिए। परंतु तुम खुद ही पक्षपात क्यों करती हो? जब बासी रोटी बचती है तो उसे गर्म करके तुम मुझे खिलाती हो, खुद खाती हो किंतु उस अनाथ विद्यार्थी के लिए गर्म-गर्म रोटी बनाती हो। ऐसा पक्षपात क्यों, माँ?"

वह बोलीः "मेरे लाल ! मुझे तू अपना बेटा लगता है परंतु वह बालक अतिथिदेव है, भगवान का स्वरूप है। उसमें मुझे भगवान दिखते हैं। जिस दिन तुझमें भी मुझे भगवान दिखेंगे उस दिन तुझे भी ताजी-ताजी रोटी खिलाऊँगी।"

भारत की उस देवी ने क्या गजब का उत्तर दिया है ! यह धर्म, संस्कृति नहीं तो और क्या है? वास्तव में यही धर्म है और यही यज्ञ है। अग्नि में घी की आहुतियाँ ही केवल यज्ञ है और दीन-दुःखी-गरीब को मदद करना, उनके आँसू पोंछना भी यज्ञ है और दीन-दुःखियों की सेवा ही वास्तव में परमात्मा की सेवा है, यह युग के अनुरूप यज्ञ है। यह इस युग की माँग है।






Monday, 9 March 2015

kabir ji ki gurunistha # कबीर जी की गुरुनिष्ठा


      एक समय काशी में रामानंद स्वामी बड़े उच्च कोटि के महापुरुष माने जाते थे। कबीर जी उनके आश्रम के मुख्य द्वार पर आकर द्वारपाल से विनती कीः "मुझे गुरुजी के दर्शन करा दो।"
उस समय जात-पाँत का बड़ा बोलबाला था। और फिर काशी ! पंडितों और पंडे लोगों का अधिक प्रभाव था। कबीरजी किसके घर पैदा हुए थे – हिंदू के या मुसलिम के? कुछ पता नहीं था। एक जुलाहे को तालाब के किनारे मिले थे। उसने कबीर जी का पालन-पोषण करके उन्हें बड़ा किया था। जुलाहे के घर बड़े हुए तो जुलाहे का धंधा करने लगे। लोग मानते थे कि वे मुसलमान की संतान हैं।
द्वारपालों ने कबीरजी को आश्रम में नहीं जाने दिया। कबीर जी ने सोचा कि 'अगर पहुँचे हुए महात्मा से गुरुमंत्र नहीं मिला तो मनमानी साधना से 'हरिदास' बन सकते हैं 'हरिमय' नहीं बन सकते। कैसे भी करके रामानंद जी महाराज से ही मंत्रदीक्षा लेनी है।'
कबीरजी ने देखा कि हररोज सुबह 3-4 बजे स्वामी रामानंदजी खड़ाऊँ पहन कर टप...टप आवाज करते हुए गंगा में स्नान करने जाते हैं। कबीर जी ने गंगा के घाट पर उनके जाने के रास्ते में सब जगह बाड़ कर दी और एक ही मार्ग रखा। उस मार्ग में सुबह के अँधेरे में कबीर जी सो गये। गुरु महाराज आये तो अँधेरे के कारण कबीरजी पर पैर पड़ गया। उनके मुख से उदगार निकल पड़ेः 'राम..... राम...!'
कबीरजी का तो काम बन गया। गुरुजी के दर्शन भी हो गये, उनकी पादुकाओं का स्पर्श तथा मुख से 'राम' मंत्र भी मिल गया। अब दीक्षा में बाकी ही क्या रहा? कबीर जी नाचते, गुनगुनाते घर वापस आये। राम नाम की और गुरुदेव के नाम की रट लगा दी। अत्यंत स्नेहपूर्ण हृदय से गुरुमंत्र का जप करते, गुरुनाम का कीर्तन करते हुए साधना करने लगे। दिनोंदिन उनकी मस्ती बढ़ने लगी।
महापुरुष जहाँ पहुँचे हैं वहाँ की अनुभूति उनका भावपूर्ण हृदय से चिंतन करने वाले को भी होने लगती है।
काशी के पंडितों ने देखा कि यवन का पुत्र कबीर रामनाम जपता है, रामानंद के नाम का कीर्तन करता है। उस यवन को रामनाम की दीक्षा किसने दी? क्यों दी? मंत्र को भ्रष्ट कर दिया ! पंडितों ने कबीर जी से पूछाः "तुमको रामनाम की दीक्षा किसने दी?"  
"स्वामी रामानंदजी महाराज के श्रीमुख से मिली।"
"कहाँ दी?"
"गंगा के घाट पर।"
पंडित पहुँचे रामानंदजी के पासः "आपने यवन को राममंत्र की दीक्षा देकर मंत्र को भ्रष्ट कर दिया, सम्प्रदाय को भ्रष्ट कर दिया। गुरु महाराज ! यह आपने क्या किया?"
गुरु महाराज ने कहाः "मैंने तो किसी को दीक्षा नहीं दी।"
"वह यवन जुलाहा तो रामानंद..... रामानंद..... मेरे गुरुदेव रामानंद...' की रट लगाकर नाचता है, आपका नाम बदनाम करता है।"
"भाई ! मैंने तो उसको कुछ नहीं कहा। उसको बुला कर पूछा जाय। पता चल जायगा।"
काशी के पंडित इकट्ठे हो गये। जुलाहा सच्चा कि रामानंदजी सच्चे – यह देखने के लिए भीड़ हो गयी। कबीर जी को बुलाया गया। गुरु महाराज मंच पर विराजमान हैं। सामने विद्वान पंडितों की सभा है।
रामानंदजी ने कबीर से पूछाः "मैंने तुम्हें कब दीक्षा दी? मैं कब तेरा गुरु बना?"
कबीरजी बोलेः महाराज ! उस दिन प्रभात को आपने मुझे पादुका-स्पर्श कराया और राममंत्र भी दिया, वहाँ गंगा के घाट पर।"
रामानंद स्वामी ने कबीरजी के सिर पर धीरे-से खड़ाऊँ मारते हुए कहाः "राम... राम.. राम.... मुझे झूठा बनाता है? गंगा के घाट पर मैंने तुझे कब दीक्षा दी थी ?
कबीरजी बोल उठेः "गुरु महाराज ! तब की दीक्षा झूठी तो अब की तो सच्ची....! मुख से राम नाम का मंत्र भी मिल गया और सिर पर आपकी पावन पादुका का स्पर्श भी हो गया।"
स्वामी रामानंदजी उच्च कोटि के संत महात्मा थे। उन्होंने पंडितों से कहाः "चलो, यवन हो या कुछ भी हो, मेरा पहले नंबर का शिष्य यही है।"
ब्रह्मनिष्ठ सत्पुरुषों की विद्या हो या दीक्षा, प्रसाद खाकर मिले तो भी बेड़ा पार करती है और मार खाकर मिले तो भी बेड़ा पार कर देती है।
इस प्रकार कबीर जी ने गुरुनाम कीर्तन से अपनी सुषुप्त शक्तियाँ जगायीं और शीघ्र आत्मकल्याण कर लिया।




Tansen - 'तानसेन'


  





मकरन्द पांडे के घर किसी संत की दुआ से एक बालक का जन्म हुआ। 13-14 वर्ष की उम्र में वह बालक ग्वालियर के पास किसी गाँव में आम के एक बगीचे की रखवाली करने के लिए गया। उसका नाम तन्ना था। वह कुछ पशुओं की आवाज निकालना जानता था।
हरिदास महाराज अपने भक्तों को लेकर हरिद्वार से लौट रहे थे। वे उसी बगीचे में आराम करने के लिए रुके। इतने में अचानक शेर की गर्जना सुनाई दी। शेर की गर्जना सुनकर सारे यात्री भाग खड़े हुए। हरिदास महाराज ने सोचा कि'गाँव के बगीचे में शेर कहाँ से आ सकता है?' इधर-उधर झौंककर देखा तो एक लड़का छुपकर हँस रहा था। महाराज ने पूछाः "शेर की आवाज तूने की न?"
तन्ना ने कहाः "हाँ।" महाराज के कहने पर उसने दूसरे जानवरों की भी आवाज निकालकर दिखायी। हरिदास महाराज ने उसके पिता को बुलाकर कहाः "इस बेटे को मेरे साथ भेज दो।"
पिता ने सम्मति दे दी। हरिदास महाराज ने शेर, भालू या घोड़े-गधे की आवाजें जहाँ से पैदा होती हैं उधर (आत्मस्वरूप) की ओर ले जाने वाला गुरुमंत्र दे दिया और थोड़ी संगीत-साधना करवायी। तन्ना साल में 10-15 दिन अपने गाँव आता और शेष समय वृंदावन में हरिदासजी महाराज के पास रहता। बड़ा होने पर उसकी शादी हुई।
एक बार ग्वालियर में अकाल पड़ गया। उस समय के राजा रामचंद्र ने सेठों को बुलाकर कहाः "गरीबों के आँसू पोंछने के लिए चंदा इकट्ठा करना है।"
किसी ने कुछ दिया, किसी ने कुछ... हरिदास के शिष्य तन्ना ने अपनी पत्नी के जेवर देते हुए कहाः "राजा साहब ! गरीबों की सेवा में इतना ही दे सकता हूँ।"
राजा उसकी प्रतिभा को जानता था। राजा ने कहाः "तुम साधारण आदमी नहीं हो, तुम्हारे पास गुरुदेव का दिया हुआ मंत्र हैं और तुम गुरु के आश्रम में रह चुके हो। तुम्हारे गुरु समर्थ हैं। तुमने गुरुआज्ञा का पालन किया है। तुम्हारे पास गुरुकृपारूपी धन है। हम तुमसे ये गहने-गाँठेरूपी धन नहीं लेंगे बल्कि गुरुकृपा का धन चाहेंगे।"
"महाराज ! मैं समझा नहीं।"
"तुम अगर गुरु के साथ तादात्म्य करके मेघ राग गाओगे तो यह अकाल सुकाल में बदल सकता है। सूखा हरियाली में बदल सकता है। भूख तृप्ति में बदल सकती है और मौतें जीवन में बदल सकती हैं। श्रद्धा और विश्वास से गुरुमंत्र जपने वाले की कविताओं में भी बल आ जाता है। तुम केवल सहमति दे दो और कोई दिन निश्चित कर लो। उस दिन हमसब इस राजदरबार में ईश्वर को प्रार्थना करते हुए बैठेंगे और तुम मेघ राग गाना।"
राग-रगिनियों में बड़ी ताकत होती है। जब झूठे शब्द भी कलह और झगड़े पैदा कर सक देते हैं तो सच्चे शब्द, ईश्वरीय यकीन क्या नहीं कर सकता? तारीख तय हो गयी। राज्य में ढिंढोरा पीट दिया गया।
उन दिनों दिल्ली के बादशाह अकबर का सिपहसालार ग्वालियर आया हुआ था। ढिंढोरा सुनकर उसने दिल्ली जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। उसने सोचा कि 'तन्ना के मेघ राग गाने से क्या सचमुच बरसात हो सकती है? यह मुझे अपनी आँखों से देखना है।'
कार्यक्रम की तैयारी हुई। तन्ना थोड़ा जप-ध्यान करके आया था। उसका हाथ वीणा की तारों पर घूमने लगा। सबने अपने दिल के यकीन की तारों पर भी श्रद्धा के सुमन चढ़ायेः
'हे सर्वसमर्थ, करूणा-वरूणा के धनी, मेघों के मालिक वरूण देव, आत्मदेव, कर्ता-भोक्ता महेश्वर परमेश्वर ! तेरी करूणा-कृपा इन भूखे जानवरों पर और गलतियों के घर – इन्सानों पर बरसे...
हम अपने कर्मों को तोलें तो दिल धड़कता है। किंतु तेरी करूणा पर, तेरी कृपा पर हमें विश्वास है। हम अपने कर्मों के बल से नहीं किंतु तेरी करूणा के भरोसे, तेरे औदार्य के भरोसे तुझसे प्रार्थना करते हैं.....
हे गोबिन्द !  हे गोपाल ! हे वरूण देव ! इस मेघ राग से प्रसन्न होकर तू अपने मेघों को आज्ञा कर सकता है और अभी-अभी तेरे मेघ इस इलाके की अनावृष्टि को सुवृष्टि में बदल सकते हैं।
इधर तन्ना ने मेघ बरसाने के लिए मेघ राग गाना शुरु किया और देखते-ही-देखते आकाश में बादल मँडराने लगे.... ग्वालियर की राजधानी और राजदरबार मेघों की घटाओं से आच्छादित होने लगा। राग पूरा हो उसके पूर्व ही सृष्टिकर्ता ने पूरी कृपा बरसायी और जोरदार बरसात होने लगी !
अकबर का सिपहसालार देखकर दंग रहा गया कि कवि के गान में इतनी क्षमता कि बरसात ला दे। सिपहसालार ने दिल्ली जाकर अकबर को यह घटना सुनायी। अकबर ने ग्वालियर नरेश को समझा-बुझाकर तन्ना को माँग लिया। अब तन्ना 'कवि तन्ना' नहीं रहे बल्कि अकबर के नवरत्नों में एक रत्न 'तानसेन' के नाम से सम्मानित हुए।