Wednesday, 13 July 2016

MEERA BAI KI GURU BHAKTI - मीराबाई की गुरुभक्ति


मीराबाई की गुरुभक्ति

एक बार संत रैदास जी चितौड़ पधारे थे। रैदासजी रघु चमार के यहाँ जन्में थे। उनकी छोटी जाति थी और उस समय जात-पाँत का बड़ा बोल बाला था। वे नगर से दूर चमारों की बस्ती में रहते थे। राजरानी मीरा को पता चला कि संत रैदासजी महाराज पधारे हैं लेकिन राजरानी के वेश में वहाँ कैसे जायें? मीरा एक मोची महिला का वेश बनाकर चुपचाप रैदासजी के पास चली जाती, उनका सत्संग सुनती, उनके कीर्तन और ध्यान में मग्न हो जाती।
ऐसा करते-करते मीरा का सत्त्वगुण दृढ़ हुआ। मीरा ने सोचाः ‘ईश्वर के रास्ते जायें और चोरी छिपे जायें? आखिर कब तक?’ फिर मीरा अपने ही वेश में उन चमारों की बस्ती में जाने लगी।
मीरा को उन चमारों की बस्ती में जाते देखकर अड़ोस-पड़ोस में कानाफूसी होने लगी। पूरे मेवाड़ में कुहराम मच गया कि ‘ऊँची जाति की, ऊँचे कुल की, राजघराने की मीरा नीची जाति के चमारों की बस्ती में जाकर साधुओं के यहाँ बैठती है, मीरा ऐसी है…. वैसी है…..’ ननद उदा ने उसे बहुत समझायाः
“भाभी ! लोग क्या बोलेंगे? तुम राजकुल की रानी और गंदी बस्ती में, चमारों की बस्ती में जाती हो? चमड़े का काम करनेवाले चमार जाति के एक व्यक्ति को गुरु मानती हो? उसको मत्था टेकती हो? उसके हाथ से प्रसाद लेती हो? उसको एकटक देखते-देखते आँखें बंद करके न जाने क्या-क्या सोचती और करती हो? यह ठीक नहीं है। भाभी ! तुम सुधर जाओ।”
सासु नाराज, ससुर नाराज, देवर नाराज, ननद नाराज, कुटुंबीजन नाराज…. उदा ने कहाः
मीरा मान लीजियो म्हारी, तने सखियाँ बरजे सारी।
राणा बरजे, राणी बरजे, बरजे सपरिवारी।
साधन के संग बैठ, बैठ के लाज गँवायी सारी।।
‘मीरा ! अब तो मान जा। तुझे मैं समझा रही हूँ, सखियाँ समझा रही हैं, राणा भी कह रहा है, रानी भी कह रही है, सारा परिवार कह रहा है…. फिर भी तू क्यों नहीं समझती है? इन संतों के साथ बैठ-बैठकर तू कुल की सारी लाज गँवा रही है।’
नित प्रति उठ नीच घर जाय कुलको कलंक लगावे।
मीरा मान लीजियो म्हारी तने बरजे सखियाँ सारी।।
तब मीरा ने उत्तर दियाः
तारयो पियर सासरियो तारयो माह्म मौसाली सारी।
मीरा ने अब सदगुरु मिलिया चरणकमल बलिहारी।।
‘मैं संतों के पास गयी तो मैंने पीहर का कुल तारा, ससुराल का कुल तारा, मौसाल का और ननिहाल का कुल भी तारा है।’
मूर्ख लोग समझते हैं कि भजन करने से इज्जत चली जाती है वास्तव में ऐसा नहीं है।
राम नाम के शारणे सब यश दीन्हो खोय।
मूरख जाने घटि गयो दिन दिन दूनो होय।।

मीरा की कितनी बदनामी की गयी, मीरा के लिए कितने षड्यंत्र किये गये लेकिन मीरा अडिग रही तो मीरा का यश बढ़ता गया। आज भी लोग बड़े प्रेम से मीरा को याद करते हैं, उनके भजनों को गाकर अथवा सुनकर अपना हृदय पावन करते हैं।




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UPAMANYU KI GURU BHAKTI - उपमन्यु की गुरु भक्ति




उपमन्यु की गुरु भक्ति







महर्षि आयोद धौम्य अपनी विद्या, तपस्या और विचित्र उदारता के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। वे ऊपर से तो अपने शिष्यों से बहुत कठोरता करते प्रतीत होते हैं, किन्तु भीतर से शिष्यों पर उनका अपार स्नेह था। वे अपने शिष्यों को अत्यंत सुयोग्य बनाना चाहते थे।
इसलिए जो ज्ञान के सच्चे जिज्ञासु थे, वे महर्षि के पास बड़ी श्रद्धा से रहते थे। महर्षि के शिष्यों में एक बालक का नाम था उपमन्यु। गुरुदेव ने उपमन्यु को अपनी गाएं चराने का काम दे रखा था। वे दिनभर वन में गाएं चराते और सायँकाल आश्रम में लौट आया करते। एक दिन गुरुदेव ने पूछा- 'बेटा उपमन्यु! तुम आजकल भोजन क्या करते हो?'
उपमन्यु ने नम्रता से कहा- 'भगवन्‌! मैं भिक्षा माँगकर अपना काम चला लेता हूँ।' महर्षि बोले- 'वत्स! ब्रह्मचारी को इस प्रकार भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए। भिक्षा माँगकर जो कुछ मिले, उसे गुरु के सामने रख देना चाहिए। उसमें से गुरु यदि कुछ दें तो उसे ग्रहण करना चाहिए।'
उपमन्यु ने महर्षि की आज्ञा स्वीकार कर ली। अब वे भिक्षा माँगकर जो कुछ मिलता उसे गुरुदेव के सामने लाकर रख देते। गुरुदेव को तो शिष्य की श्रद्धा को दृढ़ करना था, अतः वे भिक्षा का सभी अन्न रख लेते। उसमें से कुछ भी उपमन्यु को नहीं देते।
थोड़े दिनों बाद जब गुरुदेव ने पूछा- 'उपमन्यु! तुम आजकल क्या खाते हो?' तब उपमन्यु ने बताया कि 'मैं एक बार की भिक्षा का अन्न गुरुदेव को देकर दुबारा अपनी भिक्षा माँग लाता हूँ।' महर्षि ने कहा- 'दुबारा भिक्षा माँगना तो धर्म के विरुद्ध है। इससे गृहस्थों पर अधिक भार पड़ेगा। और दूसरे भिक्षा माँगने वालों को भी संकोच होगा। अब तुम दूसरी बार भिक्षा माँगने मत जाया करो।'
उपमन्यु ने कहा- 'जो आज्ञा!' उसने दूसरी बार भिक्षा माँगना बंद कर दिया। जब कुछ दिनों बाद महर्षि ने फिर पूछा तब उपमन्यु ने बताया कि 'मैं गायों का दूध पी लेता हूँ।' महर्षि बोले- 'यह तो ठीक नहीं।' गाएं जिसकी होती हैं, उनका दूध भी उसी का होता है। मुझसे पूछे बिना गायों का दूध तुम्हें नहीं पीना चाहिए।'
उपमन्यु ने दूध पीना भी छोड़ दिया। थोड़े दिन बीतने पर गुरुदेव ने पूछा- 'उपमन्यु! तुम दुबारा भिक्षा भी नहीं लाते और गायों का दूध भी नहीं पीते तो खाते क्या हो? तुम्हारा शरीर तो उपवास करने वाले जैसा दुर्बल नहीं दिखाई पड़ता।' उपमन्यु ने कहा- 'भगवन्‌! मैं बछड़ों के मुख से जो फेन गिरता है, उसे पीकर अपना काम चला लेता हूँ।'
महर्षि बोले- 'बछड़े बहुत दयालु होते हैं। वे स्वयं भूखे रहकर तुम्हारे लिए अधिक फेन गिरा देते होंगे। तुम्हारी यह वृत्ति भी उचित नहीं है।' अब उपमन्यु उपवास करने लगे। दिनभर बिना कुछ खाए गायों को चराते हुए उन्हें वन में भटकना पड़ता था। अंत में जब भूख असह्य हो गई, तब उन्होंने आक के पत्ते खा लिए। उन विषैले पत्तों का विष शरीर में फैलने से वे अंधे हो गए। उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था।
गायों की पदचाप सुनकर ही वे उनके पीछे चल रहे थे। मार्ग में एक सूखा कुआँ था, जिसमें उपमन्यु गिर पड़े। जब अंधेरा होने पर सब गाएं लौट आईं और उपमन्यु नहीं लौटे, तब महर्षि को चिंता हुई। वे सोचने लगे- मैंने उस भोले बालक का भोजन सब प्रकार से बंद कर दिया। कष्ट पाते-पाते दुखी होकर वह भाग तो नहीं गया।' उसे वे जंगल में ढूँढने निकले और बार-बार पुकारने लगे- 'बेटा उपमन्यु! तुम कहाँ हो?'
उपमन्यु ने कुएँ में से उत्तर दिया- 'भगवन्‌! मैं कुएँ में गिर पड़ा हूँ।' महर्षि समीप आए और सब बातें सुनकर ऋग्वेद के मंत्रों से उन्होंने अश्विनीकुमारों की स्तुति करने की आज्ञा दी। स्वर के साथ श्रद्धापूर्वक जब उपमन्यु ने स्तुति की, तब देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार वहाँ कुएँ में प्रकट हो गए। उन्होंने उपमन्यु के नेत्र अच्छे करके उसे एक पदार्थ देकर खाने को कहा।
किन्तु उपमन्यु ने गुरुदेव को अर्पित किए बिना वह पदार्थ खाना स्वीकार नहीं किया। अश्विनी कुमारों ने कहा- 'तुम संकोच मत करो। तुम्हारे गुरु ने भी अपने गुरु को अर्पित किए बिना पहले हमारा दिया पदार्थ प्रसाद मानकर खा लिया था।'

उपमन्यु ने कहा- 'वे मेरे गुरु हैं, उन्होंने कुछ भी किया हो, पर मैं उनकी आज्ञा नहीं टालूँगा।' इस गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों ने उन्हें समस्त विद्याएँ बिना पढ़े आ जाने का आशीर्वाद दिया। जब उपमन्यु कुएँ से बाहर निकले, महर्षि आयोद धौम्य ने अपने प्रिय शिष्य को हृदय से लगा लिया।



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SANDIPAN KI GURU BHAKTI - संदीपन की गुरु भक्ति


संदीपन की गुरु भक्ति







पुराणों में एक कथा आती है कि प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहाः “हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो ?”
शिष्य पहले तो कहा करते थेः ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाय मेरे प्रभु !ʹ अब सब चुप हो गये। उनमें संदीपन नाम का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त था। उसने कहाः “गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।”
गुरुदेवः “इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।”
संदीपनः “इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।”
वेदधर्म मुनि एवं संदीपन काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपन के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ, करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता। गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते किंतु संदीपन की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपन के समक्ष प्रकट हो गये और बोलेः “तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।”
संदीपन गुरु से आज्ञा लेने गया और बोलाः “शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।”
गुरु ने डाँटाः “वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।”
संदीपन ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपन के पास वरदान देने प्रकटे।
संदीपन ने कहाः “प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।” भगवान ने आग्रह किया तो बोलाः “आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे।” भगवान विष्णु ने संदीपन को गले लगा लिया।
संदीपन ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन ! शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपन को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः “वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा ! जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे, सुनायेंगे, वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।”
गुरु के संतोष से संदीपन गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया। अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो, उऩ महापुरुषों का नाम सदगुरु है।
सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाये।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।

आगे चलकर जब भगवन ने कृष्णा अवतार लिया तो संदीपन मुनि को गुरु के रूप में धारण कर उनकी चरण सेवा की और ज्ञान प्राप्त किया ||


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Sunday, 25 October 2015

ब्रह्मचर्य

     ब्रह्मचर्य सभी अवस्थाओं में विद्यार्थी, गृहस्थी, साधु-संन्यासी, सभी के लिए अत्यंत आवश्यक है।

जब स्वामी विवेकानंद जी विदेश में थे, तब ब्रह्मचर्य की चर्चा छिड़ने पर उन्होंने कहाः "कुछ दिन पहले एक भारतीय युवक मुझसे मिलने आया था। वह करीब दो वर्ष से अमेरिका में ही रहता है। वह युवक संयम का पालन बड़ी दृढ़तापूर्वक करता है। एक बार वह बीमार हो गया तो उसने डॉक्टर को बताया। तुम जानते हो कि डॉक्टर ने उस युवक को क्या सलाह दी ? कहाः ʹब्रह्मचर्य प्रकृति के नियम के विरूद्ध है। अतः ब्रह्मचर्य का पालन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं है।ʹ

उस युवक को बचपन से ही ब्रह्मचर्य-पालन के संस्कार मिले थे। डॉक्टर की ऐसी सलाह से वह उलझन में पड़ गया। उसने मुझे सारी बातें बतायीं। मैंने उसे समझायाः "तुम जिस देश के वासी हो वह भारत आज भी अध्यात्म के क्षेत्र में विश्वगुरु के पद पर आसीन है। अपने देश के ऋषि मुनियों के उपदेश पर तुम्हें ज्यादा विश्वास है कि ब्रह्मचर्य को जरा भी न समझने वाले पाश्चात्य जगत के असंयमी डॉक्टर पर? ब्रह्मचर्य को प्रकृति के नियम विरूद्ध कहने वालों को ʹब्रह्मचर्यʹ शब्द के अर्थ का भी पता नहीं है। ब्रह्मचर्य के विषय में ऐसे गलत ख्याल रखने वालों से एक ही प्रश्न है कि आपमें और पशुओं में क्या अन्तर है ?"

सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। चाहे बड़ा वैज्ञानिक हो या दार्शनिक, विद्वान हो या बड़ा उपदेशक, सभी को संयम की जरूरत है। स्वस्थ रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है, सुखी रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है और सम्मानित रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है। हे भारत के युवक व युवतियों ! यदि जीवन में संयम, सदाचार को अपना लो तो तुम भी महान-से-महान कार्य करने में सफल हो सकते हो।

Saturday, 24 October 2015

मानवहित सर्वोपरि - महर्षि दधिची



  लोक कल्याण के लिये आत्मत्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है।इनकी माता का नाम शान्ति तथा पिता का नाम अथर्वा ऋषि था।ये तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। अटूट शिवभक्ति और वैराग्य में इनकी जन्म से ही निष्ठा थी।

 एक बार महर्षि दधीचि बड़ी ही कठोर तपस्या कर रहे थे। इनकी अपूर्व तपस्या के तेज से तीनों लोक आलोकित हो गये और इन्द्र का सिंहासन हिलने लगा। इन्द्र को लगा कि ये अपनी कठोर तपस्या के द्वारा इन्द्र पद छीनना चाहते हैं। इसलिये उन्होंने महर्षि की तपस्या को खण्डित करने के उद्देश्य से परम रूपवती अलम्बुषा अप्सरा के साथ कामदेव को भेजा। अलम्बुषा और कामदेव के अथक प्रयत्न के बाद भी महर्षि अविचल रहे और अन्त में विफल मनोरथ होकर दोनों इन्द्र के पास लौट गये। कामदेव और अप्सरा के निराश होकर लौटने के बाद इन्द्र ने महर्षि की हत्या करने का निश्चय किया और देवसेना को लेकर महर्षि दधीचि के आश्रम पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर देवताओं ने शान्त और समाधिस्थ महर्षि पर अपने कठोर-अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करना शुरू कर दिया। देवताओं के द्वारा चलाये गये अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तपस्या के अभेद्य दुर्ग को न भेद सके और महर्षि अविचल समाधिस्थ बैठे रहे। इन्द्र के अस्त्र-शस्त्र भी उनके सामने व्यर्थ हो गये। हारकर देवराज स्वर्ग लौट आये।

 एक बार देवराज इन्द्र अपनी सभा में बैठे थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पति आये। अहंकारवश इन्द्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर अन्यत्र चले गये। देवताओं को विश्वरूप को अपना पुरोहित बनाकर काम चलाना पड़ा, किन्तु विश्वरूप कभी-कभी देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे दिया करता था। इन्द्र ने उस पर कुपित होकर उसका सिर काट लिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था उन्होंने क्रोधित होकर इन्द्र को मारने के उद्देश्य से महाबली वृत्रासुर को उत्पन्न किया। वृत्रासुर के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ मारे-मारे फिरने लगे।

 ब्रह्मा जी की सलाह से देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियाँ माँगने के लिये गये। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए कहा- ‘प्रभो! त्रैलोक्य की मंगल-कामना हेतु आप अपनी हड्डियाँ हमें दान दे दीजिये।’ महर्षि दधीचि ने कहा- ‘देवराज! यद्यपि अपना शरीर सबको प्रिय होता है, किन्तु लोकहित के लिये मैं तुम्हें अपना शरीर प्रदान करता हूँ।’ महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र का निर्माण हुआ और वृत्रासुर मारा गया। इस प्रकार एक महान परोपकारी ऋषि के अपूर्व त्याग से देवराज इन्द्र बच गये और तीनों लोक सुखी हो गये। अपने अपकारी शत्रु के भी हित के लिये सर्वस्व त्याग करने वाले महर्षि दधीचि-जैसा उदाहरण संसार में अन्यत्र मिलना कठिन है।
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कहानी बच्चा और पेड़ की


एक बार की बात है एक जंगल में सेब का एक बड़ा
पेड़ था । एक बच्चा रोज उस पेड़ पर खेलने आया
करता था । वह कभी पेड़ की डाली से लटकता कभी
फल तोड़ता कभी उछल कूद करता था, सेब का पेड़
भी उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता था । कई साल इस
तरह बीत गये । अचानक एक दिन बच्चा कहीं चला
गया और फिर लौट के नहीं आया, पेड़ ने उसका
काफ़ी इंतज़ार किया पर वह नहीं आया । अब तो पेड़
उदास हो गया ।

काफ़ी साल बाद वह बच्चा फिर से पेड़ के पास आया
पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था । पेड़ उसे देखकर
काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए
कहा ।

पर बच्चा उदास होते हुए बोला कि अब वह बड़ा हो
गया है अब वह उसके साथ नहीं खेल सकता । बच्चा
बोला की अब मुझे खिलोने से खेलना अच्छा लगता है
पर मेरे पास खिलोने खरीदने के लिए पैसे नहीं है । पेड़
बोला उदास ना हो तुम मेरे फल तोड़ लो और उन्हें बेच
कर खिलोने खरीद लो । बच्चा खुशी खुशी फल तोड़ के
ले गया लेकिन वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं
आया| पेड़ बहुत दुखी हुआ ।

अचानक बहुत दिनों बाद बच्चा जो अब जवान हो गया
था वापस आया, पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने
साथ खेलने के लिए कहा पर लड़के ने कहा कि वह पेड़
के साथ नहीं खेल सकता अब मुझे कुछ पैसे चाहिए
क्यूंकी मुझे अपने बच्चों के लिए घर बनाना है ।
पेड़ बोला मेरी शाखाएँ बहुत मजबूत हैं तुम इन्हें काट
कर ले जाओ और अपना घर बना लो । अब लड़के ने
खुशी खुशी सारी शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला
गया । वह फिर वापस नहीं आया ।

बहुत दिनों बात जब वह वापिस आया तो बूढ़ा हो चुका
था पेड़ बोला मेरे साथ खेलो पर वह बोला की अब में
बूढ़ा हो गया हूँ अब नहीं खेल सकता । पेड़ उदास होते
हुए बोला की अब मेरे पास ना फल हैं और ना ही लकड़ी
अब में तुम्हारी मदद भी नहीं कर सकता । बूढ़ा बोला की
अब उसे कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक जगह चाहिए
जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम से गुजर सके । पेड़ ने उसे
अपने जड़ मे पनाह दी और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा ।

मित्रों इसी पेड़ की तरह हमारे माता पिता भी होते हैं,
जब हम छोटे होते हैं तो उनके साथ खेलकर बड़े होते
हैं और बड़े होकर उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं और
तभी वापस आते हैं जब हमें कोई ज़रूरत होती है ।
धीरे धीरे ऐसे ही जीवन बीत जाता है । हमें पेड़ रूपी
माता पिता की सेवा करनी चाहिए ना की सिर्फ़ उनसे

फ़ायदा लेना चाहिए..

Wednesday, 11 March 2015

Vinoba Bhave:Maa ki Bhagbat drusti # आचार्य विनोबा भावे : माँ की भगवत दॄष्टि





 


                             आचार्य विनोबा भावे




विनोबा भावे किसी साधारण माँ के बालक नहीं थे। उनकी माँ यज्ञ करना जानती थी और केवल अग्नि में आहुतिवाला यज्ञ नहीं वरन् गरीब-गुरबे को भोजन कराने का यज्ञ करना जानती थी।  विनोबा भावे के पिता नरहरि भावे शिक्षक थे। उन्हें नपा तुला वेतन मिलता था फिर भी सोचते थे कि जीवन में कुछ-न-कुछ सत्कर्म होना चाहिए। किसी गरीब सदाचारी विद्यार्थी को ले आते और अपने घर में रखते। माता रखुनाई अपने बेटों को भी भोजन कराती और उस अनाथ बालक को भी भोजन कराती किंतु खिलाने में पक्षपात करती। एक दिन बालक विनोबा ने माँ से कहाः

''माँ ! तुम कहती हो कि सबमें भगवान है, किसी से पक्षपात नहीं करना चाहिए। परंतु तुम खुद ही पक्षपात क्यों करती हो? जब बासी रोटी बचती है तो उसे गर्म करके तुम मुझे खिलाती हो, खुद खाती हो किंतु उस अनाथ विद्यार्थी के लिए गर्म-गर्म रोटी बनाती हो। ऐसा पक्षपात क्यों, माँ?"

वह बोलीः "मेरे लाल ! मुझे तू अपना बेटा लगता है परंतु वह बालक अतिथिदेव है, भगवान का स्वरूप है। उसमें मुझे भगवान दिखते हैं। जिस दिन तुझमें भी मुझे भगवान दिखेंगे उस दिन तुझे भी ताजी-ताजी रोटी खिलाऊँगी।"

भारत की उस देवी ने क्या गजब का उत्तर दिया है ! यह धर्म, संस्कृति नहीं तो और क्या है? वास्तव में यही धर्म है और यही यज्ञ है। अग्नि में घी की आहुतियाँ ही केवल यज्ञ है और दीन-दुःखी-गरीब को मदद करना, उनके आँसू पोंछना भी यज्ञ है और दीन-दुःखियों की सेवा ही वास्तव में परमात्मा की सेवा है, यह युग के अनुरूप यज्ञ है। यह इस युग की माँग है।