Tuesday, 22 August 2023

दुःख का कितना बड़ा उपकार

 



एक बड़ा प्रसिध्द राज नेता था बंगाल में ….बड़ा जाना-माना था..धर्म परायण व्यक्ति था..अश्विनी दत्त बंगाल के प्रसिध्द राज नेता थे..उन के गुरु राज नारायण थे.

उस के गुरु को लकवा मार गया..3 महीने के बाद अश्विनी को पता चला…3 महीने से गुरु को लकवा मार गया, मुझे पता नही चला सोच कर विव्हल हो कर भागता भागता आया गुरु के पास…ज्यो ही गुरु के पास पहुँचा..प्रणाम करने जाता है तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा  हो चुका था..गुरु ने दूसरे हाथ से पकड़ के उठाया..
बोले, ‘बेटा, कैसे भागे भागे आए हो…देखो भागा तो शरीर..और दुख हुआ मन में..लेकिन इन दोनो को तुम जानने वाले हो..ऐसा कर के गुरु ने सत्य स्वरूप ईश्वर आत्मा की सार बातें बताई..सुनते सुनते वो तो दुखी आया था, चिंतित हो के आया था…लेकिन गुरु की वाणी सुनते सुनते उस का दुख चिंता गायब हो गया..3 घंटे कैसे बीत  गये पता ही नही चला…
हसने लगा,”गुरु जी 3 घंटे बीत  गये!मुझे तो पता ही नही चला..मैं तो बहोत विव्हल  हो के आया था आप का स्वास्थ्य पुछने के लिए..लेकिन आप को ये लकवा मार गया इस की पीड़ा नही?..दुख नही? हम तो बहोत  दुखी थे और आप ने तो मेरे को 3 घंटे तक सत्संग का अमृतपान  कराया…”
गुरु ने अश्विनी दत्त(बंगाल के प्रसिध्द नेता) के पीठ पे थपथपाया..बोले, “पगले पीड़ा हुई है तो शरीर को..लकवा मारा है तो शरीर को..इस हाथ को..लेकिन दूसरा हाथ मौजूद है, पैर भी मौजूद है, जिव्हा भी मौजूद है..ये उस प्रभु की कितनी कृपा है!..पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था..हार्ट एटैक हो सकता था.और 60 साल तक शरीर स्वस्थ रहा..अभी थोड़े दिन..3 महीने से ही तो लकवा है …ये उस की कितनी कृपा है की दुख भेज कर वो हम को शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है..सुख भेज कर हमें उदार बनाने का और परोपकार करने का संदेश देता है..हम को तो दुख का आदर करना चाहिए..दुख का उपकार मानना चाहिए..बचपन में हम दुखी होते थे जब माँ-बाप ज़बरदस्ती स्कूल ले जाते थे..लेकिन वो दुख नही होता तो आज हम विद्वान भी नही हो सकते थे..ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नही है जिस का दुख के बिना विकास हुआ हो…दुख का तो खूब खूब धन्यवाद करना चाहिए…और दिखता दुख है, लेकिन अंदर से सुख, सावधानी और विवेक से भरा है.. और मुझे हरिचर्चा में विश्रान्ति दिलाया.. सत्संग करने के भागा दौड़ी से आराम करना चाहिए था, लेकिन मैं नही कर पा रहा था…तुम लोग नही करने देते थे..तो भगवान ने लकवा कर के आराम दिया..देखो ये उस की कितनी कृपा है..भगवान की और दुख की बड़ी कृपा है..माँ-बाप की कृपा है तो माँ बाप का हम श्राध्द  करते, तर्पण करते..लेकिन इस दुख देवता का तो हम श्राध्द तर्पण भी नही करते..क्यूँ की वो बेचारा आता है, मर जाता है..रहेता नही है…अभी ठीक भी हो जाएगा, अथवा शरीर के साथ चला जाएगा..माँ बाप तो मरने के बाद भी रहेते है..ये बेचारा तो एक बार मर जाता है तो फिर रहेता ही नही..तो इस का तो श्राद्ध  भी नही करते, तो इस का तो उपकार माने बेटे अश्विनी…”
अश्विनी देखता रहे गया !
गुरु ने कहा, “बेटा ये तेरी मेरी वार्ता जो सुनेगा वो भी स्वस्थ हो जाएगा.. बीमारी शरीर में आती है लाला!..दुख  तो मान में आता है …चिंता चित्त में आती है..तुम तो निर्लेप  नारायण के अमर आत्मा हो!”
हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम.. माधुर्य ओम..मेरे जी ओम ओम..प्यारे जी ओम…हा हा हा हा

मनुष्य को भगवान ने कितने कितने  अनुदान दिए है..ज़रा सोचते है तो मौन हो जाता है! मन विश्रान्ति में चला जाता है…जब तेरा गुरु है, और तू बोले की मैं परेशान हूँ, मैं दुखी हूँ तो तू गुरु का अपमान करता है..मानवता का अपमान करता है..जो बोलते है ना मैं दुखी हूँ, परेशान हूँ  तो समझ लेना की उन के भाग्य के वे शत्रु है…अभागे लोग सोचते है मैं दुखी, परेशान हूँ..समझदार लोग ऐसा कभी नही सोचते है…जो बोलते मैं दुखी परेशान हूँ उस के मान में  दुख परेशानी  ऐसा गहेरा उतरता जाएगा की जैसे हाथी दलदल में फँसे और ज्यों निकलना चाहे तो और गहेरा उतरे ..ऐसे ही दुखी और परेशान हूँ बोलते तो समझो वो दुख और परेशानी में हाथी के नाई  गहेरा जा रहा है..अभागा है..अपने भाग्य को कोस रहा है..
‘मैं दुखी नही हूँ, मैं परेशान नही हूँ..दुख है तो मन को है, परेशानी है तो मन को है..’ ये पक्का करे..वास्तव में मन की कल्पना है परेशानी..दुख परेशानी  तो मेरे विकास करने के लिए है  ..वाह मेरे प्रभु !
सुखम वा यदि वा दुखम स योगी परमो मतः ll

जिस वस्तु को हम प्यार करते वो प्यारी हो जाती है, जिस वस्तु को हम महत्व देते वो महत्व पूर्ण हो जाती है..जिस वस्तु को मानव ठुकरा दे वो वस्तु बेकार हो जाती है..नोइडा में जहा सत्संग हुआ था तो वहाँ खेत थे..और वहाँ अब पौने चार लाख रुपये में 1 मीटर जगह मिलती है..हे मानव तू जिस जगह को महत्व देता वो जगह कीमती हो जाती..तू जिस फॅशन को महत्व देता वो कीमती हो जाती..तू इतना सब को महत्व देनेवाला अपने आप को कोस कर अपना सत्यानाश क्यूँ करता है?

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Saturday, 26 November 2022

माता शबरी की कहानी


बात भगवान राम के जन्म से पहले की है, जब भील आदिवासी कबीले के मुखिया अज के घर बेटी पैदा हुई थी। उसका एक नाम श्रमणा और दूसरा नाम शबरी रखा गया। शबरी की मां इन्दुमति उसे खूब प्यार करती थी। बचपन से ही शबरी पशु-पक्षियों की भाषा समझकर उनसे बातें करती और जब सबरी की मां उसे देखती, तो कुछ समझ नहीं पाती थी।

कुछ समय बाद एक पंडित ने शबरी के परिवार को बताया कि वो आगे चलकर संन्यासी बन सकती है। इस बात का पता चलते ही शबरी के पिता ने उसका रिश्ता तय कर दिया। जैसे ही शादी का दिन नजदीक आया, शबरी के घर वालों ने खूब सारी बकरियां और अन्य जानवर घर के पास लाकर बांध दिए।

एक दिन शबरी का मां जब उसके बाल बना रही थी, तो उसने मां से पूछा, “इतने सारे जानवर हमारे घर क्यों लाए गए हैं।”

मां ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हारा विवाह होने वाला है, इसलिए हम लोगों ने इनका इंतजाम बलि के लिए किया है। तुम्हारी शादी के दिन ही बलि प्रथा होगी और फिर इनसे स्वादिष्ट भोजन बनाकर सबको परोसा जाएगा।’ यह सब सुनकर शबरी दुखी हो गई। काफी देर तक शबरी ने उन जानवरों को आजाद करने के बारे में सोचा।

सोचते-सोचते शबरी के मन में हुआ कि अगर ये जानवर यहां नहीं होंगे, तो इनकी बलि रूक सकती है। ऐसा नहीं हुआ, तो मेरे घर से कहीं चले जाने पर ही यह बलि रुकेगी। जब मैं ही नहीं रहूंगी, तब न विवाह होगा और न ही बलि प्रथा। इससे मासूम जानवर बच जाएंगे।

इसी सोच के साथ जानवरों को रखी गई जगह पर सबरी पहुंची। उसने सोचा कि उन्हें खोल देती हूं, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई। उसके बाद शबरी जंगल की तरफ भागने लगी। भागते-भागते शबरी ऋषिमुख पर्वत पहुंच गई। वहां करीब दस हजार ऋषि रहा करते थे। शबरी को लगा कि वो भी इसी जंगल में किसी तरह ऋषि-मुनियों की सेवा करके अपना जीवन जी लेगी।

वो चुपचाप उसी जंगल में एक हिस्से में किसी तरह से रहने लगी। शबरी रोजाना ऋषि-मुनियों की झोपड़ी के आगे झाड़ु लगाती और हवन के लिए लकड़ियां भी लाकर रख देती। ऋषि-मुनियों को समझ नहीं आ रहा था कि जंगल में उनके काम अपने आप कैसे हो रहे हैं।

एक दिन शबरी को किसी ऋषि ने देख लिया। उसे देखते ही उसका परिचय पूछा। जैसे ही शबरी ने बताया कि वो भील आदिवासी परिवार से संबंध रखती है, तो उसे ऋषियों ने खूब डांट लगाई। शबरी को इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि उसकी जाति छोटी है और उसे ऋषियों द्वारा जाति की वजह अपमान सहन करना पड़ेगा।

इतना सब होने के बाद भी शबरी हर ऋषि-मुनि के दरवाजे पहुंचती और उनके आंगन में झाड़ू लगाकर उनसे गुरु दीक्षा देने के लिए कहती। हर कोई शबरी को उसकी जाति की वजह से अपने आश्रम से भगा देता था। ऐसा होते-होते काफी समय बीत गया। उसके बाद शबरी मतंग ऋषि की कुटिया में पहुंची।

वहां पहुंचकर मतंग ऋषि को सबरी ने बताया कि वो उनसे गुरु दीक्षा लेना चाहती है। उन्होंने खुशी-खुशी उसे अपने गुरुकुल में रहने दिया और भगवान से जुड़ा ज्ञान देते रहे। शबरी ने भी अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो गुरुकुल के भी सारे काम करती थी। शबरी से खुश होकर मतंग ऋषि ने उसे बेटी मान लिया था।

समय के साथ मतंग ऋषि का शरीर बूढ़ा हो गया। उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, ‘बेटी मैं अपना देह त्यागना चाह रहा हूं। बहुत साल हो गए इस शरीर में रहते-रहते।’

शबरी ने दुखी मन से कहा, ‘आपके ही सहारे मैं इस जंगल में रह पाई हूं। आप ही चले जाएंगे, तो मैं जीकर क्या करुंगी। आप अपने संग मुझे भी ले जाइए। मैं भी देह त्याग दूंगी।’

मतंग ऋषि ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। राम तुम्हारी चिंता करेंगे और ध्यान भी रखेंगे।’

शबरी ने ‘राम’ का नाम सुनने के बाद पूछा, ‘वो कौन हैं और उन्हें मैं किस तरह से ढूढूंगी।’

मंतग ऋषि ने बताया, ‘राम कोई और नहीं भगवान हैं। वो तुम्हें सारे अच्छे कर्मों का फल देंगे। तुम्हें उन्हें ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। वो एक दिन खुद तुम्हें खोजते हुए इस कुटिया में आएंगे और तु्म्हें उनके हाथों ही मोक्ष मिलेगा। तब तक तुम इसी आश्रम में रहो।’ इतना कहते ही मंतग ऋषि ने अपना शरीर त्याग दिया।

शबरी के मन में मंतग ऋषि के जाने के बाद से एक ही बात थी कि भगवान राम स्वयं उससे मिलने आएंगे। वो रोज भगवान राम से मिलने के लिए बाग से अच्छे-अच्छे फूल लाकर पूरा आश्रम सजाती और भगवान के लिए बेर तोड़कर लाती। भगवान के लिए बेर चुनते हुए शबरी उन्हें चख लेती थी, ताकि भगवान वो सिर्फ मीठे बेर ही दे।

रोजाना शबरी इसी तरह भगवान के दर्शन की आस में फूल और बेर इकट्ठा करती रहती थी। इसी तरह इंतजार में कई साल बीत गए। शबरी का शरीर एकदम वृद्ध हो गया।

एक दिन आश्रम के पास के ही तलाब में शबरी पानी लेने के लिए गई। तभी पास के ही एक ऋषि ने उसे अछूत कहते हुए वहां से भागने के लिए कहा और एक पत्थर मार दिया। वो पत्थर जब शबरी को लगा, तो उसे चोट लगी और खून बहने लगा।

बहते हुए खून की एक बूंद उसी तलाब के पानी में गिर गई। तभी पूरा तालाब का पानी खून में बदल गया।

ये सब होता देखकर ऋषि ने शबरी को ही डांटा और कहा कि पापीन तुम्हारी वजह से पूरा पानी खराब हो गया। रोज ऋषि उस पानी को साफ करने के लिए अपनी कई तरह की विद्याओं का इस्तेमाल करते। कई सारे जतन करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने गंगा जैसी कई पवित्र नदियों का जल भी उस तालाब में डाला। फिर भी तालाब का पानी साफ नहीं हो पाया और वो खून जैसा ही रहा।

कई सालों तक तालाब के पानी को साफ करने की कोशिश के बाद भी कुछ काम नहीं आया, तो ऋषि ने थककर सबकुछ छोड़ दिया। इस घटना के कई सालों के बाद भगवान राम अपनी पत्नी सीता के हरण के बाद उन्हें ढूंढते हुए उसी तालाब के पास पहुंचे। ऋषि-मुनियों ने उन्हें पहचान लिया। भगवान को वहां देखकर ऋषियों ने तालाब का पानी साफ करने के लिए भगवान को अपने पैर उसमें डालने के लिए कहा, लेकिन पानी जैसे का तैसा ही था।

ऋषि-मुनियों ने भगवान से भी कई अन्य जतन करवाए, लेकिन वो पानी जस का तस खून जैसा ही रहा। तब भगवान ने ऋषियों से पानी के रक्त में बदलने की कहानी पूछी। तब ऋषि ने शबरी को पत्थर मारने वाली सारी बात बता दी। उसके बाद कहा कि वो महिला ही अपवित्र है, छोटी जात की है, इसलिए ये सब हुआ है।

उसी वक्त भगवान राम ने कहा, ‘ये सब आप लोगों के खराब वचनों से हुआ है। शबरी को इस तरह के शब्द बोलकर आप लोगों ने उसे नहीं, बल्कि मेरे दिल को घायल किया है। इसी घायल दिल के रक्त का प्रतीक यह तालाब का लाल पानी है।’ आगे भगवान राम बोले, ‘कहा हैं वो माईं मैं उनसे मिलना चाहता हूं।’ तबतक शबरी उसी तलाब के पास पहुंच जाती हैं। इस दौरान शबरी के पैर को ठोकर लगती है और कुछ घूल उस तालाब में गिर जाती है। तभी सारा पानी साफ हो जाता है।

भगवान सबसे कहते हैं कि देखिए, आप लोगों ने क्या कुछ नहीं किया, लेकिन पानी साफ नहीं हो पाया। अभी सिर्फ इनके पैर की थोड़ी-सी धूल ने ही तलाब का पानी साफ कर दिया। भगवान राम को शबरी पहचान चुकी थीं। उन्हें प्रणाम करके शबरी ने कहा, ‘भगवान! आप मेरे साथ कुटिया में चलिए।’ भगवान भी खुशी-खुशी शबरी के साथ चल पड़े।

फूलों से शबरी ने भगवान राम का स्वागत किया। वो सीधे बेर तोड़ने के लिए बाग गईं और चख-चखकर उनके लिए बेर लेकर आई। उन्होंने बड़े ही प्यार से भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण को बेर दिए। भगवान राम ने भी उतने ही प्यार से उन बेर को खाना शुरू किया।

तभी बेर देखकर मुंह बनाते हुए लक्ष्मण ने कहा, ‘भैया ये बेर जूठे हैं, इन्हें आप कैसे खा सकते हैं।’

भगवान ने जवाब दिया. ‘लक्ष्मण! ये जूठे नहीं, बल्कि बहुत मीठे हैं। शबरी माई हम सबके लिए ये बहुत प्यार से तोड़कर लाई हैं।’

इतना कहकर भगवान राम प्यार से उन बेर को खाने लगे। भगवान ने जाते हुए शबरी माई से कहा, ‘आप मुझसे जो चाहे वो मांग सकती हैं।’

शबरी ने उन्हें कहा, ‘मतंग ऋषि के कहने पर मैं आजतक सिर्फ आपके दर्शन करने के लिए जी रही थी। अब आप मुझे मोक्ष प्रदान कीजिए। मैं अपना शरीर आपके सामने ही त्यागूंगी।’

उसी वक्त शबरी ने अपना शरीर त्याग दिया। भगवान राम ने अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया और सीता मां की खोज में आगे बढ़ गए।

Tuesday, 5 May 2020

गुरु भक्त संदीपक





प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म
मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-
शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने
अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने
का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के
प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस
श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-
कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने अपने शिष्यों को एकत्र करके
कहाः " हे शिष्यों ! पूर्वजन्म में मैंने कुछ
पापकर्म किये हैं। उनमें से कुछ तो जप-तप,
अनुष्ठान करके मैंने काट लिये,
अभी थोड़ा प्रारब्ध बाकी है। उसका फल
इसी जन्म में भोग लेना जरूरी है। उस कर्म
का फल भोगने के लिए मुझे भयानक बीमारी आ
घेरेगी, इसलिए मैं काशी जाकर रहूँगा। वहाँ मुझे
कोढ़ निकलेगा, अँधा हो जाऊँगा। उस समय मेरे
साथ काशी आकर मेरी सेवा कौन करेगा ? है कोई
हरि का लाल, जो मेरे साथ रहने के लिए तैयार
हो ?"
वेदधर्म मुनि ने परीक्षा ली। शिष्य पहले
तो कहा करते थेः "गुरुदेव ! आपके चरणों में
हमारा जीवन न्योछावर हो जाये मेरे प्रभु !" अब
सब चुप हो गये। गुरु का जयघोष होता है, माल-
मिठाइयाँ आती हैं, फूल-फल के ढेर लगते हैं तब
बहुत शिष्य होते हैं लेकिन आपत्तिकाल में उनमें
से कितने टिकते हैं !
वेदधर्म मुनि के शिष्यों में संदीपक नाम
का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त एवं
कुशाग्र बुद्धिवाला था।
उसने कहाः "गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में
रहेगा।"
गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए
रहना होगा।"
संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन
ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन
की सार्थकता है।"
वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी नगर में
मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। संदीपक
सेवा में लग गया। प्रातः काल में गुरु
की आवश्यकता के अनुसार दातुन-पानी,
स्नान-पूजन, वस्त्र-परिधान
इत्यादि की तैयारी पहले से ही करके रखता।
समय होते ही भिक्षा माँगकर लाता और गुरुदेव
को भोजन कराता। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर
में कोढ़ निकला और संदीपक
की अग्निपरीक्षा शुरु हो गयी। गुरु कुछ समय
बाद अंधे हो गये। शरीर कुरूप और स्वभाव
चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र
भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन-रात
गुरुजी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के
घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु
को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता,
भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन
कराता।
गुरुजी को मिजाज और भी क्रोधी एवं
चिड़चिड़ा हो गया। वे गाली देते, डाँटते,
तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध
प्रकार से परीक्षा लेते। संदीपक खूब शांति से,
धैर्य से यह सब सहते हुए दिन प्रतिदिन
ज्यादा तत्परता से गुरु की सेवा में मग्न रहने
लगा। धनभागी संदीपक के हृदय में गुरु के
प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़
होता गया।
संदीपक की ऐसी अनन्य गुरुनिष्ठा देखकर
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ
उसके समक्ष प्रकट हो गये और
बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम
प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह
मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट
करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। इसलिए
बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक ने अपने गुरु
की आज्ञा के बिना कुछ भी माँगने से मना कर
दिया। शिवजी ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और
बोलाः "शिवजी वरदान देना चाहते है। आप
आज्ञा दें तो मैं वरदान माँग लूँ कि आपका रोग
एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाये।"
गुरु ने संदीपक को खूब डाँटते हुए
कहाः "सेवा करते-करते थका है इसलिए वरदान
माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से
तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! जरा तो सोच
कि मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे
भोगना ही पड़ेगा।"
इस जगह पर कोई आधुनिक शिष्य होता तो गुरु
को आखिरी नमस्कार करके चल देता। संदीपक
वापस शिवजी के पास गया और वरदान के लिए
मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित
हो कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये
विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से
सारा वृत्तान्त कहा। भगवान विष्णु भी संतुष्ट
हो संदीपक के पास वरदान देने के लिए प्रकटे।
गुरुभक्त संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ
नहीं चाहिए।" भगवान ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक ने कहाः "आप मुझे
यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल
श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर
प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन-प्रतिदिन भक्ति दृढ़
होती रहे। इसके अलावा मुझे और कुछ
नहीं चाहिए।" ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ने
संदीपक को गले लगा लिया।
जब तक गुरू का हृदय शिष्य पर संतुष्ट
नहीं होता, तब तक शिष्य में ज्ञान प्रकट
नहीं होता। उसके हृदय में गुरु का ज्ञानोपदेश
पचता नहीं है। गुरु का संतोष ही शिष्य की परम
उपासना है, परम साधना है। गुरु को जो संतुष्य
करता है, प्रसन्न करता है उस पर सब संतुष्ट
हो जाते हैं। गुरुद्रोही पर विश्वात्मा हरि रूष्ट होते
हैं। आज संदीपक जैसे
सत्शिष्यों की गाथा का वर्णन सत्शास्त्र कर
रहे हैं। धन्य हैं ऐसे सत्शिष्य !
संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ
बैठे थे। न कोढ़, न कोई अंधापन, न अस्वस्थता !
शिवस्वरूप सदगुरु श्री वेदधर्म ने संदीपक
को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से
पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे
बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा !
जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा सुनायेंगे,
वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र
संदीपक ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानन्दस्वरूप
हो।"
गुरु के संतोष से संदीपक गुरुतत्त्व में जग गया,
गुरुस्वरूप हो गया।
अपनी श्रद्धा को कभी भी,
कैसी भी परिस्थिति में गुरु पर से तनिक भी कम
नहीं करना चाहिए। गुरु परीक्षा लेने के लिए
कैसी भी लीला कर सकते हैं। निजामुद्दीन
औलिया ने भी अपने चेलों की परीक्षा ली थी।
खास-खास 24 चेलों में से भी 2-2 करके फिसलते
गये। आखिरी ऊँचाई तक अमीर खुसरो ही डटे रहे।

Tuesday, 24 September 2019

श्राद्ध और मदन मोहन मालवीय जी के जन्म रहस्य




  
सूक्ष्म जगत के लोगों को हमारी श्रद्धा और श्रद्धा से दी गयी वस्तु से तृप्ति का एहसास होता है।
बदले में वे भी हमें मदद करते हैं, प्रेरणा देते हैं, प्रकाश देते हैं, आनंद और शाँति देते
हैं। हमारे घर में किसी संतान का जन्म होने वाला हो तो वे अच्छी आत्माओं को भेजने में सहयोग
करते हैं। श्राद्ध की बड़ी महिमा है। पूर्वजों से उऋण होने के लिए, उनके शुभ आशीर्वाद से उत्तम संतान
की प्राप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है।
आजादी से पूर्व काँग्रेस बुरी तरह से तीन-चार टुकड़ों में बँट चुकी थी। अँग्रेजों का षडयंत्र सफल हो रहा
था। काँग्रेस अधिवेशन में कोई आशा नहीं रह गयी थी कि बिखरे हुए नेतागण कुछ कर सकेंगे। महामना
मदनमोहन मालवीय, भारत की आजादी में जिनका योगदान सराहनीय रहा है, यह बात ताड़ गये कि
सबके रवैये बदल चुके हैं और अँग्रेजों का षडयंत्र सफल हो रहा है। अतः अधिवेशन के बीच में ही चुपके
से खिसक गये एक कमरे में। तीन आचमन लेकर, शांत होकर बैठ गये। उन्हें अंतः प्रेरणा हुई और उन्होंने
श्रीमदभागवदगीता के 'गजेन्द्रमोक्ष' का पाठ किया।
बाद में थोड़ा सा सत्संग प्रवचन दिया तो काँग्रेस के सारे खिंचाव-तनाव समाप्त हो गये एवं सब बिखरे हुए
काँग्रेसी एक जुट होकर चल पड़े। आखिर अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।
काँग्रेस के बिखराव को समाप्त करके, काँग्रसियों को एकजुट कर कार्य करवानेवाले मालवीयजी का
जन्म कैसे हुआ था?
मालवीयजी के जन्म से पूर्व हिन्दुओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध जब आंदोलन की शुरुआत की थी तब
अंग्रेजों ने सख्त 'कर्फ्यू' जारी कर दिया था। ऐसे दौर में एक बार मालवीयजी के पिता जी कहीं से
कथा करके पैदल ही घर आ रहे थे।
उन्हें मार्ग में जाते देखकर अंग्रेज सैनिकों ने रोका-टोका एवं सताना शुरु किया। वे उनकी भाषा नहीं
जानते थे और अंग्रेज सैनिक उनकी भाषा नहीं जानते थे। मालवीय जी के पिता ने अपना साज
निकाला और कीर्तन करने लगे। कीर्तन से अंग्रेज सैनिकों को कुछ आनंद आया और इशारों से
धन्यवाद देते  हुए उन्होंने कहा किः "चलो, हम आपको पहुँचा देते हैं।" यह देखकर मालवीयजी
के पिता को हुआ किः "मेरे कीर्तन से प्रभावित होकर इन्होंने मुझे तो हैरान करना बन्द कर दिया
किन्तु मेरे भारत देश के लाखों-करोड़ों भाईयों का शोषण हो रहा है, इसके लिए मुझे कुछ करना चाहिए।"
बाद में वे गया जी गये और प्रेमपूर्वक श्राद्ध किया। श्राद्ध के अंत में अपने दोनों हाथ उठाकर
पितरों से प्रार्थना करते हुए उन्होंने कहाः 'हे पितरो ! मेरे पिण्डदान से अगर आप तृप्त हुए हों,
मेरा किया हुआ श्राद्ध अगर आप तक पहुँचा हो तो आप कृपा करके मेरे घर में ऐसी ही संतान
दीजिए जो अंग्रेजों को भगाने का काम करे और मेरा भारत आजाद हो जाये.....।'

पिता की अंतिम प्रार्थना फली। समय पाकर उन्हीं के घर मदनमोहन मालवीय जी का जन्म हुआ।






Sunday, 25 August 2019

भक्त और भगवान





एक भक्त था वह परमात्मा को बहुत मानता था, बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया करता था ।

एक दिन भगवान से कहने लगा –

मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूँ पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई ।

मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये की मुझे ये अनुभव हो की आप हो।

-भगवान ने कहा ठीक है,
तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो, जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देंगे । दो तुम्हारे पैर होंगे और दो पैरो के निशान मेरे होंगे ।
इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी ।

अगले दिन वह सैर पर गया,
जब वह रेत पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ ।

अब रोज ऐसा होने लगा ।

एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ सब कुछ चला गया, वह रोड़ पर आ गया उसके अपनो ने उसका साथ छोड दिया । देखो यही इस दुनिया की प्रॉब्लम है, मुसीबत में सब साथ छोड़ देते है ।

अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये ।

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त में भगवान ने भी साथ छोड दिया।

धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे ।

एक दिन जब वह सैर  पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे ।

उससे अब रहा नही गया,
वह बोला-

भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है,
पर आप ने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था,
ऐसा क्यों किया?

भगवान ने कहा –

तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा,
तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे वे तुम्हारे पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे,

उस समय में तुम्हे अपनी गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है ।

इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर दिखाई दे रहे ।.................







Wednesday, 17 October 2018

बेटियों की अहमियत



       एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई।
        चेहरे पर झलकता आक्रोश...


        संत ने पूछा - बोलो बेटी क्या बात है?


        बालिका ने कहा- महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है।
        वह कुछ भी करे, कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती।
        इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है।
        यह मत करो, यहाँ मत जाओ, घर जल्दी आ जाओ आदि।


        संत मुस्कुराए और कहा...


         बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं?
        ये गार्डर सर्दी, गर्मी, बरसात, रात दिन इसी प्रकार पड़े रहते हैं।
         इसके बावजूद इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता।
          लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में।


         अब तुम चलो एक ज्वेलरी शॉप में।
         एक बड़ी तिजोरी, उसमें एक छोटी तिजोरी।
         उसमें रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा।
         क्योंकि जौहरी जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी।


         समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है।
         पूरे घर को रोशन करती झिलमिलाते हीरे की तरह।
          जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के पास कुछ नहीं बचता।
          बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में।


         पूरी सभा में चुप्पी छा गई।
          उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।।।




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Wednesday, 10 October 2018

प्रेम के बदले प्रेम


- एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरेखरीदता ।

- अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता,
"ये कम मीठा लग रहा है, देखो !"

- बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!"

- वो उस संतरे को वही छोड़,बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता।

- युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा
"ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह
नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?

"युवा ने पत्नी को एक मधुर मुस्कान के साथ बताया -

"वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती,
इस तरह मै उसे संतरा खिला देता हूँ ।

एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया,

- ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है,
पर संतरे तौलते हुए मै तेरे पलड़े को देखती हूँ,
तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है ।

बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा -
"उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है,
वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ,
पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।

तो कहना पड़ेगा -

मेरी हैसीयत से ज्यादा मेरी थाली मे तूने परोसा है.
तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक, मुझे तुझपे भरोसा है.
एक बात तो पक्की है की...
छीन कर खानेवालों का कभी पेट नहीं भरता
और बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता...!!!



"ऊँचा उठने के लिए पंखो की जरूरत तो पक्षीयो को पड़ती है..
इंसान तो जितना नीचे झुकता है,
वो उतना ही ऊपर उठता जाता है..!!



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ref: a whatsapp collection-