Tuesday, 7 May 2024

वीर सावरकर: स्वतंत्रता सेनानी

 



वीर सावरकर


स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भारतीय राष्ट्र की गर्वशाली धारा है। इस संग्राम में निरंतर प्रेरणा और समर्पण के प्रतीक के रूप में अनेक वीर सेनानी ने अपने बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनमें से एक नाम है, वीर सावरकर। वे न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण योद्धा थे, बल्कि उनकी विचारधारा और साहस ने देशवासियों को एक समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर किया।



वीर सावरकर का जन्म २८ मई, १८८३ को महाराष्ट्र के भगुर में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर था और माता का नाम राधाबाई था। बचपन से ही सावरकर ने देश के प्रति अपनी समर्पण भावना का प्रदर्शन किया था। उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होकर राष्ट्र सेवा का मार्ग चुना।


सावरकर का योगदान स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाई में अपनी जान को खतरे में डाला। उन्होंने विभाजन के खिलाफ एकता की अपील की और अपने विचारों को लोगों के बीच फैलाने के लिए विभिन्न धार्मिक और सामाजिक सभाओं का संचालन किया।


सावरकर को स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्भुत योगदान के लिए उन्हें १९२४ में ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस प्रशासन के विरुद्ध अपराधिक रूप से गिरफ्तार किया था। उन्हें काला पानी, ताजा वायरस जैसी कठिन शारीरिक और मानसिक प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ा। हालांकि, इन सभी कठिनाइयों के बावजूद, उनकी अद्भुत आत्मगाथा और निष्ठा ने उन्हें अद्वितीय बना दिया।


सावरकर की विचारधारा में राष्ट्रवाद, स्वाधीनता और समाज की समृद्धि के लिए समर्पण शामिल था। उनकी प्रेरणा और आदर्शों ने लाखों लोगों को राष्ट्रीय उत्थान की दिशा में प्रेरित किया।


उनका जीवन एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि एक व्यक्ति अपने संघर्षों और विपदाओं के बावजूद भी अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है। सावरकर के विचार और योगदान को समझने के लिए हमें उनकी जीवनी और कार्य का अध्ययन करना चाहिए।


उनकी विचारधारा में राष्ट्रप्रेम, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय को बल देने के लिए उन्होंने कई पुस्तकें और लेख लिखे। उनकी किताब "हिंदू राष्ट्र की स्थापना" और "कितना पहचान जारी है" भारतीय समाज को जागरूक करने वाली किताबें हैं।


सावरकर को एक समर्थक और एक कट्टरपंथी राष्ट्रवादी के रूप में देखा जाता है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा थे, जिनका योगदान देश के इतिहास में अविस्मरणीय है। उनका संघर्ष और समर्पण हमें आज भी प्रेरित करता है और हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की राह पर हमें समर्पित और संघर्षशील रहना होगा।


वीर सावरकर की प्रेरणा का उपयोग करते हुए हमें समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर होने की दिशा में कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उनके योगदान को याद करते हुए हमें समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर होने की दिशा में कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उनके योगदान को याद करते हुए हमें समृद्ध और स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर होने की दिशा में कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

वीर सावरकर ने अपने जीवन में राष्ट्रप्रेम, समर्पण और साहस के उदाहरण से हमें स्वतंत्र भारत की दिशा में अग्रसर करने का संदेश दिया। उनके योगदान को याद करते हुए हमें आज भी उनके आदर्शों का पालन करना चाहिए और देश के विकास में अपना योगदान देना चाहिए।


  *     *     *     *     *

Thursday, 24 August 2023

दुआ और बद्दुआ

  


    एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भिख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदी_गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, कभी_कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें|


         एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आओ देखा ना ताओ, सीधा उसे पत्थर से दे मारा, भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वहां भिखारी के पीछे चलने लगा|


       भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जालिल करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, अब अंधेरा हो चला था, भिखारी अपने घर लौट रहा था, सेठ भी उसके पीछे था, भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी, जो भिखारी की पत्नी थी, जैसे ही उसने अपने पति को देखा उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी, उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी, उसे देखते ही बुढिया बोली बस इतना ही और कुछ नही, और ये आपका सर कहा फूट गया?


       भिखारी बोला, हाँ बस इतना ही किसी ने कुछ नही दिया सबने गालिया दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सर फूट गया, भिखारी ने फिर कहा सब अपने ही पापों का परिणाम हैं, याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे, क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया, याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी,.......

( बुढिया की ऑखों में ऑसू आ गये और उसने कहा हाँ,)

    कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे, कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जालिल करते थे, कैसे हम उसे कभी_कभी मार वा धकेल देते थे, अब बुढिया ने कहा हाँ सब याद है मुजे, कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था, जब भी वहाँ रोटिया मांगता मैंने बस उसे गालियाँ दी, एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया|


      और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे, मैं नही, आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी

      फिर भिखारी ने कहा, पर मैं किसी को बद्दुआ नही देता, चाहे मेरे साथ कितनी भी जात्ती क्यू ना हो जाए, मेरे लब पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता, की कोई और इतने बुरे दिन देखे, मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूं, क्यूकि उनको मालूम ही नही, वो क्या पाप कर रहें है, जो सीधा ईश्वर देख रहा हैं, जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते, इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती हैं,|

      

        सेठ चुपके_चुपके सब सुन रहा था, उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी, बुढे_बुढिया ने आधी रोटी को दोनो मिलकर खाया, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गयें|


     अगले दिन, वहाँ भिखारी भिख मांगने सेठ कर यहाँ गया, सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी, उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, माफ करना बाबा, गलती हो गयी, भिखारी ने कहा, ईश्वर तुम्हारा भला करे, और वो वहाँ से चला गया|

       सेठ को एक बात समझ आ गयी थी, इंसान तो बस दुआ_बद्दुआ देते है पर पूरी वो ईश्वर वो जादूगर कर्मो के हिसाब से करता हैं,,,,,,,,|


     हो सके तो बस अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास |


 


 

सत्संग का असर




एक संत रोज अपने शिष्यों को गीता पढ़ाते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे। लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ पढ़ाते हैं, वह समझ में नहीं आता। जबकि बाकी सारे लोग समझ लेते हैं। मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। आखिर मुझे गीता का भाष्य क्यों समझ में नहीं आता? गुरु ने कहा- तुम कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ। शिष्य चकित हुआ। आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए वह टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर पड़ा। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई। लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं। कोई फायदा नहीं। गुरु बोले- फायदा है। तुम जरा टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार- बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह सत्संग  बार- बार सुनने से खूब फायदा होता है। भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन तुम इसका फायदा बाद में महसूस करोगे।

लालच (Greed)





एक सच्ची प्रेरक कहानी


रमेश चंद्र शर्मा का मेडिकल स्टोर अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।

रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।

वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। लेकिन बूढ़ा सोच रहा था। उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, "मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।"

लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।

फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।

समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमतों को जानता हूं।

एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।

मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं। गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं, कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।
        *।। जय सियाराम जी।।*
         *।। ॐ नमह शिवाय।।*

*    *    *    *    *    *    *







Tuesday, 22 August 2023

दुःख का कितना बड़ा उपकार

 



एक बड़ा प्रसिध्द राज नेता था बंगाल में ….बड़ा जाना-माना था..धर्म परायण व्यक्ति था..अश्विनी दत्त बंगाल के प्रसिध्द राज नेता थे..उन के गुरु राज नारायण थे.

उस के गुरु को लकवा मार गया..3 महीने के बाद अश्विनी को पता चला…3 महीने से गुरु को लकवा मार गया, मुझे पता नही चला सोच कर विव्हल हो कर भागता भागता आया गुरु के पास…ज्यो ही गुरु के पास पहुँचा..प्रणाम करने जाता है तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा  हो चुका था..गुरु ने दूसरे हाथ से पकड़ के उठाया..
बोले, ‘बेटा, कैसे भागे भागे आए हो…देखो भागा तो शरीर..और दुख हुआ मन में..लेकिन इन दोनो को तुम जानने वाले हो..ऐसा कर के गुरु ने सत्य स्वरूप ईश्वर आत्मा की सार बातें बताई..सुनते सुनते वो तो दुखी आया था, चिंतित हो के आया था…लेकिन गुरु की वाणी सुनते सुनते उस का दुख चिंता गायब हो गया..3 घंटे कैसे बीत  गये पता ही नही चला…
हसने लगा,”गुरु जी 3 घंटे बीत  गये!मुझे तो पता ही नही चला..मैं तो बहोत विव्हल  हो के आया था आप का स्वास्थ्य पुछने के लिए..लेकिन आप को ये लकवा मार गया इस की पीड़ा नही?..दुख नही? हम तो बहोत  दुखी थे और आप ने तो मेरे को 3 घंटे तक सत्संग का अमृतपान  कराया…”
गुरु ने अश्विनी दत्त(बंगाल के प्रसिध्द नेता) के पीठ पे थपथपाया..बोले, “पगले पीड़ा हुई है तो शरीर को..लकवा मारा है तो शरीर को..इस हाथ को..लेकिन दूसरा हाथ मौजूद है, पैर भी मौजूद है, जिव्हा भी मौजूद है..ये उस प्रभु की कितनी कृपा है!..पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था..हार्ट एटैक हो सकता था.और 60 साल तक शरीर स्वस्थ रहा..अभी थोड़े दिन..3 महीने से ही तो लकवा है …ये उस की कितनी कृपा है की दुख भेज कर वो हम को शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है..सुख भेज कर हमें उदार बनाने का और परोपकार करने का संदेश देता है..हम को तो दुख का आदर करना चाहिए..दुख का उपकार मानना चाहिए..बचपन में हम दुखी होते थे जब माँ-बाप ज़बरदस्ती स्कूल ले जाते थे..लेकिन वो दुख नही होता तो आज हम विद्वान भी नही हो सकते थे..ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नही है जिस का दुख के बिना विकास हुआ हो…दुख का तो खूब खूब धन्यवाद करना चाहिए…और दिखता दुख है, लेकिन अंदर से सुख, सावधानी और विवेक से भरा है.. और मुझे हरिचर्चा में विश्रान्ति दिलाया.. सत्संग करने के भागा दौड़ी से आराम करना चाहिए था, लेकिन मैं नही कर पा रहा था…तुम लोग नही करने देते थे..तो भगवान ने लकवा कर के आराम दिया..देखो ये उस की कितनी कृपा है..भगवान की और दुख की बड़ी कृपा है..माँ-बाप की कृपा है तो माँ बाप का हम श्राध्द  करते, तर्पण करते..लेकिन इस दुख देवता का तो हम श्राध्द तर्पण भी नही करते..क्यूँ की वो बेचारा आता है, मर जाता है..रहेता नही है…अभी ठीक भी हो जाएगा, अथवा शरीर के साथ चला जाएगा..माँ बाप तो मरने के बाद भी रहेते है..ये बेचारा तो एक बार मर जाता है तो फिर रहेता ही नही..तो इस का तो श्राद्ध  भी नही करते, तो इस का तो उपकार माने बेटे अश्विनी…”
अश्विनी देखता रहे गया !
गुरु ने कहा, “बेटा ये तेरी मेरी वार्ता जो सुनेगा वो भी स्वस्थ हो जाएगा.. बीमारी शरीर में आती है लाला!..दुख  तो मान में आता है …चिंता चित्त में आती है..तुम तो निर्लेप  नारायण के अमर आत्मा हो!”
हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम.. माधुर्य ओम..मेरे जी ओम ओम..प्यारे जी ओम…हा हा हा हा

मनुष्य को भगवान ने कितने कितने  अनुदान दिए है..ज़रा सोचते है तो मौन हो जाता है! मन विश्रान्ति में चला जाता है…जब तेरा गुरु है, और तू बोले की मैं परेशान हूँ, मैं दुखी हूँ तो तू गुरु का अपमान करता है..मानवता का अपमान करता है..जो बोलते है ना मैं दुखी हूँ, परेशान हूँ  तो समझ लेना की उन के भाग्य के वे शत्रु है…अभागे लोग सोचते है मैं दुखी, परेशान हूँ..समझदार लोग ऐसा कभी नही सोचते है…जो बोलते मैं दुखी परेशान हूँ उस के मान में  दुख परेशानी  ऐसा गहेरा उतरता जाएगा की जैसे हाथी दलदल में फँसे और ज्यों निकलना चाहे तो और गहेरा उतरे ..ऐसे ही दुखी और परेशान हूँ बोलते तो समझो वो दुख और परेशानी में हाथी के नाई  गहेरा जा रहा है..अभागा है..अपने भाग्य को कोस रहा है..
‘मैं दुखी नही हूँ, मैं परेशान नही हूँ..दुख है तो मन को है, परेशानी है तो मन को है..’ ये पक्का करे..वास्तव में मन की कल्पना है परेशानी..दुख परेशानी  तो मेरे विकास करने के लिए है  ..वाह मेरे प्रभु !
सुखम वा यदि वा दुखम स योगी परमो मतः ll

जिस वस्तु को हम प्यार करते वो प्यारी हो जाती है, जिस वस्तु को हम महत्व देते वो महत्व पूर्ण हो जाती है..जिस वस्तु को मानव ठुकरा दे वो वस्तु बेकार हो जाती है..नोइडा में जहा सत्संग हुआ था तो वहाँ खेत थे..और वहाँ अब पौने चार लाख रुपये में 1 मीटर जगह मिलती है..हे मानव तू जिस जगह को महत्व देता वो जगह कीमती हो जाती..तू जिस फॅशन को महत्व देता वो कीमती हो जाती..तू इतना सब को महत्व देनेवाला अपने आप को कोस कर अपना सत्यानाश क्यूँ करता है?

blog is reposted from the source - link

Saturday, 26 November 2022

माता शबरी की कहानी


बात भगवान राम के जन्म से पहले की है, जब भील आदिवासी कबीले के मुखिया अज के घर बेटी पैदा हुई थी। उसका एक नाम श्रमणा और दूसरा नाम शबरी रखा गया। शबरी की मां इन्दुमति उसे खूब प्यार करती थी। बचपन से ही शबरी पशु-पक्षियों की भाषा समझकर उनसे बातें करती और जब सबरी की मां उसे देखती, तो कुछ समझ नहीं पाती थी।

कुछ समय बाद एक पंडित ने शबरी के परिवार को बताया कि वो आगे चलकर संन्यासी बन सकती है। इस बात का पता चलते ही शबरी के पिता ने उसका रिश्ता तय कर दिया। जैसे ही शादी का दिन नजदीक आया, शबरी के घर वालों ने खूब सारी बकरियां और अन्य जानवर घर के पास लाकर बांध दिए।

एक दिन शबरी का मां जब उसके बाल बना रही थी, तो उसने मां से पूछा, “इतने सारे जानवर हमारे घर क्यों लाए गए हैं।”

मां ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हारा विवाह होने वाला है, इसलिए हम लोगों ने इनका इंतजाम बलि के लिए किया है। तुम्हारी शादी के दिन ही बलि प्रथा होगी और फिर इनसे स्वादिष्ट भोजन बनाकर सबको परोसा जाएगा।’ यह सब सुनकर शबरी दुखी हो गई। काफी देर तक शबरी ने उन जानवरों को आजाद करने के बारे में सोचा।

सोचते-सोचते शबरी के मन में हुआ कि अगर ये जानवर यहां नहीं होंगे, तो इनकी बलि रूक सकती है। ऐसा नहीं हुआ, तो मेरे घर से कहीं चले जाने पर ही यह बलि रुकेगी। जब मैं ही नहीं रहूंगी, तब न विवाह होगा और न ही बलि प्रथा। इससे मासूम जानवर बच जाएंगे।

इसी सोच के साथ जानवरों को रखी गई जगह पर सबरी पहुंची। उसने सोचा कि उन्हें खोल देती हूं, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई। उसके बाद शबरी जंगल की तरफ भागने लगी। भागते-भागते शबरी ऋषिमुख पर्वत पहुंच गई। वहां करीब दस हजार ऋषि रहा करते थे। शबरी को लगा कि वो भी इसी जंगल में किसी तरह ऋषि-मुनियों की सेवा करके अपना जीवन जी लेगी।

वो चुपचाप उसी जंगल में एक हिस्से में किसी तरह से रहने लगी। शबरी रोजाना ऋषि-मुनियों की झोपड़ी के आगे झाड़ु लगाती और हवन के लिए लकड़ियां भी लाकर रख देती। ऋषि-मुनियों को समझ नहीं आ रहा था कि जंगल में उनके काम अपने आप कैसे हो रहे हैं।

एक दिन शबरी को किसी ऋषि ने देख लिया। उसे देखते ही उसका परिचय पूछा। जैसे ही शबरी ने बताया कि वो भील आदिवासी परिवार से संबंध रखती है, तो उसे ऋषियों ने खूब डांट लगाई। शबरी को इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि उसकी जाति छोटी है और उसे ऋषियों द्वारा जाति की वजह अपमान सहन करना पड़ेगा।

इतना सब होने के बाद भी शबरी हर ऋषि-मुनि के दरवाजे पहुंचती और उनके आंगन में झाड़ू लगाकर उनसे गुरु दीक्षा देने के लिए कहती। हर कोई शबरी को उसकी जाति की वजह से अपने आश्रम से भगा देता था। ऐसा होते-होते काफी समय बीत गया। उसके बाद शबरी मतंग ऋषि की कुटिया में पहुंची।

वहां पहुंचकर मतंग ऋषि को सबरी ने बताया कि वो उनसे गुरु दीक्षा लेना चाहती है। उन्होंने खुशी-खुशी उसे अपने गुरुकुल में रहने दिया और भगवान से जुड़ा ज्ञान देते रहे। शबरी ने भी अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो गुरुकुल के भी सारे काम करती थी। शबरी से खुश होकर मतंग ऋषि ने उसे बेटी मान लिया था।

समय के साथ मतंग ऋषि का शरीर बूढ़ा हो गया। उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, ‘बेटी मैं अपना देह त्यागना चाह रहा हूं। बहुत साल हो गए इस शरीर में रहते-रहते।’

शबरी ने दुखी मन से कहा, ‘आपके ही सहारे मैं इस जंगल में रह पाई हूं। आप ही चले जाएंगे, तो मैं जीकर क्या करुंगी। आप अपने संग मुझे भी ले जाइए। मैं भी देह त्याग दूंगी।’

मतंग ऋषि ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। राम तुम्हारी चिंता करेंगे और ध्यान भी रखेंगे।’

शबरी ने ‘राम’ का नाम सुनने के बाद पूछा, ‘वो कौन हैं और उन्हें मैं किस तरह से ढूढूंगी।’

मंतग ऋषि ने बताया, ‘राम कोई और नहीं भगवान हैं। वो तुम्हें सारे अच्छे कर्मों का फल देंगे। तुम्हें उन्हें ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। वो एक दिन खुद तुम्हें खोजते हुए इस कुटिया में आएंगे और तु्म्हें उनके हाथों ही मोक्ष मिलेगा। तब तक तुम इसी आश्रम में रहो।’ इतना कहते ही मंतग ऋषि ने अपना शरीर त्याग दिया।

शबरी के मन में मंतग ऋषि के जाने के बाद से एक ही बात थी कि भगवान राम स्वयं उससे मिलने आएंगे। वो रोज भगवान राम से मिलने के लिए बाग से अच्छे-अच्छे फूल लाकर पूरा आश्रम सजाती और भगवान के लिए बेर तोड़कर लाती। भगवान के लिए बेर चुनते हुए शबरी उन्हें चख लेती थी, ताकि भगवान वो सिर्फ मीठे बेर ही दे।

रोजाना शबरी इसी तरह भगवान के दर्शन की आस में फूल और बेर इकट्ठा करती रहती थी। इसी तरह इंतजार में कई साल बीत गए। शबरी का शरीर एकदम वृद्ध हो गया।

एक दिन आश्रम के पास के ही तलाब में शबरी पानी लेने के लिए गई। तभी पास के ही एक ऋषि ने उसे अछूत कहते हुए वहां से भागने के लिए कहा और एक पत्थर मार दिया। वो पत्थर जब शबरी को लगा, तो उसे चोट लगी और खून बहने लगा।

बहते हुए खून की एक बूंद उसी तलाब के पानी में गिर गई। तभी पूरा तालाब का पानी खून में बदल गया।

ये सब होता देखकर ऋषि ने शबरी को ही डांटा और कहा कि पापीन तुम्हारी वजह से पूरा पानी खराब हो गया। रोज ऋषि उस पानी को साफ करने के लिए अपनी कई तरह की विद्याओं का इस्तेमाल करते। कई सारे जतन करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने गंगा जैसी कई पवित्र नदियों का जल भी उस तालाब में डाला। फिर भी तालाब का पानी साफ नहीं हो पाया और वो खून जैसा ही रहा।

कई सालों तक तालाब के पानी को साफ करने की कोशिश के बाद भी कुछ काम नहीं आया, तो ऋषि ने थककर सबकुछ छोड़ दिया। इस घटना के कई सालों के बाद भगवान राम अपनी पत्नी सीता के हरण के बाद उन्हें ढूंढते हुए उसी तालाब के पास पहुंचे। ऋषि-मुनियों ने उन्हें पहचान लिया। भगवान को वहां देखकर ऋषियों ने तालाब का पानी साफ करने के लिए भगवान को अपने पैर उसमें डालने के लिए कहा, लेकिन पानी जैसे का तैसा ही था।

ऋषि-मुनियों ने भगवान से भी कई अन्य जतन करवाए, लेकिन वो पानी जस का तस खून जैसा ही रहा। तब भगवान ने ऋषियों से पानी के रक्त में बदलने की कहानी पूछी। तब ऋषि ने शबरी को पत्थर मारने वाली सारी बात बता दी। उसके बाद कहा कि वो महिला ही अपवित्र है, छोटी जात की है, इसलिए ये सब हुआ है।

उसी वक्त भगवान राम ने कहा, ‘ये सब आप लोगों के खराब वचनों से हुआ है। शबरी को इस तरह के शब्द बोलकर आप लोगों ने उसे नहीं, बल्कि मेरे दिल को घायल किया है। इसी घायल दिल के रक्त का प्रतीक यह तालाब का लाल पानी है।’ आगे भगवान राम बोले, ‘कहा हैं वो माईं मैं उनसे मिलना चाहता हूं।’ तबतक शबरी उसी तलाब के पास पहुंच जाती हैं। इस दौरान शबरी के पैर को ठोकर लगती है और कुछ घूल उस तालाब में गिर जाती है। तभी सारा पानी साफ हो जाता है।

भगवान सबसे कहते हैं कि देखिए, आप लोगों ने क्या कुछ नहीं किया, लेकिन पानी साफ नहीं हो पाया। अभी सिर्फ इनके पैर की थोड़ी-सी धूल ने ही तलाब का पानी साफ कर दिया। भगवान राम को शबरी पहचान चुकी थीं। उन्हें प्रणाम करके शबरी ने कहा, ‘भगवान! आप मेरे साथ कुटिया में चलिए।’ भगवान भी खुशी-खुशी शबरी के साथ चल पड़े।

फूलों से शबरी ने भगवान राम का स्वागत किया। वो सीधे बेर तोड़ने के लिए बाग गईं और चख-चखकर उनके लिए बेर लेकर आई। उन्होंने बड़े ही प्यार से भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण को बेर दिए। भगवान राम ने भी उतने ही प्यार से उन बेर को खाना शुरू किया।

तभी बेर देखकर मुंह बनाते हुए लक्ष्मण ने कहा, ‘भैया ये बेर जूठे हैं, इन्हें आप कैसे खा सकते हैं।’

भगवान ने जवाब दिया. ‘लक्ष्मण! ये जूठे नहीं, बल्कि बहुत मीठे हैं। शबरी माई हम सबके लिए ये बहुत प्यार से तोड़कर लाई हैं।’

इतना कहकर भगवान राम प्यार से उन बेर को खाने लगे। भगवान ने जाते हुए शबरी माई से कहा, ‘आप मुझसे जो चाहे वो मांग सकती हैं।’

शबरी ने उन्हें कहा, ‘मतंग ऋषि के कहने पर मैं आजतक सिर्फ आपके दर्शन करने के लिए जी रही थी। अब आप मुझे मोक्ष प्रदान कीजिए। मैं अपना शरीर आपके सामने ही त्यागूंगी।’

उसी वक्त शबरी ने अपना शरीर त्याग दिया। भगवान राम ने अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया और सीता मां की खोज में आगे बढ़ गए।

Tuesday, 5 May 2020

गुरु भक्त संदीपक





प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म
मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-
शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने
अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने
का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के
प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस
श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-
कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने अपने शिष्यों को एकत्र करके
कहाः " हे शिष्यों ! पूर्वजन्म में मैंने कुछ
पापकर्म किये हैं। उनमें से कुछ तो जप-तप,
अनुष्ठान करके मैंने काट लिये,
अभी थोड़ा प्रारब्ध बाकी है। उसका फल
इसी जन्म में भोग लेना जरूरी है। उस कर्म
का फल भोगने के लिए मुझे भयानक बीमारी आ
घेरेगी, इसलिए मैं काशी जाकर रहूँगा। वहाँ मुझे
कोढ़ निकलेगा, अँधा हो जाऊँगा। उस समय मेरे
साथ काशी आकर मेरी सेवा कौन करेगा ? है कोई
हरि का लाल, जो मेरे साथ रहने के लिए तैयार
हो ?"
वेदधर्म मुनि ने परीक्षा ली। शिष्य पहले
तो कहा करते थेः "गुरुदेव ! आपके चरणों में
हमारा जीवन न्योछावर हो जाये मेरे प्रभु !" अब
सब चुप हो गये। गुरु का जयघोष होता है, माल-
मिठाइयाँ आती हैं, फूल-फल के ढेर लगते हैं तब
बहुत शिष्य होते हैं लेकिन आपत्तिकाल में उनमें
से कितने टिकते हैं !
वेदधर्म मुनि के शिष्यों में संदीपक नाम
का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त एवं
कुशाग्र बुद्धिवाला था।
उसने कहाः "गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में
रहेगा।"
गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए
रहना होगा।"
संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन
ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन
की सार्थकता है।"
वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी नगर में
मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। संदीपक
सेवा में लग गया। प्रातः काल में गुरु
की आवश्यकता के अनुसार दातुन-पानी,
स्नान-पूजन, वस्त्र-परिधान
इत्यादि की तैयारी पहले से ही करके रखता।
समय होते ही भिक्षा माँगकर लाता और गुरुदेव
को भोजन कराता। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर
में कोढ़ निकला और संदीपक
की अग्निपरीक्षा शुरु हो गयी। गुरु कुछ समय
बाद अंधे हो गये। शरीर कुरूप और स्वभाव
चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र
भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन-रात
गुरुजी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के
घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु
को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता,
भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन
कराता।
गुरुजी को मिजाज और भी क्रोधी एवं
चिड़चिड़ा हो गया। वे गाली देते, डाँटते,
तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध
प्रकार से परीक्षा लेते। संदीपक खूब शांति से,
धैर्य से यह सब सहते हुए दिन प्रतिदिन
ज्यादा तत्परता से गुरु की सेवा में मग्न रहने
लगा। धनभागी संदीपक के हृदय में गुरु के
प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़
होता गया।
संदीपक की ऐसी अनन्य गुरुनिष्ठा देखकर
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ
उसके समक्ष प्रकट हो गये और
बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम
प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह
मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट
करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। इसलिए
बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक ने अपने गुरु
की आज्ञा के बिना कुछ भी माँगने से मना कर
दिया। शिवजी ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और
बोलाः "शिवजी वरदान देना चाहते है। आप
आज्ञा दें तो मैं वरदान माँग लूँ कि आपका रोग
एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाये।"
गुरु ने संदीपक को खूब डाँटते हुए
कहाः "सेवा करते-करते थका है इसलिए वरदान
माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से
तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! जरा तो सोच
कि मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे
भोगना ही पड़ेगा।"
इस जगह पर कोई आधुनिक शिष्य होता तो गुरु
को आखिरी नमस्कार करके चल देता। संदीपक
वापस शिवजी के पास गया और वरदान के लिए
मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित
हो कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये
विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से
सारा वृत्तान्त कहा। भगवान विष्णु भी संतुष्ट
हो संदीपक के पास वरदान देने के लिए प्रकटे।
गुरुभक्त संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ
नहीं चाहिए।" भगवान ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक ने कहाः "आप मुझे
यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल
श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर
प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन-प्रतिदिन भक्ति दृढ़
होती रहे। इसके अलावा मुझे और कुछ
नहीं चाहिए।" ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ने
संदीपक को गले लगा लिया।
जब तक गुरू का हृदय शिष्य पर संतुष्ट
नहीं होता, तब तक शिष्य में ज्ञान प्रकट
नहीं होता। उसके हृदय में गुरु का ज्ञानोपदेश
पचता नहीं है। गुरु का संतोष ही शिष्य की परम
उपासना है, परम साधना है। गुरु को जो संतुष्य
करता है, प्रसन्न करता है उस पर सब संतुष्ट
हो जाते हैं। गुरुद्रोही पर विश्वात्मा हरि रूष्ट होते
हैं। आज संदीपक जैसे
सत्शिष्यों की गाथा का वर्णन सत्शास्त्र कर
रहे हैं। धन्य हैं ऐसे सत्शिष्य !
संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ
बैठे थे। न कोढ़, न कोई अंधापन, न अस्वस्थता !
शिवस्वरूप सदगुरु श्री वेदधर्म ने संदीपक
को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से
पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे
बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा !
जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा सुनायेंगे,
वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र
संदीपक ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानन्दस्वरूप
हो।"
गुरु के संतोष से संदीपक गुरुतत्त्व में जग गया,
गुरुस्वरूप हो गया।
अपनी श्रद्धा को कभी भी,
कैसी भी परिस्थिति में गुरु पर से तनिक भी कम
नहीं करना चाहिए। गुरु परीक्षा लेने के लिए
कैसी भी लीला कर सकते हैं। निजामुद्दीन
औलिया ने भी अपने चेलों की परीक्षा ली थी।
खास-खास 24 चेलों में से भी 2-2 करके फिसलते
गये। आखिरी ऊँचाई तक अमीर खुसरो ही डटे रहे।