Monday, 18 August 2025

दुःख पड़े तो क्या करें? - मदालसा प्रसंग

 

 


एक लड़की ने ठान लिया कि मैं पहले आत्मविद्या पाऊँगी, जिससे सारे दुख सदा के लिए मिट जाएँ और परमात्मा का साक्षात्कार हो जाए। उसने सत्संग किया, अनुष्ठान किया और अंततः उसे साक्षात्कार प्राप्त हुआ।


वह बड़े घर की राजकन्या थी, उसका नाम था मदालसा। शादी हो गई तो उसने सोचा – “मेरे गर्भ से जो संतान जन्म लेगी, वे अज्ञानी कैसे रहें? संसार में लोग तो भगवान को बड़ा मानते हैं, परंतु मैं अपने बच्चों को आत्मा और परमात्मा का ज्ञान देकर उन्हें भगवद्रूप बनाऊँगी।”


मदालसा अपने शिशुओं को दूध पिलाते समय भी यही उपदेश देती – “तू शुद्ध है, तू अमर है, तू आत्मा है, तू चेतन है। मरने वाला शरीर तू नहीं है, बदलने वाला मन तू नहीं है, बदलने वाली बुद्धि तू नहीं है, तू अहंकार नहीं है। तू तो चैतन्य आत्मा है, अमर है। अपनी अमरता को पहचान।” 


लोरी में भी वही बातें कहती और जब बच्चे समझदार होते, तो उन्हें आत्मज्ञान से पूर्ण कर देती। एक-एक करके चार पुत्र आत्मसाक्षात्कार कर महापुरुष बन गए।


जब पाँचवें पुत्र अलर्क  का जन्म हुआ, तो मदालसा ने वही उपदेश देना चाहा, पर राजा ने कहा – *“यदि यह भी स्वतंत्र महापुरुष बन गया तो राजकाज कौन संभालेगा?”इसलिए अलर्क को पूरा आत्मज्ञान नहीं दिया गया, केवल थोड़ा-सा मार्गदर्शन दिया गया।


समय बीता, मदालसा वृद्ध हो गई। उसने सोचा – “अब यह शरीर कभी भी समाप्त हो सकता है और मेरे अलर्क पुत्र को आत्मज्ञान नहीं मिला है। जब यह बड़े संकट में होगा, तब इसे दुख सताएगा।” उसने एक चिट्ठी लिखकर ताबीज में डाल दी और अलर्क को देते हुए कहा – “बेटा! जब बहुत बड़ी मुसीबत आ जाए और कोई उपाय न सूझे, तब यह ताबीज खोलना।”


मां का देहांत हो गया। अलर्क राजा बन गया। संसार में कौन-सा ऐसा राज्य है जिसमें चिंता, दुख और टेंशन न हो? जिनके पास आत्मज्ञान नहीं है, उन्हें तो हर हाल में चिंता सताती है।


चारों भाइयों ने सोचा – “हमारी मां का उद्देश्य था कि सब पुत्र आत्मसाक्षात्कार करें, पर अलर्क रह गया। यह राजा है, इसलिए उपदेश मानने वाला नहीं है। बिना संकट के यह संत के पास नहीं जाएगा।”


इसलिए उन्होंने काशी नरेश से मिलकर नाटक रचा और फौज लेकर अलर्क के राज्य को चारों ओर से घेर लिया। अलर्क घबरा गया – *“मेरे अपने भाई और काशी नरेश मिलकर युद्ध करेंगे तो मैं क्या करूँगा?”* दुखी होकर उसे मां की दी हुई ताबीज याद आई। उसने खोलकर देखा, उसमें लिखा था –

“दुख पड़े तो संत शरण जाइए।”


अलर्क तुरंत संत गोरखनाथ के पास पहुँचा और बोला – *“महाराज! मैं बहुत दुखी हूँ। मेरे भाई और काशी नरेश युद्ध कर रहे हैं, मैं कुछ नहीं कर पा रहा।”


गुरु गोरखनाथ ने कहा – “ठहरो।”* पास रखे अंगारे में चिमटा डालकर जब वह तपकर लाल हो गया, तो उन्होंने कहा – “तेरे दिल में दुख है न? हाथ हटाओ, दुख को मारते हैं। बताओ, दुख कहाँ है? दुख पहले था क्या? नहीं। अब आया है तो क्यों आया है? तू दुखी है या दुख आया है? जब दुख नहीं था, तब भी तू था। और जब दुख चला जाएगा, तब भी तू रहेगा। तो दुख कहाँ है?”


अलर्क ने गहराई से सोचा। उसे समझ आया – "महाराज! दुख इसलिए है कि मैं शरीर और राज्य को ‘मैं’ मान बैठा हूँ। राज्य सदा रहने वाला नहीं, शरीर भी सदा रहने वाला नहीं। यही मूर्खता दुख का कारण है। वास्तव में मैं तो अमर आत्मा हूँ, परंतु अभी मैंने आत्मा को पहचाना नहीं।”


गुरु ने कहा – “अच्छा, जो ‘नहीं जानना’ है, उसको कौन जानता है? खोज।”

ध्यान गहरा हुआ, और अचानक उसे अनुभूति हुई – “नहीं जानने को जो जानता है, वही आत्मा-परमात्मा है।”


क्षणभर में अलर्क को परम शांति मिली। उसकी आँखों में दिव्य चमक आ गई, चेहरे पर आनंद खिल उठा। उसने गुरु को प्रणाम करते हुए कहा – “महाराज! अब सदा के लिए दुख मिट गए। अब तो मृत्यु भी मुझे दुखी नहीं कर सकती। आपकी कृपा से आत्मविद्या का प्रकाश हो गया।”


उसने भाइयों को संदेश भेजा – "मैंने अब तक राजकाज संभाला, अब तुम संभालो।" पर भाइयों ने गले लगाकर कहा – “हमें राज्य नहीं चाहिए। हम तो केवल चाहते थे कि तू आत्मराज प्राप्त करे, इसलिए यह नाटक किया था। अब तू जीवनमुक्त होकर राज्य कर, अब तेरे लिए यह बंधन नहीं रहा।”


उस दिन से अलर्क ने निर्लिप्त होकर राज्य किया। क्योंकि जिसने आत्मराज पा लिया, उसके लिए बाहरी राज कोई बंधन नहीं रहता। आसक्ति मिट जाती है, और जब आसक्ति मिट जाती है, तब चिंता और दुख भी मिट जाते हैं।


जो अपने को चाहिए – वह तो स्वयं हम हैं, अमर चैतन्य आत्मा। उसे मौत भी नहीं छीन सकती। और जो नश्वर है – शरीर, धन, राज्य – वह चाहे जितना संभालें, एक दिन छूट ही जाएगा। फिर उसमें आसक्ति क्यों?


धर्म के अनुसार व्यवहार करते हुए भी भीतर से निर्भय रहना चाहिए। क्योंकि सत्य तो यही है – आत्मा अमर है, चैतन्य है, और मृत्यु केवल नश्वर शरीर को छू सकती है, आत्मा को नहीं।

 

Saturday, 16 August 2025

प्रार्थना से विपत्ति से मुक्ति - श्रीकृष्ण द्रौपदी प्रसंग - महाभारत




विपत्ति के समय विचलित न होकर यदि हम श्रद्धा और प्रार्थना के साथ भगवान की शरण लेते हैं, तो बिगड़ी हुई स्थिति भी सँवर जाती है। जबकि ईर्ष्या और द्वेष से प्रेरित होकर किया गया कृत्य अंततः विनाशकारी ही सिद्ध होता है।  इस प्रकार एक कथा आज जानते हैं -

 

         महाभारत के वनपर्व में वर्णित कथा अत्यंत गहन शिक्षा देने वाली है। जब पांडव वनवास के लिए जा रहे थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य मुनि से निवेदन किया – ‘‘विप्रवर! मेरे साथ अनेक वेदों में पारंगत ब्राह्मण वन की ओर आ रहे हैं। उनका पालन-पोषण करना मेरे लिए कठिन है। कृपया मार्गदर्शन दें।’’ धौम्य मुनि ने उत्तर दिया – ‘‘राजन! तपस्या और भक्ति का आश्रय लेकर ही आप इस दायित्व का निर्वाह कर सकते हैं।’’


        युधिष्ठिर ने मुनि की आज्ञा से भगवान सूर्य का स्तोत्र कर अनुष्ठान किया। प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया और कहा – ‘‘यह पात्र तब तक अक्षय रहेगा जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर ले।’’ इस प्रकार पांडव वनवास में भी ब्राह्मणों और अतिथियों को संतोषपूर्वक भोजन कराते रहे।


        परंतु जब दुर्योधन ने देखा कि पांडव तो विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और दान से युक्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तो उसने छल-कपट से उन्हें संकट में डालने का उपाय सोचा। उसने दुर्वासा मुनि से प्रार्थना की कि वे पांडवों के यहाँ तब पधारें जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हों। उद्देश्य यही था कि मुनि और उनके दस हजार शिष्य भोजन न मिलने पर पांडवों को शाप दें।


        भाग्यवश, एक दिन दुर्वासा मुनि सचमुच पांडवों के पास पहुँचे। युधिष्ठिर ने विधिवत स्वागत किया और निवेदन किया कि वे स्नान करके भोजन करें। इधर द्रौपदी अत्यंत चिंतित हुई, क्योंकि वह स्वयं भोजन कर चुकी थी और अक्षय पात्र अब रिक्त था।


        निराशा की उस घड़ी में द्रौपदी को स्मरण हुआ कि जब सब मार्ग बंद हो जाएं तो केवल भगवान ही आश्रय हैं। उसने सच्चे हृदय से श्रीकृष्ण का आवाहन किया। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। (गीता 9.22) — 

‘‘जो अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।’’


        प्रार्थना का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण तत्काल वहाँ प्रकट हुए और द्रौपदी से भोजन माँगा। संकोचपूर्वक द्रौपदी ने बताया कि पात्र रिक्त है। परंतु भगवान ने हठ करके पात्र मँगवाया और उसमें लगे हुए थोड़े से साग को खा लिया। तत्क्षण सम्पूर्ण विश्व के आत्मा, यज्ञभोक्ता श्रीहरि तृप्त हो गए। परिणामस्वरूप स्नान कर रहे दुर्वासा मुनि और उनके शिष्यों को ऐसा अनुभव हुआ मानो वे पूर्ण तृप्त हो चुके हों। वे डकारों से भर उठे और बिना भोजन किए ही पांडवों के पास से चले गए।


        यह प्रसंग हमें गहन शिक्षा देता है। उपनिषदों में कहा गया है – 

आत्मैवेदं सर्वम्

 — सम्पूर्ण जगत आत्मा ही है। जब भगवान स्वयं तृप्त हुए तो उनके अंशरूप सभी जीव भी तृप्त हो गए। यही वेदान्त का सत्य है। 


            गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं – 

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः

                                                               (गीता 3.13) 

            अर्थात जो यज्ञशेष का आहार करते हैं वे पापों से मुक्त हो जाते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने उसी भाव से थोड़े से साग को स्वीकार कर विश्व को तृप्त कर दिया।


        द्रौपदी की सच्ची प्रार्थना यह भी सिद्ध करती है कि भक्त का भाव ही ईश्वर को बाँधता है। कठोपनिषद् में कहा गया है – 

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

 यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः 

— आत्मा प्रवचन, बुद्धि या श्रवण मात्र से नहीं मिलता, बल्कि जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं वही उसे पाता है। द्रौपदी के भावपूर्ण आह्वान ने ही श्रीकृष्ण को वहाँ खींच लिया।


        यह घटना यह भी सिखाती है कि दुष्ट व्यक्ति दूसरों के अनिष्ट में आनंदित होते हैं, परंतु सज्जन दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्न होते हैं। उपनिषदों और गीता दोनों में यही शिक्षा है कि ईर्ष्या और द्वेष विवेक का नाश कर देते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा – 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। 

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (गीता 3.37) 

— ‘‘यह काम और क्रोध ही मनुष्य के वैरी हैं।’’ दुर्योधन इन्हीं के वश होकर पांडवों के अनिष्ट की योजना बनाता रहा, पर अंततः उसका कपट स्वयं पर ही भारी पड़ा।


            इसके विपरीत, धर्ममार्ग पर चलने वाले युधिष्ठिर और द्रौपदी जैसे भक्तजन विपत्ति में भी धैर्य नहीं खोते। वे जानते हैं कि अंतिम आश्रय केवल भगवान हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् कहता है – 

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।

 — ‘‘वही परमात्मा सम्पूर्ण जगत का आधार है।’’





*     *     *     *     *





Wednesday, 30 July 2025

सच्ची प्यास की पहचान: आत्मज्ञान की प्यास की कथा

 


  कहानी की मुख्य विन्दु - 

  • सच्चा प्यासा मोलभाव नहीं करता।

  • जिसे सच में चाहिए, वह पहले समर्पण करता है, बाद में पूछता है।

  • सच्चे प्रेम, ईश्वर, ज्ञान और साधना की राह में तर्क-वाद नहीं, अनुभव और समर्पण चलता है।

  • जिन्हें वाकई कुछ पाना होता है, वे बहस नहीं करते, श्रम करते हैं।

कहानी - 

रेलवे स्टेशन की भीड़भाड़, भागती दौड़ती ज़िंदगी की झलक होती है। कहीं कोई ट्रेन पकड़ने की जल्दी में होता है, तो कहीं कोई बिछड़े हुए को गले लगाने आया होता है। उसी तरह उस दिन भी एक प्लेटफ़ॉर्म पर रोज़ की तरह अफरा-तफरी का माहौल था। गाड़ी आकर रुकी, और यात्रियों के बीच एक दुबला-पतला लड़का, सिर पर मटका और हाथ में गिलास लिए, आवाज़ लगाता हुआ दौड़ रहा था—"पानी ले लो! ठंडा पानी!"

उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन आंखों में चमक और आत्मविश्वास था। वह लड़का मेहनत करता था, इज्ज़त से कमाता था और ईमानदारी से अपने काम में लगा हुआ था।

सेठ और सौदा

ट्रेन के एक डिब्बे में एक अमीर सेठ बैठे थे। उनकी उम्र पचास के पार थी, पहनावे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह पैसे वाले और दुनियादारी में खूब डूबे हुए व्यक्ति हैं। उन्होंने उस लड़के को बुलाया, “ए लड़के, इधर आ!”

लड़का दौड़ता हुआ आया, और घड़े से पानी का गिलास भरकर सेठ की ओर बढ़ा दिया। सेठ ने पूछा, “कितने पैसे में?”

लड़के ने सीधे कहा, “पच्चीस पैसे।”

सेठ थोड़ा मुस्कराया और बोला, “पंद्रह में देगा क्या?”

लड़का हल्के से मुस्कराया, कुछ नहीं बोला। उसने धीरे से पानी वापस घड़े में उड़ेला और चुपचाप आगे बढ़ गया।

मौन में छिपा गूढ़ संदेश

उसी डिब्बे में एक साधु महात्मा बैठे हुए थे। उन्होंने यह सारा दृश्य देखा—लड़के का व्यवहार, उसका उत्तर न देना, उसकी हल्की मुस्कान और आगे बढ़ जाना।

महात्मा को लगा, इस बालक के मन में जरूर कोई गूढ़ रहस्य छिपा है। वे ट्रेन से नीचे उतर आए और धीरे-धीरे उस लड़के के पीछे चलने लगे।

“ऐ लड़के, ज़रा ठहरो,” महात्मा ने पुकारा।

लड़का ठिठका और विनम्रता से बोला, “जी महाराज?”

महात्मा ने पूछा, “बेटा, जब सेठ ने तुझसे मोलभाव किया, तब तू मुस्कराया क्यों? और कुछ बोला भी नहीं?”

बालक का उत्तर – अनुभव की गहराई

लड़का शांति से बोला, “महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को वास्तव में प्यास लगी ही नहीं थी। उन्हें केवल पानी का रेट पूछना था। यदि उन्हें सच में प्यास लगी होती, तो वह बिना कुछ कहे पानी का गिलास पकड़ लेते और पी लेते। कीमत बाद में पूछते।”

महात्मा यह सुनकर चकित रह गए। उन्होंने कहा, “तू तो बहुत समझदार निकला। ऐसा कैसे सोच लिया तूने?”

लड़का बोला, “महाराज, मैं हर रोज़ सैकड़ों यात्रियों को पानी पिलाता हूं। जिनको सच में प्यास लगती है, उनके होठ सूखे होते हैं, हाथ कांपते हैं और आंखें गिलास पर टिकी होती हैं। वे कभी रेट नहीं पूछते। लेकिन जो केवल शौक या आदत में पूछते हैं, वे मोलभाव करते हैं।”

प्रतीकात्मक व्याख्या

महात्मा कुछ देर मौन रहे, फिर बोले, “बेटा, तूने आज बहुत बड़ी बात कह दी। वास्तव में यह संसार भी एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, और जीवन एक यात्रा। कुछ लोग इस जीवन में सच्ची प्यास—परमात्मा, सत्य, प्रेम, और ज्ञान की प्यास—लेकर आते हैं। वे साधना में लगते हैं, सेवा करते हैं, सवाल नहीं करते। लेकिन बहुत से लोग केवल चर्चा, तर्क, और मोलभाव में फंसे रहते हैं—‘क्या मिलेगा, कितनी मेहनत करनी होगी, क्या फायदा होगा।’ ऐसे लोग जीवन की असली मिठास नहीं चख पाते।”

आध्यात्मिक संकेत

महात्मा ने कहा, “आजकल लोग भगवान का नाम तो लेते हैं, लेकिन उनके भीतर सच्ची तड़प नहीं है। वे पहले यह पूछते हैं—क्या फल मिलेगा? कितनी तपस्या करनी पड़ेगी? क्या फायदा होगा? लेकिन जो सच्चे साधक होते हैं, वे पहले खुद को समर्पित करते हैं, बाद में सोचते हैं कि भगवान क्या देगा। उनका विश्वास यह होता है—‘मैंने जो भी पाया वो उसकी मेहरबानी है, और जो खोया वह मेरी नादानी।’”

जीवन का दर्शन

उस बालक ने न कोई प्रवचन दिया, न कोई किताब पढ़ी थी, लेकिन उसके अनुभव ने उसे ज्ञान की ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। वह जानता था कि जीवन में जो सच्चा होता है, वह तर्क नहीं करता। जैसे सच्चा प्यासा रेट नहीं पूछता, वैसे ही सच्चा साधक प्रश्नों में नहीं उलझता।

सुखी जीवन का मंत्र

महात्मा ने अंत में कहा, “बेटा, तू धन्य है। तूने आज मुझे भी सिखा दिया कि ज़िंदगी में सच्ची प्यास ही हमें परम लक्ष्य तक ले जाती है। बाकी सब दिखावा है। कुछ लोग पूछते हैं—भगवान है भी या नहीं? मैं उनसे कहता हूं—अगर नहीं है, तो ज़िक्र क्यों? और अगर है, तो फिक्र क्यों?”

उस दिन वह बालक, जो प्लेटफॉर्म पर पानी बेच रहा था, एक जीवनदर्शन का प्रतीक बन गया।


 जीवन की सादगी और गहराई

"खूबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच –
ज़्यादा मैं मांगता नहीं, और कम वो देता नहीं।"

"मंज़िलें गुमराह कर देती हैं कभी-कभी,
इसलिए हर किसी से रास्ता नहीं पूछना चाहिए।"

"जन्म और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं,
पर जीवन को कैसे जीना है – यह पूरी तरह हमारे हाथ में है।"

इसलिए जीवन को हँसते-हँसते, मस्ती में, और पूरे समर्पण भाव से जीना ही सच्ची साधना है। 🌼




Tuesday, 29 July 2025

प्रगति की असली सीढ़ी - शिक्षक और चित्रकार शिष्य की कहानी

 



यह एक प्रेरणादायी कथा है, जो हमें आत्मविकास और सच्चे मार्गदर्शन की महत्ता सिखाती है। इस कहानी के केंद्र में एक युवा चित्रकार है—उत्साही, लगनशील और प्रतिभाशाली। उसके जीवन का उद्देश्य था एक ऐसा चित्र बनाना, जो कला की दुनिया में बेमिसाल हो। उसने अपने अनुभव, कल्पना और अभ्यास का पूरा सार एक चित्र में उड़ेलने का निश्चय किया।

साधना की शुरुआत

उसने एक खाली कैनवास लिया और रंगों की दुनिया में उतर गया। दिन-रात उसकी साधना चलती रही। वह कभी आकाश के रंग देखता, तो कभी फूलों की पंखुड़ियों की बनावट समझता। हर क्षण उसकी दृष्टि में कला ही बसती थी। वह चित्र कोई साधारण चित्र नहीं था—उस चित्र में उसने जीवन की गहराई, भावनाओं की तरलता, और सौंदर्य की सम्पूर्णता को उकेरने का प्रयास किया।

छह महीने बीत गए। उसने अपने घर से बाहर कदम भी कम ही रखा। भोजन और विश्राम भी केवल उतना ही करता, जितना आवश्यक था। उसके मन में केवल एक ही बात थी—"मुझे ऐसा चित्र बनाना है, जो गुरु की कसौटी पर खरा उतरे।" आखिरकार, वह दिन भी आया जब चित्र पूर्ण हुआ।

गुरु के पास पहुँचना

चित्र को सहेजकर वह सीधे अपने गुरु के पास पहुँचा। मन में थोड़ा उत्साह, थोड़ा भय और बहुत अधिक श्रद्धा थी। उसने चित्र गुरु को दिखाया। गुरु ने चित्र को ध्यान से देखा, उसकी प्रत्येक रेखा, प्रत्येक रंग की परछाईं को निहारा। कुछ क्षणों तक वह चुपचाप देखते रहे, फिर मुस्कराकर बोले—"वाह! बेटा, ऐसा चित्र तो मैं भी नहीं बना सका।"

यह वाक्य सुनते ही उस चित्रकार की आँखों में आँसू आ गए। गुरु ने चकित होकर पूछा, "तू रो क्यों रहा है? मैंने तो तेरे चित्र की प्रशंसा की है। यह तो गर्व का क्षण होना चाहिए।" लेकिन शिष्य की आँखों में कुछ और ही चल रहा था। वह बोला—

शिष्य की पीड़ा

"गुरुदेव, आप मेरे आदर्श हैं। आपसे बढ़कर चित्रकार मैं नहीं मानता। यदि आपने मेरे चित्र में कोई कमी नहीं बताई, कोई त्रुटि नहीं निकाली, तो मैं आगे कैसे बढ़ पाऊँगा? जब मेरे कार्य को सुधारने का मार्ग नहीं मिलेगा, तो मैं कैसे जान पाऊँगा कि कहाँ सुधार करना है?"

यह सुनकर गुरु गम्भीर हो गए। उन्होंने उस शिष्य को देखा, मानो पहली बार उसकी भीतरी प्यास को समझा हो। उन्होंने कहा, "बेटा, तू वास्तव में आगे बढ़ने की इच्छा रखता है, और यही बात तुझे महान बनाएगी। अधिकतर लोग प्रशंसा सुनकर रुक जाते हैं, लेकिन तू तो आलोचना चाहता है, क्योंकि तुझे सीखना है। यह भावना तुझे साधक से सिद्ध बना सकती है।"

सच्चा मार्गदर्शन

गुरु ने फिर से चित्र देखा, इस बार बहुत ही आलोचनात्मक दृष्टिकोण से। उन्होंने कहा, "अब जब तू स्वयं सीखना चाहता है, तो सुन। इस चित्र में तुझे जो भाव दिखता है, वह स्पष्ट है, लेकिन कुछ स्थानों पर छायांकन थोड़ा असंतुलित है। यदि तू इस रेखा को थोड़ा और महीन करता, तो गहराई और बढ़ती। यह रंग यहाँ थोड़ा चटक है, जो भाव को भंग कर रहा है। और इस पक्ष की रचना थोड़ी और संतुलित होती, तो दृष्टि केंद्रित रहती।"

शिष्य ने गौर से सुना, कुछ लिखा और कुछ अपने हृदय में उतार लिया। अब उसे मार्ग मिल गया था। प्रशंसा से नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और सुधार से ही आत्म-विकास होता है—यह बात उसके अंतर में उतर चुकी थी।

कथा का सार

यह कथा केवल एक चित्रकार की नहीं, हर उस साधक की है जो अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। चाहे वह कलाकार हो, लेखक हो, विद्यार्थी हो या आध्यात्मिक जिज्ञासु—जो व्यक्ति केवल प्रशंसा चाहता है, वह वहीं रुक जाता है जहाँ उसे "वाह!" मिल जाती है। लेकिन जो व्यक्ति अपने कार्य में सुधार के लिए सजग रहता है, आलोचना को सच्चे मन से स्वीकारता है, वही आगे बढ़ता है।

गुरु का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता, बल्कि शिष्य को उसकी अगली सीढ़ी तक पहुँचाना होता है। लेकिन यदि शिष्य ही केवल प्रशंसा चाहता है, तो गुरु भी मौन रह जाता है। जब शिष्य स्वयं कहता है—"मुझे कमी बताओ," तभी सच्चा ज्ञान और मार्गदर्शन संभव होता है।

अंत में

जीवन में आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम परिपूर्ण बन जाएँ। बल्कि यह आवश्यक है कि हम अपनी अपूर्णताओं को जानें और उन्हें स्वीकार करें। क्योंकि जहाँ स्वीकार है, वहीं सुधार का द्वार खुलता है।

इसलिए यदि कभी कोई आपके कार्य में कमी निकाले, तो उसे अपमान मत समझिए। बल्कि उस व्यक्ति का धन्यवाद कीजिए, जिसने आपको बेहतर बनने का अवसर दिया। यही भाव एक साधक को साधारण से असाधारण बना देता है।

"कमी पर दुखी मत हो,
कमी तो आगे बढ़ने का पहला संकेत है।
जो कमी देख पाए,
समझो उसने तुम्हें ऊँचाई का रास्ता दिखा दिया।"

Saturday, 1 March 2025

रजा देव बघेला की गुरु निष्ठा

 

 







    संत कबीर जी का जीवन लीला का समय पूरा होने वाला था। संसार से विदा लेने वाले थे, सभी भक्त दौड़-दौड़ कर आ रहे थे। वीर देव बघेला काशी के राजा थे, वह पहले कबीर जी का विरोध करते थे, लेकिन बाद में बहुत बड़े भक्त बन गए। विरोध इसलिए करते थे कि कबीर जी उनका महल देखें और उनकी सराहना करें, ऐसा उनका विचार था। पर कबीर दास जी ने कहा कि महल में दो अवगुण हैं। एक तो यह सदा नहीं रहेगा और दूसरा साथ नहीं चलेगा। राजा बघेल के अहंकार को चोट लगी, पर बाद में उन्होंने बहुत सोचा और सोचते-सोचते कहा कि बात तो सही है। ना तो यह महल हमेशा रहेगा और न ही मेरे साथ चलेगा।


    जब राजा को पता चला कि कबीर दास जी संसार से विदा लेने वाले हैं, तब वह दौड़ते-दौड़ते आए और उनके चरणों में गिरे और प्रणाम किया। वह कभी कबीर दास जी को देखते और कभी उनके चरणों में प्रणाम करते। राजा ने कहा, "महाराज, आप जा रहे हैं, मैं प्रण किया था कि गुरुदेव को अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाऊंगा, उनकी सेवा करूंगा और आप चोला छोड़ रहे हैं। तो मैं भी आपके साथ चलूंगा।" तभी कबीर जी ने देखा कि हृदय में सच्चाई है। कबीर जी तनिक मौन हुए और ईश्वर की मौज में डूबे, फिर सभी पर कृपापूर्ण दृष्टि डाली और वीर सिंह बघेल जी से कहा कि तुमने सच्चाई से प्रण किया है, ठीक है, 5 साल रुक जाते हैं। वीर सिंह बघेल राज भार, जिसको देना था, दे कर एक साधारण रसोईया और साधारण सफाई करने वाला बन गए और गुरु के द्वार पर आकर सेवा करने लग गए।


“गुरु की सेवा साधु जाने, गुरु सेवा क्या मूढ़ पिछाने”


    कबीर दास जी के 5 साल पूरे हो गए। बघेल की सेवा से संतुष्ट हुए कबीर दास जी ने जाते-जाते कहा कि बाघेला कि नाई अहंकार छोड़कर सच्चाई से सेवा करना। 


“क्योंकि देखने वाला तुम्हारी सच्चाई को भी देखता है और तुम्हारे दिखावेपन को भी देखता है।” 


    धन्य हैं भारत के ऐसे संत जो हँसते-खेलते मृत्यु को भी टाल  देते हैं। शिष्य के प्रेम और संकल्प के खातिर अपना संकल्प बदल देते हैं। बघेल जैसे शिष्य भी धन्य हैं जो अपना राजपाट छोड़, अहंकार छोड़ गुरु के द्वार में झाड़ू-बुहारी करते, बर्तन मांजते हैं। धन्य है भारत की गुरु-शिष्य परंपरा। धन्य है यहाँ की संस्कृति जहाँ स्वयं भगवान भी जन्म लेने को लालायित होते हैं।


* * * * *






Wednesday, 26 February 2025

शिवरात्रि में निशीथ काल क्या होता है?


निशीथ काल क्या होता है ?

शास्त्रों के अनुसार, निशित काल उस समय को कहा जाता है जब रात्रि अपने मध्य में होती है. निशित काल की अवधि एक घंटे से भी कम होती है. पंचांग के अनुसार इसे रात का आठवां मुहूर्त कहा जाता है जो कि ज्योतिषीय गणनाओं के बाद निर्धारित किया जाता है.

निशीथ काल क्यों होता है ?

महाशिवरात्रि के दिन निशित काल में पूजा करने का महत्व माना गया है. क्योंकि मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव पृथ्वी पर शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे, वह निशितकाल का ही समय था. यही कारण है कि भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए निशितकाल को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. खासकर शिवलिंग पूजन के लिए निशितकाल अच्छा समय माना जाता है.

निशीथ काल कब होता है ?

 यह समय आधी रात या 12 बजे के करीब होता है. मान्यता है कि इस समय शिव की ऊर्जा ब्रह्मांड में सर्वव्यापी होती है. 


निशीथ काल के बारे में कुछ और बातें:

  • शास्त्रों के मुताबिक, यह समय अदृश्य शक्तियों और भूत-पिशाचों का समय होता है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना सबसे शुभ माना गया है. 

  • मान्यता है कि निशीथ काल में शिव पूजा करने से भक्त की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. 

  • निशीथ काल में ध्यान करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा करने से अनंत पुष्यफल मिलता है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा करने से भक्त की सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था तक पहुंचने में मदद मिलती है. 

  • निशीथ काल में भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. 




Thursday, 13 June 2024

संसार कैसा है ?

        




        एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा,'गुरुदेव’,आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है? इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई।'एक नगर में एक शीश महल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जड़े हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देख कर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीश महल पहुंचा। वह खुश मिजाज और जिंदा दिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा..'संसार भी ऐसा ही शीश महल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।'