Sunday, 25 August 2019

भक्त और भगवान





एक भक्त था वह परमात्मा को बहुत मानता था, बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया करता था ।

एक दिन भगवान से कहने लगा –

मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूँ पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई ।

मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये की मुझे ये अनुभव हो की आप हो।

-भगवान ने कहा ठीक है,
तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो, जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देंगे । दो तुम्हारे पैर होंगे और दो पैरो के निशान मेरे होंगे ।
इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी ।

अगले दिन वह सैर पर गया,
जब वह रेत पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ ।

अब रोज ऐसा होने लगा ।

एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ सब कुछ चला गया, वह रोड़ पर आ गया उसके अपनो ने उसका साथ छोड दिया । देखो यही इस दुनिया की प्रॉब्लम है, मुसीबत में सब साथ छोड़ देते है ।

अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये ।

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त में भगवान ने भी साथ छोड दिया।

धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे ।

एक दिन जब वह सैर  पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे ।

उससे अब रहा नही गया,
वह बोला-

भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है,
पर आप ने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था,
ऐसा क्यों किया?

भगवान ने कहा –

तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा,
तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे वे तुम्हारे पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे,

उस समय में तुम्हे अपनी गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है ।

इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर दिखाई दे रहे ।.................







Wednesday, 17 October 2018

बेटियों की अहमियत



       एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई।
        चेहरे पर झलकता आक्रोश...


        संत ने पूछा - बोलो बेटी क्या बात है?


        बालिका ने कहा- महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है।
        वह कुछ भी करे, कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती।
        इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है।
        यह मत करो, यहाँ मत जाओ, घर जल्दी आ जाओ आदि।


        संत मुस्कुराए और कहा...


         बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं?
        ये गार्डर सर्दी, गर्मी, बरसात, रात दिन इसी प्रकार पड़े रहते हैं।
         इसके बावजूद इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता।
          लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में।


         अब तुम चलो एक ज्वेलरी शॉप में।
         एक बड़ी तिजोरी, उसमें एक छोटी तिजोरी।
         उसमें रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा।
         क्योंकि जौहरी जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी।


         समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है।
         पूरे घर को रोशन करती झिलमिलाते हीरे की तरह।
          जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के पास कुछ नहीं बचता।
          बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में।


         पूरी सभा में चुप्पी छा गई।
          उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।।।




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Wednesday, 10 October 2018

प्रेम के बदले प्रेम


- एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरेखरीदता ।

- अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता,
"ये कम मीठा लग रहा है, देखो !"

- बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!"

- वो उस संतरे को वही छोड़,बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता।

- युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा
"ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह
नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?

"युवा ने पत्नी को एक मधुर मुस्कान के साथ बताया -

"वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती,
इस तरह मै उसे संतरा खिला देता हूँ ।

एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया,

- ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है,
पर संतरे तौलते हुए मै तेरे पलड़े को देखती हूँ,
तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है ।

बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा -
"उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है,
वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ,
पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।

तो कहना पड़ेगा -

मेरी हैसीयत से ज्यादा मेरी थाली मे तूने परोसा है.
तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक, मुझे तुझपे भरोसा है.
एक बात तो पक्की है की...
छीन कर खानेवालों का कभी पेट नहीं भरता
और बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता...!!!



"ऊँचा उठने के लिए पंखो की जरूरत तो पक्षीयो को पड़ती है..
इंसान तो जितना नीचे झुकता है,
वो उतना ही ऊपर उठता जाता है..!!



*****

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Wednesday, 3 October 2018

सबसे ठोस क्या है?








सब से ज्यादा सुदृढ़ क्या है?

--- ज्यादा ठोस है संकल्प बल…!
दृढ निश्चय…. संकल्प बल सब से ठोस है….”
एक भाई विकलांग था…संकल्प बल मिला…विद्वान् हुआ…. महा-निदेशक बना…. फौज का निदेशक बना ..
ग्रंथो में भी संकल्प बल की बहोत महिमा गाई है…
लेकिन इस से भी ठोस है, जहाँ से संकल्प उठता है वो….. संकल्प बल से भी ज्यादा ठोस है वो “चिद-घन”!…..भगवान को “घन” कहा है …पथ्थर को तोड़नेवाला लोहा…लोहे को तपानेवाला अग्नि ..अग्नि में शीतलता देनेवाला जल ..और जल के मेघों को वायु उड़ा के ले जाएगा.. और वायु की गति को भी घुमा देगा ऐसा है मनुष्य का संकल्प बल…तो संकल्प बल सब से शक्तिशाली है…..
मैं इस बात को आगे ले चलता…..सब से ज्यादा ठोस है वो “चिद-घन विभु” ….संकल्प जहाँ से उठता है ..
वो आत्मा परमात्मा है “घन… चैत्यन्य..!”
संकल्प बल से महा निदेशक की कुर्सी मिली…कुर्सी चली गई… फिर भी जो नही गया….कुर्सी पे बैठनेवाला शरीर मर गया, फिर भी जो मरा नही वो है आत्मा ..!
महा शक्तिशाली!….
महा शाश्वत तत्व है !!
और उस आत्मा में प्रीति हो जाए, विश्रांति हो जाए…उस को “मैं” के रूप में स्वीकार कर लिया जाए ….
..अभी तो शरीर को “मैं”मानते…. वो तो छुट जाएगा …..शरीर मर जाएगा तो मरने के बाद भी नही मिटता वो कितना ठोस है!!
…. हजारो जनम से शरीर मिले..मिल मिल के मिट गए…. लेकिन आप का आत्मा कभी नही मिटा….
.. ‘ “मैं” हूँ की नही?’ ऐसा सवाल कभी नही उठता…. भगवान है की नही ये सवाल उठ सकता है …
“मैं” हूँ की नही ये सवाल नही उठेगा ..सब से ज्यादा जीवात्मा का वास्तविक “मैं” ठोस है…. जहाँ से संकल्प उठता है… संकल्प तो हो हो के मिट जाते….संकल्पों को सफलता विफलता मिल कर चली जाती…. फिर भी नही जाता इसी को उपनिषद बोलते

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,

पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।
ॐ शांति: शांति: शांतिः

..वो अपने आप में पूर्ण है…. परमात्मा की तरह जीवात्मा.भी पूर्ण है ..पूर्ण से ही उत्पत्ति होती है |





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Wednesday, 26 September 2018

मंत्र सिद्धि के सूत्र





ऋषिकेश से दूर जंगल में एक योगी रहते थे। वहां उस समय मात्र ५-७ लोग ही थे। जंगल होने के कारण शेर, भालू और हाथी प्राय: आ जाते थे। एक शिष्य योगाभ्यासी प्रति दिन सूर्योदय के पहले ही गुरूजी के नदी में स्नान करने के पहले एक पेड़ से दातुन तोड़ कर मुंह धो लेते थे। योगी काफी वृद्ध हो चले थे।
शिष्य गुरूजी के दातुन के लिए वृक्ष पर चढ़ने लगे। उस पेड़ पर एक मधुमख्खी का छत्ता था। शिष्य ने चिल्ला कर गुरूजी को पेड़ से दूर जाने का आग्रह करते हुए कहा की दूर चले जाइये, नहीं तो मखियाँ काटेंगी। दूर जाना तो दूर रहा योगी मख्खी के पास जा कर कुछ बोलने लगे। शिष्य दातुन तोड़ कर पास आया, देखा की मख्खियाँ शांत हो कर दूर चली गयी थी।
शिष्य ने पूछा की गुरूजी आप मधुमख्खियों से कैसे बच गएँ। कौन सा मन्त्र आपने पढ़ा। मुझे भी बताईए।
गुरूजी बोलें की पेड़ पर चढो और चढते रहो फिर मंत्रोंपदेश करूँगा। तब शिष्य पेढ पर चढने लगा। गुरूजी ने मंत्रोपदेश देना प्रारंभ करने लगे. . .  ” अंतरात्मा से में योग क्रिया कर रहा हूँ, हे मधुमखियौं मैं तुम्हारा कोई अहित नहीं करूँगा। तूम भी मेरा अपकार नहीं करना।”  
शिष्य ने कहा की यह तो मन्त्र नहीं है। गुरूजी ने कहा कि तुम निष्कपट यह बात मधुमख्खियों से धीरे से बोलो। हृदय की भाषा वे समझतीं है। केवल दिल खोल कर वार्तालाप करो।
शिष्य ने ऐसा ही किया. . .  आश्चर्य की मधुमखियों ने उसकी भाषा को समझते हुए कोई अपकार नहीं किया, शांत थीं।
उनके तथा हमारे में एक ही आत्मा का निवास है, इसे जानना चाहिए। भलाई की बात सोचना ही महा मन्त्र है। नकारात्मक सोच हम न सोचें, तो सदैव हमारा मन्त्र फलीभूत होगा।

इसी प्रकार के मंत्रोच्चारण से दैव उपासना करने का प्रयत्न प्रत्येक साधक को करना चाहिए।






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Sunday, 23 September 2018

interview





      बेटा तुम्हारा इन्टरव्यू लैटर आया है। मां ने लिफाफा हाथ में देते हुए कहा।

       यह मेरा सातवां इन्टरव्यू था। मैं जल्दी से तैयार होकर दिए गए नियत समय 9:00 बजे पहुंच गया। एक घर में ही बनाए गए ऑफिस का गेट खुला ही पड़ा था मैंने बन्द किया भीतर गया।

       सामने बने कमरे में जाने से पहले ही मुझे माँ की कही बात याद आ गई बेटा भीतर आने से पहले पांव झाड़ लिया करो।फुट मैट थोड़ा आगे खिसका हुआ था मैंने सही जगह पर रखा पांव पोंछे और भीतर गया।

        एक रिसेप्शनिस्ट बैठी हुई थी अपना इंटरव्यू लेटर उसे दिखाया तो उसने सामने सोफे पर बैठकर इंतजार करने के लिए कहा। मैं सोफे पर बैठ गया, उसके तीनों कुशन अस्त व्यस्त पड़े थे आदत के अनुसार उन्हें ठीक किया, कमरे को सुंदर दिखाने के लिए खिड़की में कुछ गमलों में छोटे छोटे पौधे लगे हुए थे उन्हें देखने लगा एक गमला कुछ टेढ़ा रखा था, जो गिर भी सकता था माँ की व्यवस्थित रहने की आदत मुझे यहां भी आ याद आ गई,  धीरे से उठा उस गमले को ठीक किया।

        तभी रिसेप्शनिस्ट ने सीढ़ियों से ऊपर जाने का इशारा किया और कहा तीन नंबर कमरे में आपका इंटरव्यू है।

       मैं सीढ़ियां चढ़ने लगा देखा दिन में भी दोनों लाइट जल रही है ऊपर चढ़कर मैंने दोनों लाइट को बंद कर दिया तीन नंबर कमरे में गया ।

        वहां दो लोग बैठे थे उन्होंने मुझे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और पूछा तो आप कब ज्वाइन करेंगे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जी मैं कुछ समझा नहीं इंटरव्यू तो आप ने लिया ही नहीं।

       इसमें समझने की क्या बात है हम पूछ रहे हैं कि आप कब ज्वाइन करेंगे ? वह तो आप जब कहेंगे मैं ज्वाइन कर लूंगा लेकिन आपने मेरा इंटरव्यू कब लिया वे दोनों सज्जन हंसने लगे।

       उन्होंने बताया जब से तुम इस भवन में आए हो तब से तुम्हारा इंटरव्यू चल रहा है, यदि तुम दरवाजा बंद नहीं करते तो तुम्हारे 20 नंबर कम हो जाते हैं यदि तुम फुटमेट ठीक नहीं रखते और बिना पांव पौंछे आ जाते तो फिर 20 नंबर कम हो जाते, इसी तरह जब तुमने सोफे पर बैठकर उस पर रखे कुशन को व्यवस्थित किया उसके भी 20 नम्बर थे और गमले को जो तुमने ठीक किया वह भी तुम्हारे इंटरव्यू का हिस्सा था अंतिम प्रश्न के रूप में सीढ़ियों की दोनों लाइट जलाकर छोड़ी गई थी और तुमने बंद कर दी तब निश्चय हो गया कि तुम हर काम को व्यवस्थित तरीके से करते हो और इस जॉब के लिए सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार हो, बाहर रिसेप्शनिस्ट से अपना नियुक्ति पत्र ले लो और कल से काम पर लग जाओ।

       मुझे रह रह कर माँऔर बाबूजी की यह छोटी-छोटी सीखें जो उस समय बहुत बुरी लगती थी याद आ रही थी।

       मैं जल्दी से घर गया मां के और बाऊजी के पांव छुए और अपने इस अनूठे इंटरव्यू का पूरा विवरण सुनाया. 

        इसीलिए कहते हैं कि व्यक्ति की प्रथम पाठशाला घर और प्रथम गुरु माता पिता ही है।




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Wednesday, 19 September 2018

सत्संग का असर



 

  • सत्संग का असर क्यों नहीं होता ?
  • शिष्य गुरु के पास आकर बोला, गुरु जी हमेशा लोग प्रश्न करते है कि सत्संग का असर क्यों नहीं होता  मेरे मन में भी यह प्रश्न चक्कर लगा रहा है।

           गुरु समयज्ञ थे,
           बोले- वत्स! जाओ, एक घडा मदिरा ले आओ।
          शिष्य मदिरा का नाम सुनते ही आवाक् रह गया।
          गुरू और शराब!
          वह सोचता ही रह गया।
          गुरू ने कहा सोचते क्या हो?  जाओ एक घडा मदिरा ले आओ। वह गया और एक छला छल भरा मदिरा का घडा ले आया।
          गुरु के समक्ष रख बोला-
          “आज्ञा का पालन कर लिया
         गुरु बोले –
         “यह सारी मदिरा  पी लो”
         शिष्य अचंभित,
        गुरुने कहा
         शिष्य!  एक बात का ध्यान रखना, पीना पर शीघ्र कुल्ला थूक देना, गले के नीचे मत उतारना।
         शिष्य ने वही किया,
         शराब मुंह में भरकर तत्काल थूक देता, देखते देखते घडा खाली हो गया।
         आकर कहा- “गुरुदेव घडा खाली हो गया”
         “तुझे नशा आया या नहीं?”
           पूछा गुरु ने।
          गुरुदेव! नशा तो बिल्कुल नहीं आया।
          अरे मदिरा का पूरा घडा खाली कर गये और नशा नहीं चढा?
          गुरुदेव नशा तो तब आता जब मदिरा गले से नीचे उतरती, गले के नीचे तो एक बूंद भी नहीं गई फ़िर नशा कैसे चढता
          बस फिर सत्संग को भी उपर उपर से जान लेते हो, सुन लेते हों गले के नीचे तो उतरता ही नहीं, व्यवहार में आता नहीं तो प्रभाव कैसे पडे
        गुरु के वचन को केवल कानों से नही, मन की गहराई से सुनना, एक-एक वचन को ह्रदय में उतारना और            उस पर आचरण करना ही, गुरु के वचनो का सम्मान है ।
         पांच पहर धंधा किया,
         तीन पहर गए सोए ।
एक घड़ी ना सत्संग किया,
तो मुक्ति कहाँ से होए।।





ref; from whats app source