Tuesday, 5 May 2020

गुरु भक्त संदीपक





प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म
मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-
शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने
अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने
का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के
प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस
श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-
कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने अपने शिष्यों को एकत्र करके
कहाः " हे शिष्यों ! पूर्वजन्म में मैंने कुछ
पापकर्म किये हैं। उनमें से कुछ तो जप-तप,
अनुष्ठान करके मैंने काट लिये,
अभी थोड़ा प्रारब्ध बाकी है। उसका फल
इसी जन्म में भोग लेना जरूरी है। उस कर्म
का फल भोगने के लिए मुझे भयानक बीमारी आ
घेरेगी, इसलिए मैं काशी जाकर रहूँगा। वहाँ मुझे
कोढ़ निकलेगा, अँधा हो जाऊँगा। उस समय मेरे
साथ काशी आकर मेरी सेवा कौन करेगा ? है कोई
हरि का लाल, जो मेरे साथ रहने के लिए तैयार
हो ?"
वेदधर्म मुनि ने परीक्षा ली। शिष्य पहले
तो कहा करते थेः "गुरुदेव ! आपके चरणों में
हमारा जीवन न्योछावर हो जाये मेरे प्रभु !" अब
सब चुप हो गये। गुरु का जयघोष होता है, माल-
मिठाइयाँ आती हैं, फूल-फल के ढेर लगते हैं तब
बहुत शिष्य होते हैं लेकिन आपत्तिकाल में उनमें
से कितने टिकते हैं !
वेदधर्म मुनि के शिष्यों में संदीपक नाम
का शिष्य खूब गुरु-सेवापरायण, गुरुभक्त एवं
कुशाग्र बुद्धिवाला था।
उसने कहाः "गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में
रहेगा।"
गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए
रहना होगा।"
संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन
ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन
की सार्थकता है।"
वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी नगर में
मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। संदीपक
सेवा में लग गया। प्रातः काल में गुरु
की आवश्यकता के अनुसार दातुन-पानी,
स्नान-पूजन, वस्त्र-परिधान
इत्यादि की तैयारी पहले से ही करके रखता।
समय होते ही भिक्षा माँगकर लाता और गुरुदेव
को भोजन कराता। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर
में कोढ़ निकला और संदीपक
की अग्निपरीक्षा शुरु हो गयी। गुरु कुछ समय
बाद अंधे हो गये। शरीर कुरूप और स्वभाव
चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र
भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन-रात
गुरुजी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के
घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु
को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता,
भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन
कराता।
गुरुजी को मिजाज और भी क्रोधी एवं
चिड़चिड़ा हो गया। वे गाली देते, डाँटते,
तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध
प्रकार से परीक्षा लेते। संदीपक खूब शांति से,
धैर्य से यह सब सहते हुए दिन प्रतिदिन
ज्यादा तत्परता से गुरु की सेवा में मग्न रहने
लगा। धनभागी संदीपक के हृदय में गुरु के
प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़
होता गया।
संदीपक की ऐसी अनन्य गुरुनिष्ठा देखकर
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ
उसके समक्ष प्रकट हो गये और
बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम
प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह
मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट
करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है। इसलिए
बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक ने अपने गुरु
की आज्ञा के बिना कुछ भी माँगने से मना कर
दिया। शिवजी ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और
बोलाः "शिवजी वरदान देना चाहते है। आप
आज्ञा दें तो मैं वरदान माँग लूँ कि आपका रोग
एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाये।"
गुरु ने संदीपक को खूब डाँटते हुए
कहाः "सेवा करते-करते थका है इसलिए वरदान
माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से
तेरी जान छूटे ! अरे मूर्ख ! जरा तो सोच
कि मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे
भोगना ही पड़ेगा।"
इस जगह पर कोई आधुनिक शिष्य होता तो गुरु
को आखिरी नमस्कार करके चल देता। संदीपक
वापस शिवजी के पास गया और वरदान के लिए
मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित
हो कि कैसा निष्ठावान शिष्य है ! शिवजी गये
विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से
सारा वृत्तान्त कहा। भगवान विष्णु भी संतुष्ट
हो संदीपक के पास वरदान देने के लिए प्रकटे।
गुरुभक्त संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ
नहीं चाहिए।" भगवान ने फिर से आग्रह
किया तो संदीपक ने कहाः "आप मुझे
यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल
श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर
प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन-प्रतिदिन भक्ति दृढ़
होती रहे। इसके अलावा मुझे और कुछ
नहीं चाहिए।" ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ने
संदीपक को गले लगा लिया।
जब तक गुरू का हृदय शिष्य पर संतुष्ट
नहीं होता, तब तक शिष्य में ज्ञान प्रकट
नहीं होता। उसके हृदय में गुरु का ज्ञानोपदेश
पचता नहीं है। गुरु का संतोष ही शिष्य की परम
उपासना है, परम साधना है। गुरु को जो संतुष्य
करता है, प्रसन्न करता है उस पर सब संतुष्ट
हो जाते हैं। गुरुद्रोही पर विश्वात्मा हरि रूष्ट होते
हैं। आज संदीपक जैसे
सत्शिष्यों की गाथा का वर्णन सत्शास्त्र कर
रहे हैं। धन्य हैं ऐसे सत्शिष्य !
संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ
बैठे थे। न कोढ़, न कोई अंधापन, न अस्वस्थता !
शिवस्वरूप सदगुरु श्री वेदधर्म ने संदीपक
को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से
पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे
बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा !
जो इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा सुनायेंगे,
वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र
संदीपक ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानन्दस्वरूप
हो।"
गुरु के संतोष से संदीपक गुरुतत्त्व में जग गया,
गुरुस्वरूप हो गया।
अपनी श्रद्धा को कभी भी,
कैसी भी परिस्थिति में गुरु पर से तनिक भी कम
नहीं करना चाहिए। गुरु परीक्षा लेने के लिए
कैसी भी लीला कर सकते हैं। निजामुद्दीन
औलिया ने भी अपने चेलों की परीक्षा ली थी।
खास-खास 24 चेलों में से भी 2-2 करके फिसलते
गये। आखिरी ऊँचाई तक अमीर खुसरो ही डटे रहे।

Tuesday, 24 September 2019

श्राद्ध और मदन मोहन मालवीय जी के जन्म रहस्य




  
सूक्ष्म जगत के लोगों को हमारी श्रद्धा और श्रद्धा से दी गयी वस्तु से तृप्ति का एहसास होता है।
बदले में वे भी हमें मदद करते हैं, प्रेरणा देते हैं, प्रकाश देते हैं, आनंद और शाँति देते
हैं। हमारे घर में किसी संतान का जन्म होने वाला हो तो वे अच्छी आत्माओं को भेजने में सहयोग
करते हैं। श्राद्ध की बड़ी महिमा है। पूर्वजों से उऋण होने के लिए, उनके शुभ आशीर्वाद से उत्तम संतान
की प्राप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है।
आजादी से पूर्व काँग्रेस बुरी तरह से तीन-चार टुकड़ों में बँट चुकी थी। अँग्रेजों का षडयंत्र सफल हो रहा
था। काँग्रेस अधिवेशन में कोई आशा नहीं रह गयी थी कि बिखरे हुए नेतागण कुछ कर सकेंगे। महामना
मदनमोहन मालवीय, भारत की आजादी में जिनका योगदान सराहनीय रहा है, यह बात ताड़ गये कि
सबके रवैये बदल चुके हैं और अँग्रेजों का षडयंत्र सफल हो रहा है। अतः अधिवेशन के बीच में ही चुपके
से खिसक गये एक कमरे में। तीन आचमन लेकर, शांत होकर बैठ गये। उन्हें अंतः प्रेरणा हुई और उन्होंने
श्रीमदभागवदगीता के 'गजेन्द्रमोक्ष' का पाठ किया।
बाद में थोड़ा सा सत्संग प्रवचन दिया तो काँग्रेस के सारे खिंचाव-तनाव समाप्त हो गये एवं सब बिखरे हुए
काँग्रेसी एक जुट होकर चल पड़े। आखिर अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।
काँग्रेस के बिखराव को समाप्त करके, काँग्रसियों को एकजुट कर कार्य करवानेवाले मालवीयजी का
जन्म कैसे हुआ था?
मालवीयजी के जन्म से पूर्व हिन्दुओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध जब आंदोलन की शुरुआत की थी तब
अंग्रेजों ने सख्त 'कर्फ्यू' जारी कर दिया था। ऐसे दौर में एक बार मालवीयजी के पिता जी कहीं से
कथा करके पैदल ही घर आ रहे थे।
उन्हें मार्ग में जाते देखकर अंग्रेज सैनिकों ने रोका-टोका एवं सताना शुरु किया। वे उनकी भाषा नहीं
जानते थे और अंग्रेज सैनिक उनकी भाषा नहीं जानते थे। मालवीय जी के पिता ने अपना साज
निकाला और कीर्तन करने लगे। कीर्तन से अंग्रेज सैनिकों को कुछ आनंद आया और इशारों से
धन्यवाद देते  हुए उन्होंने कहा किः "चलो, हम आपको पहुँचा देते हैं।" यह देखकर मालवीयजी
के पिता को हुआ किः "मेरे कीर्तन से प्रभावित होकर इन्होंने मुझे तो हैरान करना बन्द कर दिया
किन्तु मेरे भारत देश के लाखों-करोड़ों भाईयों का शोषण हो रहा है, इसके लिए मुझे कुछ करना चाहिए।"
बाद में वे गया जी गये और प्रेमपूर्वक श्राद्ध किया। श्राद्ध के अंत में अपने दोनों हाथ उठाकर
पितरों से प्रार्थना करते हुए उन्होंने कहाः 'हे पितरो ! मेरे पिण्डदान से अगर आप तृप्त हुए हों,
मेरा किया हुआ श्राद्ध अगर आप तक पहुँचा हो तो आप कृपा करके मेरे घर में ऐसी ही संतान
दीजिए जो अंग्रेजों को भगाने का काम करे और मेरा भारत आजाद हो जाये.....।'

पिता की अंतिम प्रार्थना फली। समय पाकर उन्हीं के घर मदनमोहन मालवीय जी का जन्म हुआ।






Sunday, 25 August 2019

भक्त और भगवान





एक भक्त था वह परमात्मा को बहुत मानता था, बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया करता था ।

एक दिन भगवान से कहने लगा –

मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूँ पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई ।

मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये की मुझे ये अनुभव हो की आप हो।

-भगवान ने कहा ठीक है,
तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो, जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देंगे । दो तुम्हारे पैर होंगे और दो पैरो के निशान मेरे होंगे ।
इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी ।

अगले दिन वह सैर पर गया,
जब वह रेत पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ ।

अब रोज ऐसा होने लगा ।

एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ सब कुछ चला गया, वह रोड़ पर आ गया उसके अपनो ने उसका साथ छोड दिया । देखो यही इस दुनिया की प्रॉब्लम है, मुसीबत में सब साथ छोड़ देते है ।

अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये ।

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त में भगवान ने भी साथ छोड दिया।

धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे ।

एक दिन जब वह सैर  पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे ।

उससे अब रहा नही गया,
वह बोला-

भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है,
पर आप ने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था,
ऐसा क्यों किया?

भगवान ने कहा –

तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा,
तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे वे तुम्हारे पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे,

उस समय में तुम्हे अपनी गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है ।

इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर दिखाई दे रहे ।.................







Wednesday, 17 October 2018

बेटियों की अहमियत



       एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई।
        चेहरे पर झलकता आक्रोश...


        संत ने पूछा - बोलो बेटी क्या बात है?


        बालिका ने कहा- महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है।
        वह कुछ भी करे, कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती।
        इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है।
        यह मत करो, यहाँ मत जाओ, घर जल्दी आ जाओ आदि।


        संत मुस्कुराए और कहा...


         बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं?
        ये गार्डर सर्दी, गर्मी, बरसात, रात दिन इसी प्रकार पड़े रहते हैं।
         इसके बावजूद इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता।
          लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में।


         अब तुम चलो एक ज्वेलरी शॉप में।
         एक बड़ी तिजोरी, उसमें एक छोटी तिजोरी।
         उसमें रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा।
         क्योंकि जौहरी जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी।


         समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है।
         पूरे घर को रोशन करती झिलमिलाते हीरे की तरह।
          जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के पास कुछ नहीं बचता।
          बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में।


         पूरी सभा में चुप्पी छा गई।
          उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।।।




*****



ref ; a  whatsapp collection





Wednesday, 10 October 2018

प्रेम के बदले प्रेम


- एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरेखरीदता ।

- अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता,
"ये कम मीठा लग रहा है, देखो !"

- बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!"

- वो उस संतरे को वही छोड़,बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता।

- युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा
"ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह
नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?

"युवा ने पत्नी को एक मधुर मुस्कान के साथ बताया -

"वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती,
इस तरह मै उसे संतरा खिला देता हूँ ।

एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया,

- ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है,
पर संतरे तौलते हुए मै तेरे पलड़े को देखती हूँ,
तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है ।

बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा -
"उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है,
वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ,
पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।

तो कहना पड़ेगा -

मेरी हैसीयत से ज्यादा मेरी थाली मे तूने परोसा है.
तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक, मुझे तुझपे भरोसा है.
एक बात तो पक्की है की...
छीन कर खानेवालों का कभी पेट नहीं भरता
और बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता...!!!



"ऊँचा उठने के लिए पंखो की जरूरत तो पक्षीयो को पड़ती है..
इंसान तो जितना नीचे झुकता है,
वो उतना ही ऊपर उठता जाता है..!!



*****

ref: a whatsapp collection-









Wednesday, 3 October 2018

सबसे ठोस क्या है?








सब से ज्यादा सुदृढ़ क्या है?

--- ज्यादा ठोस है संकल्प बल…!
दृढ निश्चय…. संकल्प बल सब से ठोस है….”
एक भाई विकलांग था…संकल्प बल मिला…विद्वान् हुआ…. महा-निदेशक बना…. फौज का निदेशक बना ..
ग्रंथो में भी संकल्प बल की बहोत महिमा गाई है…
लेकिन इस से भी ठोस है, जहाँ से संकल्प उठता है वो….. संकल्प बल से भी ज्यादा ठोस है वो “चिद-घन”!…..भगवान को “घन” कहा है …पथ्थर को तोड़नेवाला लोहा…लोहे को तपानेवाला अग्नि ..अग्नि में शीतलता देनेवाला जल ..और जल के मेघों को वायु उड़ा के ले जाएगा.. और वायु की गति को भी घुमा देगा ऐसा है मनुष्य का संकल्प बल…तो संकल्प बल सब से शक्तिशाली है…..
मैं इस बात को आगे ले चलता…..सब से ज्यादा ठोस है वो “चिद-घन विभु” ….संकल्प जहाँ से उठता है ..
वो आत्मा परमात्मा है “घन… चैत्यन्य..!”
संकल्प बल से महा निदेशक की कुर्सी मिली…कुर्सी चली गई… फिर भी जो नही गया….कुर्सी पे बैठनेवाला शरीर मर गया, फिर भी जो मरा नही वो है आत्मा ..!
महा शक्तिशाली!….
महा शाश्वत तत्व है !!
और उस आत्मा में प्रीति हो जाए, विश्रांति हो जाए…उस को “मैं” के रूप में स्वीकार कर लिया जाए ….
..अभी तो शरीर को “मैं”मानते…. वो तो छुट जाएगा …..शरीर मर जाएगा तो मरने के बाद भी नही मिटता वो कितना ठोस है!!
…. हजारो जनम से शरीर मिले..मिल मिल के मिट गए…. लेकिन आप का आत्मा कभी नही मिटा….
.. ‘ “मैं” हूँ की नही?’ ऐसा सवाल कभी नही उठता…. भगवान है की नही ये सवाल उठ सकता है …
“मैं” हूँ की नही ये सवाल नही उठेगा ..सब से ज्यादा जीवात्मा का वास्तविक “मैं” ठोस है…. जहाँ से संकल्प उठता है… संकल्प तो हो हो के मिट जाते….संकल्पों को सफलता विफलता मिल कर चली जाती…. फिर भी नही जाता इसी को उपनिषद बोलते

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,

पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।
ॐ शांति: शांति: शांतिः

..वो अपने आप में पूर्ण है…. परमात्मा की तरह जीवात्मा.भी पूर्ण है ..पूर्ण से ही उत्पत्ति होती है |





ref : an whatsapp collection

Wednesday, 26 September 2018

मंत्र सिद्धि के सूत्र





ऋषिकेश से दूर जंगल में एक योगी रहते थे। वहां उस समय मात्र ५-७ लोग ही थे। जंगल होने के कारण शेर, भालू और हाथी प्राय: आ जाते थे। एक शिष्य योगाभ्यासी प्रति दिन सूर्योदय के पहले ही गुरूजी के नदी में स्नान करने के पहले एक पेड़ से दातुन तोड़ कर मुंह धो लेते थे। योगी काफी वृद्ध हो चले थे।
शिष्य गुरूजी के दातुन के लिए वृक्ष पर चढ़ने लगे। उस पेड़ पर एक मधुमख्खी का छत्ता था। शिष्य ने चिल्ला कर गुरूजी को पेड़ से दूर जाने का आग्रह करते हुए कहा की दूर चले जाइये, नहीं तो मखियाँ काटेंगी। दूर जाना तो दूर रहा योगी मख्खी के पास जा कर कुछ बोलने लगे। शिष्य दातुन तोड़ कर पास आया, देखा की मख्खियाँ शांत हो कर दूर चली गयी थी।
शिष्य ने पूछा की गुरूजी आप मधुमख्खियों से कैसे बच गएँ। कौन सा मन्त्र आपने पढ़ा। मुझे भी बताईए।
गुरूजी बोलें की पेड़ पर चढो और चढते रहो फिर मंत्रोंपदेश करूँगा। तब शिष्य पेढ पर चढने लगा। गुरूजी ने मंत्रोपदेश देना प्रारंभ करने लगे. . .  ” अंतरात्मा से में योग क्रिया कर रहा हूँ, हे मधुमखियौं मैं तुम्हारा कोई अहित नहीं करूँगा। तूम भी मेरा अपकार नहीं करना।”  
शिष्य ने कहा की यह तो मन्त्र नहीं है। गुरूजी ने कहा कि तुम निष्कपट यह बात मधुमख्खियों से धीरे से बोलो। हृदय की भाषा वे समझतीं है। केवल दिल खोल कर वार्तालाप करो।
शिष्य ने ऐसा ही किया. . .  आश्चर्य की मधुमखियों ने उसकी भाषा को समझते हुए कोई अपकार नहीं किया, शांत थीं।
उनके तथा हमारे में एक ही आत्मा का निवास है, इसे जानना चाहिए। भलाई की बात सोचना ही महा मन्त्र है। नकारात्मक सोच हम न सोचें, तो सदैव हमारा मन्त्र फलीभूत होगा।

इसी प्रकार के मंत्रोच्चारण से दैव उपासना करने का प्रयत्न प्रत्येक साधक को करना चाहिए।






ref: an whatsapp collection